जून 27, 2015

कल

कितनी शामों से यह शाम ऐसे ही ठहरी हुई है। एकदम बिलकुल शांत। रुकी हुई। खिड़की से फ़र्लांग भर की दूरी पर उस अमलतास के फूलों के झर जाने के बाद से सहमी हुई पत्तियों की तरह। हम भी कहीं मिट्टी में रोपे हुए पेड़ होते तो आज तीस साल बाद कितने बड़े होकर किसी आँधी पानी में टूटकर गिर गए होते। हमारी सारी कल्पनाएं डालों में बहते हरे ख़ून के रंग से आस-पास कहीं बिखरे पत्तों की तरह सूखकर, किसी पैदल चलने वाली वजन कम करने की इच्छा लिए हुए तंदुरुस्त जाँघों वाली वजनी औरत के पैरों तले रौंदी जा चुकी होती। इस मांसलता में हमारा हीनताबोध भी कहीं किसी को छिपा हुआ दिख जाता तो भी कुछ नहीं हो पाता। हमारी जड़ें स्थिर होकर हमारी ऊब बन जाती। एक अर्थ में वह हमारी परंपरा ही कहलाती, पर हम प्रगतिशील होने की इच्छा से ख़ुद को भरा पाते। पर शाम डूबती हुई एक बार फ़िर कह जाती, तुम्हारा यहीं बने रहना, किसी का सपनों में खो जाना है। इसलिए रुके रहो। खड़े रहो। 

कितने कम लोगों को ऐसी शामें मिल पाती हैं। जब वह एकदम अकेले ऐसे कितने ही ख़यालों में डूबते हुए रोज़ कुर्सी में धँसते जाते। उनकी कुर्सी भुरभुरे दलदल में बदलकर अंदर खींच रही होती। वह कितने ही पल इन ख़यालों से जूझने में लगा देते। असल में यह ख़याल शुरू होते, हमारे घर से। घर के भीतर सीलन से उतरते पलस्तर के बिलकुल पास। सब एकदम मौन खड़े होकर इंतज़ार करते। किसी सपने के दरवाज़े से चिपककर। माता-पिता के साथ अब चिन्ता करने वाली पत्नी भी आ गयी है। सब खूँटी पर टंगे हुए गीले तौलिये से आती गंध की तरह होते गए हैं। लिजलिजे से। जैसे किसी चूहे के मरने के बाद, उसकी सड़ती हुई लाश से आती हुई बदबू सारे घर में हमेशा के लिए फैल गयी हो। कितना ही फ़िनायल से पोंछा लगते रहो, उसकी परछाईं किसी दीवार पर सलमान खान के बड़े से पोस्टर की तरह बन जाती।

मुझ जैसे और कितने लड़के होंगे जो इन जैसे वीभत्स भावों से ख़ुद को भर लेते होंगे। यह हमारी स्वेच्छा नहीं है। मजबूरी है। यह जुगुप्सा रातों रात हमारे अंदर दाख़िल नहीं हुई। हमने इसे अपने बाहर से कतरा-कतरा ख़ून की तरह इकट्ठा किया है। ख़ूब मेहनत लगती है, साँसें फूल जाती हैं, फेफड़े जवाब देने लग जाते हैं। दिल भी कितनी तेज़ी से धड़कने के बाद सुस्त हो जाता है। कहता है, अब बस। इसमें भी एक अनकही बाजी लगी हुई है। कोई किसी से कहता नहीं, वह क्या कर रहा है। बस यह कल के लिए इंतज़ार करने की एक तरक़ीब भर है। यह ख़ुद को लाजवाब करते जाना है। जितना हम ख़ुद के बारे में नहीं सोचते, उससे कहीं जादा करते जाना है। यह हमारे भीतर अविश्वास के बाद उपजा विश्वास है। कमज़ोर है। पर है। उसका होना हमारे होने की तरह ज़रूरी है। ज़रूरी है, उसका ऐसे ही छिपे रहना। बने रहना।

यह ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ हमारा अघोषित घोषणापत्र है। कितनी ही दफ़े इसमें रद्दोबदल के बाद भी इंतज़ार के अलावे कुछ हासिल नहीं हुआ। यह हमारे आगामी भविष्य का ‘स्थगन काल’ है। इस हम ऐसी ही काट सकते थे। कल अपने आप में एक बहुत बड़ी संभावना है। जहाँ सपने दीमक लगे डंठल की तरह खोखले होने लगते हैं, हम ख़ुद को कठफ़ोड़वे में तब्दील कर लेते हैं। हम उनके सूखते जाने की प्रक्रिया में भी उनका साथ नहीं छोड़ते। कहीं धूप की उष्ण-कटिबंधीय किरण उन्हे झुलसा रही है, तो इस पूरे चरण में हमारी इच्छाओं के वाष्पीकरण के बाद, वह कभी-न-कभी ज़रूर बरसेंगी। यह संभावनाओं को अपनी तरह जिंदा रखने की आख़िरी जिद है। यह सपने ही हमारे घोंसले हैं। इन्ही में हम अब तक छिपते रहे हैं। आगे भी छिपते रहेंगे कठफोड़वा और बया की तरह।

{अभी तुम कमरे में दाख़िल हुई तो लिखना शुरू ही किया था। इसलिए तुम वापस चली गयी। पता नहीं ऐसे तुम्हारे हिस्से की कितनी किश्ते इन बीतते दिनों में इकट्ठी होती रही हैं। तुम जोड़ती रहो। सब हमारे सपनों की तरह वापस लौटेंगी, हमारे पास। अभी बस इतना ही। दिमाग रुक गया है। रुक गया है छत पंखे की पंखुड़ियों की तरह। बस अभी सोच रहा हूँ, कल मोबाइल लेकर नहीं निकल रहा। यहीं छोड़ दूंगा। }

जून 20, 2015

लखनऊ इसबार : शॉर्ट नोट्स

पॉइंट्स बाय पॉइंट्स
1.दिल्ली से नहीं वहीं से मुकेश को फोन। उसके दोनों नंबर बंद।

2.बक्शी का तालाब/ ताल। लखनऊ से इतनी दूर है, कौन जाएगा? लड़का लड़की अगर गए भी तो कहाँ कहाँ घूमने का मौका मिल पाएगा

3.संदर्भ है अनवर फिल्म का गाना जो यहीं से शुरू होता है, अमीनाबाद के गड़बड़झाला बाज़ार में दो सौ रुपये के झुमके तक पहुंचता है।

4.यहाँ दिल्ली से आरएसी होने पर भी पूरी सीट पर तान के लखनऊ पहुँचना। कैसा प्रेम उन दोनों को बांधे रखे है। वे नहीं चढ़ पाइन तो पति भी नहीं सोये। दोनों रात भर बैठे रहे।

5. अगर लखनऊ से टेम्पो ख़त्म कर दिये जाएँ, तब वहाँ की शहरी बसें काफ़ी महँगी हैं। कल्याण पुर से चार बाग पैंतीस रुपए।

6. चार बाग से चिनहट मेट्रो ट्रेन हो जाने की ख़बर।

7. राजनाथ सिंह के गृह मंत्री बन जाने पर लखनऊ वासियों को बीजेपी की तरफ़ से अभिनंदन आभार।

8. एनडीटीवी का रवीश। जो देश का नंबर वन है। विधान सभा के पास बड़ी सी होर्डिंग।

9. हज़रत गंज में ‘ब्रिटिश बुक डिपो’। कान से कम सुनने वाले अंकल। कुँवर नारायण की ‘रुख़’ के बारे में सुन ही नहीं सके। सीसीडी के बिलकुल सामने।

10. नॉवेल्टी क़ैसरबाग से आते हुए ‘मिश्रा चाट कोर्नर’। दस के चार बतासे। गंजी टांड़।

11.’लक्ष्मी भोजनालय’। एक बार फ़िर साबित हुआ कि हम अपनी आँखों से जादा कभी पहले गयी जगह पर ही जा पहुँचते हैं। खाने के नाम पर शाही पनीर। पर झोंक के मिर्च। आगे से कभी वाजपायी होटल नहीं जाएँगे। लड़कियों को लाकर कुछ घंटे बिताने का अड्डा जादा लगा इस बार। चार मर्दों पर एक लड़की। कहा गाँव कि है हम चाचा हैं। पर कोई सामान नहीं। खाली हाथ। फ़िर रुके भी नहीं। पूर्व परधान मंत्री के नाम पर है।

12. रेसिडेंसी, बुदधा गार्डन, कार्गिल शहीद स्मारक, लेटे हुए हनुमान जी, मड़ीयाओं, टेढ़ी पुलिहिया, पक्की पुलिहिया, सब को पास से गुजरते देखना। कैसे उस इतवार को लोग अलग अलग हैं। जो हज़रत गंज हैं और जो यहाँ थे।

जून 19, 2015

लुगदी साहित्य की वापसी का अर्थ

जिस तरह एकबार फ़िर साहित्य में 'लुगदी' साहित्य की 'यक्ष प्रश्न' की तरह वापसी हो रही है, उससे लगता है, हम कहीं-न-कहीं अपने अंदर किसी हीनग्रंथि से उबर आने के लिए छटपटा रहे हैं। इतने बड़े क्षेत्रफल में विचरने वाली भाषा के पास  कोई ढंग का बिकने वाला एक लेखक भी नहीं है। यह हमारे भीतर अपनी भाषा के 'पल्प लिट्रेचर' में एक चेतन भगत, अरविंद अडिगा, शोभा डे, पाओलो कोएल्हो, जॉन ग्रिशम, अगाथा क्रिस्टी तलाशने की मर्मांतक तलाश है।

इसतरह पहले दबाये गए नॉवेल की पूरी जमात के दोबारा उभार को अनुराग कश्यप और उस स्कूल से निकले फिल्म निर्देशकों की रौशनी में भी पढ़ा जाना चाहिए, तब हम समझ पाएंगे, यह खोज अचानक ही नहीं हमें सुरेन्द्र मोहन पाठक के 'कोलबा कॉन्सपिरेसी' और 'जो लड़े दिन के हेत' से होते हुए हार्पर कॉलिन्स तक पहुँचा देती हैं। रवि बुले की किताब 'दलाल की बीवी' उसकी अगली खिड़की है।

कई इब्ने शफ़ी, गुलशन नन्दा, वेद प्रकाश शर्मा सरीखे होंगे, जो कहीं किसी रेलवे स्टेशन की दुकान पर किताबों के बीच दबे रह गए होंगे, अब साँस लेने के लिए बाहर निकलेंगे।

{तहलका हिन्दी का लुगदी साहित्य पर विशेषांक

जून 15, 2015

अदम गोंडवी और बहराइच हमारा

मुझे पता है, इनके नाम के आगे जो गोंडवी लगा है, इसका कुछ भी लेना देना गोंड जनजाति से नहीं है। यह बहुत सरल-सा उपनाम है। गोण्डा के आटा परसपुर के अदम गोंडवी उर्फ़ रामनाथ सिंह का कोई कविता संग्रह अभी तक मेरी पहुँच में नहीं है। कुछ कवितायें कहीं पढ़ी थीं, उनमें एक जगह कबाड़खाना भी रही। एक लंबी कविता थी। अभी उसे गूगल पर ढूँढा तो मिल गयी। शुरवात ऐसे होती है उसकी:

आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को/
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको

पता नहीं हम कितने छोटे रहे होंगे, जब एक बारात में आटा परसपुर गए। तब की हमारी जानकारी भी कहीं नहीं रही होगी। मिलना तो बहुत दूर की बात है। जनसत्ता के रविवारी में भी कभी इनपर पूरा पन्ना आया था। पता नहीं वह अभी भी पीले पड़ते अख़बारों के ढेर में अलमारी के ऊपर है भी या नहीं। और यह भी नहीं पता इस वाणी से छप रहे कविता संग्रह में यह कविता है के नहीं कह नहीं सकता।

फ़िलहाल राजकमल से भारतेन्दु पर नए दृष्टिकोण वाली वसुधा डालमिया की अनूदित किताब (जिसे छवि भंजक भी कह सकने की सुविधा हम ले सकते हैं) का इंतेज़ार है। और इंतज़ार है, कभी हमारे बहराइच से भी कोई कहानी किसी बड़े प्रकाशक से छप जाये।

वैसे हुस्न तबस्सुम निहाँ की कहानियाँ कुछ हैं भी; तो उनमें न नानपारा है, न ठीक से रिसिया। पता नहीं शायद मैं किसी और चीज़ को ढूँढ रहा होऊंगा। कुछ कुछ नॉस्टेलजिया जैसा। या कुछ और। वरना हंस में छपी इनकी कहानी कुछ कम नहीं रही। ख़ैर आप कबाड़खाना  पर इनकी कविता पढ़िये।

जून 09, 2015

आज कल

बड़े दिनों बाद आज अपने बारे में सोचता रहा। सोचता तो हमेशा रहता हूँ। पर आज लिखने के लिए थोड़ा अलग तरह से अंदर की तरफ़ लौटने लगा। जून की तपती दुपहरे कहीं जाने नहीं देतीं। फ़िर भी दोबार निकल गया। हम लोग घंटों वहीं आर्ट्स फैकल्टी की अँग्रेजी मेहराबों के बीच में पुराने दिनों को पलटते रहे। कैसे-कैसे दिन थे। इन्ही गलियारों में क्लास ख़तम होने के बाद हमसब अपने-अपने दोस्तों के साथ होली के रंगों की तरह बिखर जाया करते। आज न जाने कौन, कहाँ, किस जगह पहुँच गया। जिसे हम देखा करते, जो हमें देखा करती। सब यहीं कहीं आस-पास की दुनिया में खो गए होंगे। लड़कियाँ अपनी शादियाँ टाल नहीं पायी होंगी और हम लड़के खींचते-खींचते उसे पिछले साल तक खींच लाये होंगे। पता नहीं इस छह सालों में फ़िर उन्ही कमरों में कौन-कौन आकर अपने अपने तहख़ानों में वापस लौट गए होंगे। हम भी वहाँ से सिर झुकाये, बीत गए पलों को बटोरकर वापस लौट आए।

उसकी ट्रेन इतवार शाम की रही होगी या सुबह की। वॉट्स अप पर इस बहाने से उसका पता माँग लिया के कभी ख़त लिखुंगा। मुखर्जी नगर मुझे ऑटो पर बिठाकर वह इतनी तेज़ी से चलकर भीड़ में गायब हो गया। यह बिंब मेरी आँखों के सामने अभी भी घूम रहा है। कैसे मैं लड़के-लड़कियों में जनपथ से खरीदी टी-शर्ट के उस लाल सफ़ेद रंग को ढूँढ़ता रहा। वह गायब कैसे हो सकता है? जबकि अभी थोड़ी देर पहले ही हम दोनों इसबात पर सहमत हुए थे कि पैर अब जवाब दे गए हैं। हम दोनों इस गर्मी में खूब चलकर थकने भर का थक चुके थे। अचानक मेरी नज़र उसके रेबैन के चश्में पर गयी। हाँ वही है। पर पता नहीं क्यों वह इतनी जल्दी उस भीड़ में गुम हो जाना चाहता है। शायद हम सब इस भीड़ में गुम होने ही आए हैं। एक दिन हम सब खुद से बचने के लिए ऐसे ही गुम हो जाएँगे। हम सब गायब हो जाएँगे।
***
जब पढ़ते-पढ़ते ऊब जाता हूँ, तब सोचने लगता हूँ, हमसब एक ही दौड़ में भाग रहे हैं। कहीं कोई ऐसी जगह मिल जाए जहाँ हमसबकी ऐसी यादें इकट्ठी होती रहें, जो जब चाहें, हमें उन दिनों में दोबारा ले जाएँ। पर काश ऐसा हो पाता। कितना ही कोशिश करूँ, पर ऐसा कभी कर नहीं पाया। अगर होता तो सबसे पहले उसे अपने ख़्वाबों में लाता, जिससे मेरे दिन दिन न रहकर ठंडी शामों में तब्दील हो जाते। हम कहीं किसी सुनहरे से ढलते सूरज की चाँदनी एहसास में डूबते हुए कहीं नीचे गहरे उतर जाते। तुम अब भी मेरे पास हो पर न जाने क्यों यह शामें कहीं पीछे रह गईं। दो क़दम पीछे। तीन क़दम आगे। ऐसे ही बहुत सारे ख़याल वह भी अपने अंदर समेटते हुए बड़ी तेज़ी से ढक्का के अपने उस शांत से कमरे में लौट आना चाहता होगा। उसने मुझे बताया नहीं। पर उसके मन में चल यही रहा होगा। हमेशा, धीरे से।
***
ख़ैर, मैं बहुत जल्दी इन ख़यालों से वापस आकर उस शाम से काफ़ी पहले अपनी एक पोस्ट पर आकर ठहर गया। उसकी शुरू की तीन पंक्तियाँ नवभारत टाइम्स के ब्लॉग होस्टिंग साइट पर हू-ब-हू देखकर लगा, कोई कैसे बिलकुल मेरी ही तरह उन एहसासों को अपने भीतर महसूस कर, उन्हे वैसे ही अपने अंदर से बाहर निकालकर सामने रख सकता है। बात करने पर उसने कहा, आपको साभार नहीं दे पाया। बात ख़त्म। क्या सच में बात ख़त्म हो गयी। पता नहीं। उसे शायद नहीं पता, उन पंक्तियों को लिखने से पहले कितनी घड़ियाँ मैंने उनका इंतज़ार किया होगा। वह जैसी दिखती हैं, उसके पीछे वह शायद ही कभी पहुँचकर मुझे देख पाएगा। उसे नहीं पता उसे लिखने के बाद भी कितना कुछ मेरे अंदर अभी भी उमड़ता घुमड़ता रहा है। यह हमेशा दिख जाए हो नहीं सकता। उसे नहीं पता। उसे कुछ नहीं पता।
***
परसो राकेश की शादी की पाँचवी सालगिरह है। वह हम सबको बुलाने की फ़िराक़ में है। शायद यह दूसरी बार है, जब हमसब एकबार फ़िर दो साल बाद, यहीं दिल्ली में मिलेंगे। यह उनका तीसरा कमरा है। दिल्ली कभी उन दोनों का सपनों का शहर थी। अभी भी वह सपनों का शहर बनी हुई है। हक़ीक़त जल्दी होने वाली है। उसके लिए एक आख़िरी दौड़ बाकी है। दौड़ शुरू हो चुकी है। हम सब एक दिशा में भाग रहे हैं। भागते भागते थक रहे हैं। लगातार हाँफते हुए भाग रहे हैं। पर मान नहीं रहे कि थक रहे हैं। थक गए हैं। बस हाँफ रहे हैं।
***
इधर मैंने कल से फ़ेसबुक पर हैशटैग के साथ लिखना शुरू कर दिया है। मेरा रूट हैशटैग है, किस्सा कोताह राजेश जोशी की किताब का नाम है। उसके बाद जो जब मनमें चल रहा हो वही छापने का मन हो तो उसे वहाँ शेयर करता रहूँगा। फ़िर यह भी तो देखना है, मुल्ला की सैर किस मस्जिद तक। अपने आप को टटोलने का एक तरीका यह भी है। देखते हैं, कहाँ तक अपनी सीमाओं को तोड़कर नयी सीमाएं कौन सी बनती हैं। अभी फिलहाल अपने फ़ेसबुक पेज पर एक सौ दस लाइक देखकर, थोड़ा उन सबके बारे में सोचने लगता हूँ, जिन्हे लगता है कि मैं कुछ ठीक-ठाक कह लेता हूँ। यह कुछ ऐसा ही भाव होगा जो हमारे अंदर तो रहता होगा, पर हम उसे कह नहीं पाते होंगे। शायद। उसे यहाँ देख थोड़ा रुक जाते होंगे। ठहरकर डूब जाते होंगे। डूब जाते होंगे उन छवियों में। शब्दों के पीछे रह गयी तसवीरों में। कहीं कोई आवाज़ सुनाई दे गयी होगी। उन सबको वहाँ कभी शुक्रिया नहीं कहा और शायद इससे बेहतर कभी उनसे कह भी नहीं पाता। कभी नहीं कह पाता। 

आवाज़ें..

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