जुलाई 31, 2015

पिक्चर पोस्टकार्ड

वह उस कमरे में साड़ी पहनकर खड़ी है। साड़ी कुछ घाघरे जैसी दिखती रही। जैसे कहीं राजस्थान या गुजरात में उसका घर हो। तस्वीर वह खुद भी थी और उसके पीछे दीवार पर भी एक और तस्वीर लगी हुई है। फ़ोटो बहाई मंदिर, लोटस टैम्पल, नेहरू प्लेस की है। शायद हम उन्ही की तस्वीरें लगाते हैं, जिन्हे सबसे जादा अपने ख्वाबों में महसूस करते होंगे। जैसे उसके साथ मेट्रो से फरीदाबाद तक जाने का सपना सपना ही रह गया। वह कभी मेरे लिए ओखला मंडी भी नहीं आई। जैसे उस सुबह सबलोग अनिल कपूर की फ़िल्म, मुसाफ़िर देखने पारस  जा रहे थे। तुम चलते-चलते रुकी और रुक गयी। पीछे मुड़ी। फ़िर मुझे वहीं बैठा देख, तुम नहीं गयी। पता नहीं चार सौ सत्ताइस नंबर बस अब भी कालकाजी कृष्णा मार्केट होकर आती है भी या नहीं। हम आमने सामने बस स्टैंड पर खड़े रहते। देखते जब तक ओझल न हो जाते। सामने से नहीं बस की खिड़की से गर्दन तिरछी करके दिल के अंदर तक उतरती जाती नज़रों के साथ।

उसने कभी अपनी शादी के बारे में नहीं बताया। बस एक शाम अपनी एफ़बी वाल पर कह दिया- उन्हे गुस्सा कभी नहीं आता। इस एक पंक्ति के बाद हमारी अधूरी कहानी वहीं ओखला मंडी पर छूट गयी। 

{अधूरे किरदारों की अधूरी कहानी से..}

जुलाई 29, 2015

उदास शाम में दिल्ली होना

जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है,  हम वापस अपने अंदर लौटने लगते हैं जैसे। जैसे कहीं अनजानी जगह फँसे रहने का एहसास अंदर-ही-अंदर चुभता रहता है। कोई बहाना होता, जो वापस ले जाता। पर बहाना ऐसा, जब हम खुश हो सकें। खुश होकर ख़ुद को देख सकें। ऐसा न हो जब हम लौटकर वापस आयें तब तक सूरज ढल चुका हो। अँधेरा डराता नहीं, बस सबको अपने अंदर समा लेता है। जिसे हम देखना चाहते हैं उसे भी। भले हमें उनका आभास होता रहे, पर वह सामने होते हुए भी सामने नहीं होते। बाबा ऐसे ही किसी तत्व में तब्दील हो गए हैं। इसी तरह वह सब लोग भी जो हमारे बचपन में उमरदराज़ थे, धीरे-धीरे गायब होते रहे। गायब होना रातरानी के फूलों की ख़ुशबू और उस मौसम की ठंडक में शामिल होते जाना कभी नहीं रहा। वह यादों का खो जाना था। 

यह उस एहसास से भर जाना था, जब हम कुछ नहीं जानते थे, तब वह हमें अपनी दुनिया में शामिल कर रहे थे। कि एक दिन आएगा जब हम नहीं होंगे, तब यह हमें याद किया करेंगे। हो सकता है उन्होने कुछ और भी सोचकर रखा हो, पर इस बात के अलावे कोई बात उन्होने हमें नहीं बताई। हम ख़ुद कौन-सा उनके पास रहे। यह शहर हमें ज़िंदा रखने के एवज़ में रोज़ थोड़ा-थोड़ा निगलता रहा है। यह ऐसा तिलिस्म है, जहाँ हमें अपने होने का एहसास तो होता है, पर असल में वह वैसा होता नहीं है। यह बिलकुल ऐसा ही है जैसे हम किसी रात उनींदे जगकर नींद में चल रहे उस सपने में वापस लौटने की ज़िद में आहिस्ते-आहिस्ते छत के तीन चक्कर लगाकर भी नहीं थकते। सोचते रहते हैं, जैसे वह अभी याद आ जाएगा और हम सामने खुलते परदे में दाख़िल होते ही वहाँ पहुँच जाएँगे। कभी ऐसा किसी के साथ हुआ हो तब वह भी एक सपना ही होगा, तिलिस्म भरा। अधूरा बिलकुल हमारी साँसों की तरह। फेफड़ों के बीच धड़कते मैदे में फँसा हुआ सा।

कभी-कभी मम्मी कहती हैं, हम लोग भी घर से इतनी दूर पड़े हुए हैं। किसके लिए? पता नहीं। तब पापा अपनी अम्मा को याद करते करते कहीं दूर निकल जाते हैं। माँ धानेपुर अपने मामा के यहाँ या नानी के सेवढ़ा वाले घर पहुँच जातीं। फ़िर पापा कछोली, गुजरात में चीकू के पेड़ों की यादों में डूबते जाते। साइकिल से उन खजूर के पेड़ों के नीचे सड़क पर दूर-दूर तक कोई नहीं होता। पापा मम्मी को हमसे पहले वह सब जगह घुमा लाये हैं। हमारे लिए दिल के एक बड़े से कोने में यह जगह गाँव ने भरी। जहाँ बाबा हैं, दादी हैं। संदीप है। चाचा-चाची हैं। खपरैल वाला घर है। एक छत है, जिसपर उमस भरी डूबती शाम हम सब भाई-बहन चटाई लेकर बैठ जाते। दुआरे एक कुआँ रहा, जो अब सिर्फ़ दूल्हे के बरात जाते वक़्त कुआँ पूजय काम आवत हय। बिजली के खंबे हैं, तारें हैं पर चाचा ने बिजली नहीं ले रखी। एक सौर ऊर्जा का बैटरा है, उसी को धूप से चार्ज करके दुकान में बलब जलाते हैं। जो बच जाता है, उससे रात में एक छोटा-सा टेबल फ़ैन चलता है।

इस तरह यह दिल्ली कभी मुझे उस तरह कभी रोक नहीं पायी। हमेशा इसे अपने अंदर दाख़िल होता देख डर जाता हूँ। इस एक कमरे में फैली दुनिया काटने को दौड़ती है। यहाँ हम छह लोगों के सिवा कोई नहीं है। जैसे हम सब अँग्रेज़ बहादुर के कहे किसी काला पानी की सजा भुगत रहे हों। मैं कितना भी इस जगह से भागना चाहूँ, ख़ुद को बचाए रखने, उन यादों को समेटे रहने के लिए बार-बार उसे कहीं तहख़ाने में बंद कर चाभी अरब की खाड़ी में फेंक आऊँ, वह समंदर की लहरों के साथ वापस इस साहिल लौट आती हैं। पता नहीं यह सिलसिला कहाँ जाकर ख़त्म होगा। शायद वहाँ, जब हम लोग, अपने ख्वाबों में यह तय कर लेंगे कि अब लौट चलते हैं। अब बहुत हुआ, इससे जादा सहन करना खुद को तपती धूप में नंगे सिर कुर्सी लगाकर बैठे रहने जैसा लगने लगा है। यादें बेतरतीब होती उलटने-पुलटने लगी हैं। जैसे लग रहा है हम सब वक़्त से काफ़ी पहले बूढ़े हो गए हैं। कमर झुककर सुबह कपड़े सुखाने वाली तार की तरह हो गयी है।

इससे जादा शहर किस तरह डराता है, मालुम नहीं। पता नहीं डर लगता है, हम कहीं डरना न भूल जाएँ। इसलिए लौट चलते हैं। वापस।

{हफ़्ता भर पहले यह आज के दिन शनिवार को आया और हमारी नज़रों से बचता रहा। हमें कभी पता भी नहीं चल पाता। पर आज पापा ने इसे पकड़ लिया। अख़बार हिंदुस्तान, कॉलम: साइबर संसार। पन्ना बारह। तारीख: आठ अगस्त, साल: पंद्रह। नाम:यादों का दरीचा। }

जुलाई 27, 2015

मँझले बाबा नहीं रहे..

जिस उम्र में बाबा हमारी उम्र के रहे होंगे, तब पता नहीं कितने गरीब रहे होंगे। कहते हैं, गरीबी एक दिन सबको लील जाती है। यही आज सुबह उन्हे अपने साथ कहीं ले गयी है और अभी तक उन्हे वापस नहीं लाई है। घूमने के शौक़ीन तो वे शुरू से ही रहे हैं, चल पड़े होंगे। बेधड़क। बिन सोचे समझे। बाबा भी कितने चालक निकले। किसी शातिर सेंधमार की तरह। रात को सोते वक़्त ही मन में ठान लिया होगा, अब वापस नहीं लौटेंगे। लौट कर करेंगे भी क्या? कुछ करने लायक बचे भी तो नहीं। वह सच में बहुत बूढ़े हो चुके हैं। जब आदमी बूढ़ा हो जाता है, तब पता नहीं क्या-क्या सोचने लगता है। इस दो साल पहले की इस तस्वीर में भी कुछ सोच रहे हैं शायद। शायद तब भागने की योजना सफ़ल होते-होते रह गयी होगी। या पता नहीं क्या बात है, जो लड़के की शादी में भी ख़ुश नहीं हैं। बारात ललिया से लौट आई है। शायद वहाँ हुई मारपीट को याद कर दुखी होंगे।

ऊपर सबकुछ कितना धुँधला दिख रहा है। जब बाबा ने इसे देखा, तब उन्होने भी सबसे पहले यही बात कही। लेकिन कोई कितनी ही धुँधली तस्वीर हो, हम ख़ुद को पहचान लेते हैं। उन्होने भी ख़ुद को पहचान लिया। आज यहाँ मुझे सिर्फ़ वही दिखाई दे रहे हैं। कभी अधूरे, कभी धुँधले, कभी खोये हुए से। तस्वीर में गलत जगह होने की टीस से मन में बन गयी गाँठ गिरह बनकर उलझ गयी होगी। खोल रहे होंगे पर खुल नहीं रही होगी। सब कह रहे हैं, कल रात से बाबा इसी तखत पर सोते रह गए। सुबह आई, पर उनकी सुबह नहीं लायी।

बुढ़ापा अपने आप में मृत्यु का हमारी परछाईं की तरह स्पष्ट दिख जाना है। हमें पता है, वह बिलकुल हमारे पैरों के नीचे आ चुकी है पर हम बेख़बर रहते हैं। बाबा भी एक दौर रहा होगा, जब बेख़बर रहे होंगे। यह वक़्त हमारी युवावस्था के दिन होते होंगे, जब ज़िंदगी सबसे जादा ख़ुशनुमा होती होगी। वह भी क्या दिन रहे होंगे, जब वह अपनी पूरी पलटन के साथ बिना रिज़र्वेशन मैलानी से बरेली, बरेली से दिल्ली के लिए बिन सोचे समझे गजरा खरीदने चल पड़ते। सदर बाज़ार से इसी मौसम में घूमते, पैसे कम कराते पाकीज़ा ख़रीदते। कितने बड़े-बड़े पटहर वहाँ इन्ही धागों का काम करते हैं। वे उन्हे जानते भी होंगे, पर कभी उनके यहाँ गए हों, इसके बारे में हमें लौटकर कभी नहीं बताया। जहाँ तक मुझे लगता है, वह कभी गए ही नहीं होंगे। पैसा एक तरह के अलगाव का सृजन करता है। हो तो हम ख़ुद अलग हो जाते हैं, न हो तो हमारी यह इच्छा कोई अर्थ नहीं रखती। आप ख़ुद बख़ुद एक अलग तरह के एकाकीपन में सिमटकर रह जाते हैं।

बाबा शायद इसी से लड़ रहे थे। तभी नानपारा, बाबागंज, उतरौला, भिठीहा, बदला, जमनहा, गिरन्ट और पता नहीं कहाँ-कहाँ से उनके साथ बिरादरी के लोग स्टेशन के पास हमारा घर देख गए और कई सालों तक लगातार वक़्त बेवक़्त यहाँ एक कमरे के घर पर धावा बोलते रहे। यह एक तरह का हमला ही हुआ करता। बहुत सालों बाद जब इस आने-जाने की कवायद से यह स्पष्ट हो गया कि हमारे पापा उनमें से किसी की लड़की के साथ अपने दोनों बेटों की शादी करने में किसी भी तरह की आतुरता से ग्रस्त नहीं हैं, तब लड़कियों के तो ख़ैर दिल टूटने वाली उमर में क्या रहे होंगे, न जाने कितनी लड़कियों की माताओं के दिल टूटकर बिखर गए होंगे। इसतरह सारी बटालियन भंग हो गई होगी और न जाने काल के ग्रास में कहाँ बिला गयी होगी। बाबा ने भी वक़्त के साथ दिल्ली आना कम कर दिया। दिल्ली जो दो क़दम पर थी, वहाँ सालों बाद भी वह वापस नहीं लौट पाये। वह लौटकर एकबार यहाँ आना भी चाहते होंगे, तो भी आ नहीं पाये होंगे। 

पापा हर साल जाते हैं और सुरेस को कहते हैं, ज़रा ध्यान रखा करो। पता नहीं उसने कितना ध्यान रखा होगा। हमसे छोटा है, पर हमारा चाचा है। इधर पता चला उसके ध्यान रखने का अलग अंदाज़ है। चाची को लेने ससुराल जाना है इसलिए बाबा को दुआरे पड़े तखत से उठाकर अंदर लेटा दिया और बाहर से ताला लगाकर दो दिन के लिए गायब हो गया। न उठ पाते हैं, न चल पाते हैं। प्यास लगे तो किससे पानी माँगे। पेसाब लगे तो कौन उठाकर पिछवारे ले जाएगा। इन सवालों से बचने की कौन सी युक्ति उसने अपनाई होगी, अभी तक हमें पता नहीं चली है। पिछले साल हम वही थे, जब बाबा आसाम चौराहे पर चोटाय गए। अपनी पेन्शन लेकर बैंक से लौट रहे थे। सुरेस को कितना बोला था, ज़रा ध्यान रखा करो। एक एक कर पता नहीं कौन सी बातें याद आ रही हैं। गुधड़िया बाबा से लेकर मुहर्रम पर तहजिया निकलने तक। उनका छोटा सा बिसातखाना। कभी एक दौर ऐसा भी रहा होगा, जब कोई ऐसा मेला नहीं रहा होगा, जो उनके पहुँचने से पहले शुरू हो जाया करता हो। भले वहाँ कमाई से जादा ख़र्चा हो जाये पर कोई मेला नहीं छूटता उनका।

हमारे बाबा शांत स्वभाव के रहे। जैसे-जैसे बूढ़े होते गए चुप होते गए। कहते हैं, बोल भी नहीं पा रहे हैं कुछ। तभी रात में ही चुपके से चले गए होंगे। सोच रहा हूँ, अब वह मेले उनके न पहुँचने पर कैसे शुरू होंगे। मेरे पास उनकी कौन सी याद बची हुई है। बहुत सोचने पर याद आया, अभी पार साल उनके हाथों से काले रेश्मी धागों की बनाई करधन पहने हुए हूँ। यह दादी के बाद  दूसरी बार है, जब हम अभी पिछले बुधवार को टिकट बनवाने की बात कर रहे थे कि एक हफ़्ते के लिए सब गाँव चलते हैं। हम यहाँ लैपटॉप पर टिकिट ही देखते रह गए। इससे पहले कि हम वहाँ पहुँचते, आज सुबह गाँव से फोन आ गया। बाबा नहीं रहे। आहिस्ते-आहिस्ते सब जा रहे हैं। बहुत दूर। 

जुलाई 23, 2015

छपने की राजधानी

वह लोग ऐसे समय में जी रहे थे, जहाँ इस शहर के अलावे कहीं किताब लिखने वाले नहीं बचे थे। जिसे आना था, जिसे छपना था, उसे इस राजधानी आना पड़ता। यह मजबूरी कम सुविधा अधिक थी। यह उन सबका संगठित प्रयास था, जो लेखकों को यहाँ अपने आप खींच लाता। कोई भी होता उसे पिताजी मार्ग पर कुछ देर चलकर ख़ुद को थकाने का अभिनय करना पड़ता। इस तरह बदरिया घाम में बिन पानी पिये टहलने का छद्म संघर्ष बाकी सबको आपके लेखन के प्रति प्रतिबद्धता तुल्य लगता। इसका एक अनुवाद सरोकार में भी किया जाने लगा। सब इस प्रक्रिया में साथी पैदल सवार को पहचान रहे होते पर पहचानने से बिलकुल मना कर देते। मना करना मित्रता का एक और अवसर लेकर आता। जानकर भी अनजान बने रहना इसकी सबसे सफल और सदियों से आजमाई तरकीब ठहरती। वह बालम खीरे की तरह दोनों के हाज़मे को दुरुस्त ही नहीं करती बल्कि उनके वैचारिक उद्वेलनों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षणों में पाद के रूप में निकलने वाले नाद स्वर में भी एक तादात्म्य स्थापित कर सम्बन्धों में तत्काल मधुरता के संचार का अनिवार्य हेतु-सेतु बनकर उभरती।

इन सब महान आत्माओं के इस अकिंचित अपरिचित स्थान पर ठहरने का बंदोबस्त पिछली सदी के सन् उन्नीस सौ बाईस में अंग्रेज़ सरकार ने किंगस्वे कैम्प के पास एक सराय बनाकर किया। वह आज़ादी के साल देश का बँटवारा निपटाकर यहाँ से चली गयी। एकबार की गयी वह फ़िर कभी वापस नहीं आई। उसने आने की ऐसी उत्कट इच्छा कभी प्रकट भी नहीं की। आज वह दूर देस से इन्हे देखती होगी तो फ़ूली नहीं समाती होगी। उसे इन सबको अपने नुमाइंदों के रूप में चुन लेना कितना कारगर लग रहा होगा। काम उसी का हो रहा है, बस हमें पता नहीं चल पा रहा। या पता चलते हुए भी हम अनजान बने रहने में ही अपनी ख़ैर समझते हुए चहल कदमी कर रहे हैं।

लेकिन इस बहस का कोई ओर छोर पकड़ने का अभी वक़्त नहीं है। अभी तो बस इसका एक अर्थ यह निकलता दिख रहा है कि अगर वे सब मास्टर थे,  तब यहाँ पढ़ने वाले भी रहे होंगे। उनको पढ़ाये जाने के लिए पाठ्यक्रम भी बनाया गया होगा। पाठ्यक्रम बिना छपी किताब के अधूरा रह गया होगा। पहली किताब छपी दैनिक मिलाप की बहादुरशाह ज़फ़र मार्ग वाली प्रैस में। पर बगल वाली इमारत के अहाते में बनी झुग्गी में रहने वाले अब्दुल करीम और उसके पड़ोसी राम जियावान मिसरा की अर्जी पर कोर्ट ने तत्काल संज्ञान लेते हुए कहा होगा, ‘चुपचाप अपनी प्रैस लेकर यहाँ से चले जाओ!’ अब सब मरते क्या न करते। उन्हे डर था के कहीं उनके छापेखाने से आती भयानक आवाज़ों से झुग्गी की छत में छेद हो गया तो लेने के देने पड़ जाएँगे। टिटहरी प्रकाशन एक दिन वहाँ से चलकर नयी इमारत में आ गया। अब उनका नया पता था: 1-ए, पिताजी मार्ग, दलीचागंज, नयी दिल्ली। गोलचा सिनेमा के बिलकुल सामने। पीछे गली में नहीं।

पश्चलेख माने पोस्ट स्क्रिप्ट:
उपरोक्त टंकित प्रत्येक पंक्ति से उछ उछलकर बाहर निकलने को आतुर सभी पात्र, स्थान, और घटनाएँ काल्पनिक हैं। इनका  यथार्थ से मिलान महज संयोग है। उसी तरह जैसे आज आठ बजकर चौबीस मिनट पर विनीत की फ़ेसबुक पोस्ट से मिल जाना अनगिनत संयोगो में से एक संयोग है। बाकी खत्म करने से पहले अखिलेश के निर्वासन की पंक्तियों से सादर चुराये गए विन्यास के लिए क्षमा प्रार्थना।

जुलाई 22, 2015

नौकर की कमीज़

वह रोज़ रात आधा पहर बीत जाने के आस-पास पसीने से तरबतर कपड़ों में ख़ुद को ढोते हुए लौट आते। लौटना कमीज़ को वापस घर लाने की तरह होता। वह कोई चित्रकार नहीं थे। पर उनके इस कैनवस पर रोज़ अलग-अलग तरह की चित्रकारी होती। कभी बनियान में अरझी सूखी घास का तिनका किसी किले की सबसे ऊँची दीवार पर लगी तोप की तरह लगता। दुनिया की सबसे ऊँची तोप बुर्ज़ खलीफ़ा की छत पर। पर वह किला नहीं है। वह एक झुलसते रेगिस्तान में खड़ी इमारत भर है। इसलिए तोप भी नहीं होगी, यही सोच सब चुप हो जाते। कभी ऐसा होता कि दीवार की सफ़ेदी उखड़े हुए पलस्तर के बुरादे में पेशाब की गंध भी आकर मिल जाती। फिर उसकी अगली सुबह अक्सर अधजली बीड़ी का धुआँ सुबह-सुबह अम्मा की आँखों में कोहरा बनकर बिखरता दिखाई देता। आँखें सिर्फ़ माँ की नहीं दुखती, छत भी उनके साथ रोने लगती। रोना कमीज़ को धोते हुए पानी में भिगोने की तरह सहज होता। वह कभी इसे धोना नहीं चाहती थी। वह इसके एक एक रेशे को उधेड़कर, उसे धागे में तब्दील कर, दोबारा बुनना चाहती। असल में बुनना वह अपनी इस बिखरी हुई ज़िंदगी को चाहती थी। पर इसमें सिर्फ़ वही विफल नहीं हुई थी। बहुत बड़ी दुनिया पहले ही किसी अँधेरे कोने में सिमटकर चुप हो गयी थी। चुप्पी चुप हो जाने के बाद भीतर सन्नाटे के फ़ैलते विस्तार का सूचक थी।

इस घर की दीवारों में चुप्पी सफ़ेदी की तरह पसरी बैठी रही। उसने घात लगाकर सबको अपने क़ाबू में कर लिया था। अब वहाँ कोई पिता से खाने के लिए नहीं पूछता। उनके आने पर सब चुप रहते। वह जब भी लौटते किवाड़ को पल्ला कम और अपनी पिछली दिहाड़ी में टूट गए ठेले की इकट्ठा पड़ी लकड़ी का ढेर समझते। उनके समझने का अगला हिस्सा उनके मन में घटित होता। जहाँ वह सोचते अभी उनके पिलपिले बाजुओं में असीम ताकत आ जाएगी और वह पुराने धर्मेंद्र बनकर उस टूटे हिस्से को उठाकर अम्मा पर टूट पड़ेंगे। यह कूट भाषा इधर कुछ जादा ही प्रयोग में आने लगी। बातचीत में भी उनकी रुचि दिन पर दिन खाना पानी माँगने तक सिमट कर रह गयी थी। वह सब मिलकर इस युग के भर्तृहरि बनते जा रहे थे। इस उत्पीड़ित भाषा का अपना सौंदर्यशास्त्र गढ़ रहे थे, जहाँ सिर्फ़ बेचैनी, हार, कुंठा, गरीबी, डेढ़ कमरों वाली झोपड़ी, घर से पौने सात वोट और उन दिनों में छह बोतल विदेसी शराब का तोहफ़ा मिलता। यहाँ बाकी चीज़ें साँसों के साथ मुफ़्त थीं। जिसने उनके भीतर निराशा, मौत, पीड़ा का मिला जुला दर्द भरा रहता। सपने देखने वाली आँखें फूट चुकी थी और दिल रो रोकर मर चुका था। यहाँ मरना किसी स्थिति को प्राप्त होना नहीं था। यहाँ ज़िन्दगी का ही दूसरा नाम मौत था।

वह रिक्शा चलाते हैं। उनकी आदत है, आखिरी मेट्रो के वापस लौट जाने के बाद आगे पीछे इत्मीनान से सीढ़ी से उतरते लोगों को अपनी आख़िरी सवारी के रूप में देख लेने की तसल्ली कर लेने के बाद, उनमें से किसी को उसके घर पहुँचाकर अपने घर लौटना। वह बीच में किसी लेम्पोस्ट के नीचे पढ़ रहे अपने बच्चों की तरफ़ ऐसे देखते जैसे देखा ही न हो। उनका बड़ा लड़का किसी इम्तिहान में बैठने की तय्यारी कर रहा है। उसने किसी से बात की है। वह कह रहा है, डेढ़ लाख में काम हो जाएगा। जुग्गी, टुटहे ठेले और रिक्शे के अलावे घर में दो बहनों के सिवा अधेड़ हो चुकी अम्मा हैं। कोई उसके पिता को कह रहा था, हरियाणा में उनकी दोनों बेटियों के लिए लड़के देखें हैं। आदमियों की उमर भी कोई उमर होती है। यह सुनने के बाद से अम्मा रो रही हैं और वह सोच रहा है, बहनों के चले जाने से उसका काम बन जाएगा।

{असल तस्वीर इससे भी भयानक है। सच में, सच कह रहा हूँ। इससे अमानवीय तस्वीर आज तक नहीं देखी। तस्वीर पर कर्सर लेजाकर बड़ा करके देखिये। पता चल जाएगा, आप इंसान हैं या इंसान होने का नाटक कर रहे थे अब तक। }

जुलाई 21, 2015

वह हू बहू ऐसी ही थी।

उसने कभी सोचा नहीं था के आज बरसात के बाद इस ढलती शाम में अचानक वह फ़िर दिख जाएगी। वह अभी भी साँवली थी। उसे यह रंग सबसे जादा पसंद था। अपना नहीं, उस लड़की का। जैसे अभी भूरे बादलों ने उजले आसमान को ढक लिया हो। वह अपने दिल की धड़कनों में ढलते हुए सूरज की तरह धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा। उसके पास इस बार भी उसकी तस्वीर उतार लेने के लिए कोई चीज़ नहीं थी। वह पिछली बार की तरह इस बार भी दोबारा अपनी आँखों में उन आँखों की परछाईं तलाशने लगा। उसने तब उपाध्याय की दुकान पर आहिस्ते से किसी किताब का नाम पूछा था। वह सुन नहीं पाया। किताब कहीं दूर से आने वाली थी। ऐसा सुनकर वह चुपचाप अपने दुपट्टे को सहेजते हुए वापस रिक्शे पर बैठ गयी। वह दीप्ति नवल नहीं थी। वह फ़ारुख शेख नहीं था। यह दिल्ली का मुखर्जी नगर भी नहीं था। यह कचहरी रोड, बहराइच की छोटी-सी दुकान से निकली लड़की थी। जहाँ अपना नंबर कटता देख, सब लड़के उस लड़की के भाई बनकर शोहदे लड़कों को इसी तरह पहचान कर पीटने में ज़रा भी देर नहीं लगाते।

यह सब जो बीत चुका है, अभी कुछ देर पहले तक वहीं उसी जगह बर्फ़ की तरह जमा हुआ रहता। अगर उसने नानपरा स्टेशन से बाहर निकलते हुए पलटकर दोबारा न देखा होता। गाड़ी बुलेट ट्रेन नहीं थी, साधारण सवारी गाड़ी, पैसेंजर थी। वह जगजीत सिंह से किसी भी मानी में कम नहीं थी। उनकी किसी कम पसंद गज़ल की तर्ज़ पर आहिस्ते-आहिस्ते प्लेटफ़ॉर्म छोड़ते हुए बीच में दोबार रुक भी गयी। सच, इस सीन को अपनी आँखों के सामने घटते देख, उसे अपनी मरती हुई सगी नानी के गले में अटकी हुई पौने दो-सवा तीन साँसें की याद हो आई। हलक में उसके भी थूक बलगम जैसा कोई पदार्थ अटक गया, जब उसने उसकी बायीं कलाई पर लाल धागा बंधे हुए देखा। इसका क्या मतलब हो सकता है, इसकी अनंत संभावनाओं को टटोला जा सकता था। पर उसने शादी, पति, ससुर, बच्चे आदि सभी कयासों को शहनशाह टेलर से सिलाई हुई अपनी पैंट की चोर जेब में सिकुड़े-मुकड़े दस रुपये के नोट की तरह कोंचते हुए रख लिया।

उसने साथ में यह भी याद से अपने दिमाग में टाँक लिया कि वह बिलकुल इसी क्षण से कालिदास के दुष्यंत परिवर्तित होने वाला है। वह सब कुछ भूलकर भी याद रख लेगा। इसी उधेड़बुन में उसे फ़ेयर एंड लवली के विज्ञापन का ख़्याल आया। वह सोचता रहा, उस लड़की की खाल का रंग साँवला कैसे रह पाएगा? उसने मन के खाली दरवाज़ों को पटकते हुए पाया कि इस फैसले के बाद से कोई भी लड़की अगली शकुंतला बन जाने की आहर्ता को आसानी से प्राप्त कर जाएगी। उनका अभिज्ञान शाकुन्तलम् कहीं कोई भवभूति बना लिख रहा होगा। 
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एंड नोट: ताकि सनद रहे।
मसान की कहानी क्या है(?) नहीं पता। फ़िल्म के ट्रेलर में लड़का-लड़की किसी अनाम से स्टेशन पर लोहे के बेंच पर बैठे कुछ सोचते, खोते, गिरते-पड़ते बात कर रहे हैं। पूरा किस्सा खुलेगा चौबीस जुलाई को। किसी पीवीआर में। वहाँ जाने की औकात हमारी नहीं। पर ऐसे ही शाम को कॉफी के बाद दिमाग थोड़ा बादलों में कहीं खो गया।  यहाँ भी प्लेटफ़ॉर्म संज्ञा की तरह है, वह भाववाचक संज्ञा में तब्दील नहीं हो पाया है। किन्ही मरे हुए शब्दों से घिरा हुआ। इसलिए आगे और नहीं लिख पाया। फ़िर उसमें तस्वीरों वाली नन्दिता दास भी नहीं हैं। न मेरा बेंगॉली लड़कियों को लेकर कोई ऑबसेशन है। दिमाग दौड़ाया तो साँवली याद करने पर यही याद आई।

फ़िर याद आयीं स्मिता पाटील और दोबारा से दीप्ति नवल। शबाना आज़मी कभी याद नहीं आतीं। बस याद आता है, उनका अर्थ का गाना सामने राज किरण बैठे हैं। और साथ बैठी हैं, उन सबकी परछाईं। परछाईं में भी सब उनकी तरह चुप हैं। बिलकुल चुप। 

जुलाई 11, 2015

बारिश

{यह भी बारिश में होने की एक स्टीरियोटाइप कहानी है। छोटी-सी कहानी। बारिश के पानी में भीगते हुए भागने की कहानी। उनके पास छाता नहीं है, जिसे हम छतरी कहते हैं। इसलिए दोनों भीग जाएँगे।}

 बूँदें थीं, कि रुक नहीं रही थी। उन्हे तीन दिन हो गए, लगातार। अपने वजन को सहन न कर पाने पर उन्हे बरसना पड़ता। बरसना, दिल धड़कना रहता। वह दोनों इस मौसम से सबसे जादा प्यार किया करते। ठंड के बाद यह दूसरा मौका आता, जब दोनों सिकुड़कर एक-दूसरे में आराम से समा सकते थे। दोनों इस धरती से भी जादा आपस में प्यार किया करते। दोनों कभी साथ नहीं पढ़े। इसलिए अब एक-दूसरे की आँखें पढ़ रहे हैं। यह उनके रोमेंटिक होने का पहला सबूत था,  अभी कुछ देर की वॉकिंग के बाद इंडिया गेट पहुँच जाना दूसरा सबूत होगा।

वह करें भी तो क्या करें? लड़का-लड़की जब साथ होते हैं, ऐसे ही मौसमों की अनदेखी खूबियाँ जान जाते हैं। यह दोनों भी जान गए होंगे।

होती हर मौसम की होंगी, पर इन बूंदों का मन पर कुछ इसतरह असर होता कि अंदर काली चींटियों की तरह कुछ रेंगने लगता। जैसे भुरभूरी मिट्टी से केंचुए रेंग रेंगकर निकलते और आहिस्ते-आहिस्ते लौट जाते। यह गुदगुदी इन बूंदों के अपने ऊपर पड़ने पर और भी महसूस होतीं। इसलिए आज वह गुलाबी सलवार पहनकर आई थी। जिसका मलतब था, आज बारिश में भीगना है।

हाव स्लेव्स में वह हमेशा पारियों की शहज़ादी लगती। आज भी लग रही थी। आज सुबह उसका सपनों का शहज़ादा नाई की ढाबली बंद होने पर दाढ़ी के साथ पूरे दफ़्तर में घूमता रहा। बात-बात में अपनी दाढ़ी चुभाता रहा। वह बहाने बनाने में एकदम शकुंतला देवी ठहरता। उसकी ऐलोवेरा क्रीम की तरह मुलायम, कोमल, गोरी-गोरी बाहों ने तांबे की खामोश चुभन में इस मौसम में पहली बार ख़ुद को सिकुड़ता हुआ महसूस किया। प्रतिक्रिया स्वरूप दोनों ने पहली बार महसूस किया कि अब दोनों तरफ़ समान समानुपात में एक दूसरे को पास लाकर, अपनी बाहों में भरकर किसी पेड़ के पीछे जाकर छिप जाने का वक़्त आ गया है। अब और देर नहीं।

पर नहीं। दोनों तो जुकरबर्ग के लिए प्यार करने यहाँ आए थे। कितना कहा था उसने, सेल्फ़ी-स्टिक ऑर्डर कर दो। पर वह टालता रहा और उसका खामियाजा अब दोनों एक-दूसरे की आँखों में पढ़ते पाये गए। नहीं खिंचवा पाते चिपक-चिपक के फ़ोटो और इससे जादा क्या होता? क्यों ज़िद करके उसे भी दफ़्तर से अपने साथ घसीट लाये। दोनों ने इस परिघटना को स्थगित करते हुए सबसे पहले उसे रवाना करना ठीक समझा। दोनों ने एकसाथ सोचा, मुनिरका की बस शिवाजी स्टेडियम से चल पड़ी होगी। पाँच मिनट में रेल भवन पहुँच जाएगी।

अचानक दोनों बेतहाशा भागते दिख रहे हैं। कैमरे वाला साथी वहीं बुत बना बारिश में भीगता रहा।

वह लड़की का छोटा भाई है। अभी यह बात दोनों के दिमाग में नहीं है। अभी बस एक खयाल है। भागकर इस बरसात में बस मिल जाये। वह एक बार ऐसा भोपाल में भी कर चुके हैं। तब पीछे छूटने वाली लड़के की बहन थी। बड़ा ताल से लौटते हुए न्यू मार्केट की दुकान पर। उनके पास पीवीआर ‘डीबी मॉल’ की टिकटें दो थी। यह गर्मी के मौसम की खोल थी। यह उन्हे वहीं बेमतलब खाली-सी मिल गयी थी।

जुलाई 07, 2015

तुम्हारी शक्ल के सपने..

शहरों में जो लोग अपने सपनों के साथ दाखिल होते हैं, कभी कोई उनसे उनके सपनों के बारे में नहीं पूछता। उन्हे कहीं कोई ऐसा भी नहीं मिलता, जो उन अधूरे सपनों को किसी किताब में लिखकर, किसी जगह कतरन बनाकर अपने पास रख ले। कभी कोई होता, जो उस किताब को पढ़कर अपने जैसे सपने देखने वाले की तलाश में निकल पड़ता। उसे ढूँढ़ता, मिलता, बात करता। सुख-दुख का साथी बनता। मैंने जो कोशिश की वह उस अनुपात में बहुत छोटी साबित हुई। जितना करना चाहा, नहीं कर पाया। एक दिन ऐसा आया जब अपने पास देखता हूँ, तब पता चलता है, एक एककर सब दोस्त यहाँ से चले गए हैं। किसी के सपने की याद मेरे पास जमा नहीं है। एक थी, वह पानी में भीग गयी।

दिल्ली तुम्हारे लिए कैसा शहर रहा होगा? इसे तुम्हारे अर्थों में ‘सपनों का शहर’ कहना, अपने अंदर के भावों को समेटकर कहीं चोर जेब में रखकर भूल जाना है। धीरे-धीरे तुम इस सपनीली दुनिया के बाहर निकलते हुए, बहुत निर्मम अमानवीय दुनिया में चले गए। जहाँ अधूरे, असमाप्य, अंतहीन सपनों की काली अँधेरी सुरंग है। सब ख़ुद को जिंदा रखने की जद्दोजहद में उन तमाम असफलताओं को अपने कन्धों पर रखे हुए तिल तिलकर मर रहे हैं। कन्धे थक जाते हैं, तो कहीं उतारकर रख भी नहीं सकते। वहाँ उन सपनों को टाँगने के लिए कोई सुविधाजनक खूँटी नहीं रहती। कील, हथौड़ी, अद्धा, सरिया कुछ भी ले जाओ, सबमें जंग लग जाता है। सब गल जाते हैं। पिघलकर मोम बन जाते हैं। मोम इतना गरम कि चिपक जाये तो खाल खींच ले। इसलिए ज़रा बचकर। इसका तिलिस्म इतनी जल्दी नहीं टूटता।

इन बीते सालों में लगता है, तुम कहीं डूबते रहे हो। जैसे उस शनिवार इटारसी होते हुए दिल्ली आते वक़्त तुम्हारी ट्रेन कैंसिल हो गयी, और जनरल बोगी में सफ़र करते हुए यहाँ पहुँचे, वैसे ही तुमने अपनी नींद से सारे सपने कहीं किसी और रूट पर भेज दिये हैं। वह भी अपनी मंज़िल पर पहुँचेंगे, पर थोड़ा वक़्त लगेगा। लेकिन इससे पहले, तुमने जो अपने ख़्वाब उन पटरियों से बहुत दूर कहीं छिपा लिये हैं, उन तक एकबार फ़िर लौट जाओ। पर मुझे पता है, तुम कभी कोई ख़ास कोशिश नहीं करते। शायद उन खचाखच भरे डिब्बों की भीड़ तुम्हारे मन में घर कर गयी। सोचते होगे, कैसे उनके बीच ख़ुद को ढूँढ़ता फिरूँगा। पर दोस्त, क़दम तो बढ़ाओ। धीरे-धीरे सही। पर बढ़ाओ।

लेकिन इसतरह सोचने पर तुम मेरी समझ में नहीं आते। तुम इन सबमें से क्या हो, पता नहीं। शायद लौट गए हो, एकबार फ़िर लौट आने के लिए। तुम ऐसे भी हो। इस भागदौड़ में अपनी उमर लगाने के बाद दोबारा से तय्यार होने में वक़्त लगता है। कर लो तय्यारी। हमें पता है, तुम एक दिन लौटोगे अपनी सपनीली दुनिया में। जैसे तुम लौटे थे प्यार में। तुम मनमौजी होते तो प्यार नहीं कर पाते। कितनी गलत-सी निर्णयात्मक पंक्ति है यह तुम्हारे लिए। तुमने अपने मनमौजीपन को स्थगित करके प्यार किया। शर्तिया उसका स्थगन काल बहुत लंबा रहा होगा। कुछ अटके होगे, पर रुके नहीं होगे। लेकिन मेरे लिए आज भी यह बहुत उलझा देने वाला सवाल बना हुआ है। कि हमसब मनमौजी पहले बने होंगे या आशिक? ख़ैर जाने दो, नहीं पूछता। नहीं पूछ रहा, ख़ुद से भी। कि अभी सही वक़्त नहीं है।

वैसे भी यह कोई वस्तुनिष्ठ प्रश्न तो है नहीं, जिसके चार चोर दरवाज़े दिये हों और हमें किसी एक से बाहर निकलने के लिए उनमें से एक को चुनने की आज़ादी हो। तुम्हारी कहानी दो दीवाने शहर में ’ से छटाँक भर भी कम नहीं है। रत्ती भर कुछ जादा ही रहेगी हमेशा। ऐसे ही तुम्हारे सपने भी है, कुछ रत्ती बार जादा। तुम भले ‘चश्मेबद्दूर ’ की स्क्रिप्ट में रुके रहो। तुम्हें अपनी ‘मिस चमको ’ मिल गयी है। यह अकेले तुम्हारी कहानी नहीं है। तुम दोनों की कहानी है। संभावनाओं को हमेशा बचाए रखने की असीम संभावनाओं के बीच बचे रहने की रूमानियत है। इसके किरदार तुम दोनों हो। पता नहीं यह कब शुरू हुई होगी। शायद उस जीप में बैठे तुम दोनों किसी और ही दुनिया में जा पहुँचे होगे। दोनों अवचेतन में कहीं उससे बहुत पहले बहुत दूर चल जाने के लिए तय्यार हो गए होंगे। या जब उस कुर्सी पर बैठे अपना पहले प्रेम पत्र लिख रहे होगे तुम। जन्मदिन तुम्हारा है, पर मुबारक़ दोनों को दे रहा हूँ। दोनों ऐसे ही साथ साथ बने रहो। हमेशा। मुसकुराते रहो। अब तो साथ जूनियर भी है। और ऐसा भी नहीं है कि इतना सब होने के बाद भी ज़िन्दगी कुछ कम रंगों वाली रही है।

{दो मिनट बाद सवा चार बज जाएँगे और पता नहीं तुम वहाँ क्या कर रहे होगे। तुम्हें पता है, यहाँ दिल्ली में कल से बारिश हो रही है। अभी भी बादल हैं। शायद कल की तरह जब पानी भरने जाऊँ, तो बरसने लगें। वहाँ बादल क्या करवट ले रहे होंगे, तुम जानो। }


जुलाई 05, 2015

बातें बे-वज़ह

यह मेरे ऊपर किसी बोझ की तरह है। रूई के बोझ की तरह। मेरी रूई बार-बार भीग जाती है। बार-बार वापस आकर अपने लिखने को देखने की प्रक्रिया में लगातार उसे घूरते रहना, कितना पीड़ादायक अनुभव रहा होगा। ख़ुद अपने आप में यह कोई मौलिक सवाल नहीं है। कई लोग कभी इस पर बात करने की फुर्सत से भर भी नहीं जाते होंगे। उनके लिए यह बहुत ही गैरज़रूरी जवाब की तरह है। कोई क्यों लिखता है? इससे पहले हमें यह पूछना चाहिए, हम क्यों लिखते हैं। इस सवाल का कोई बना बनाया रेडीमेड जवाब नहीं है। यह शायद ख़ुद के भीतर डूबते-उबरते जाने के बाद हासिल होते रहने की अनदेखी घटना है। ज़रूरी नहीं इस मर्तबा भी हम उसी पिछली बार वाले मोड़ पर मिल जाएँ। किसी तरह उनसे दो कदम आगे बढ़ते हुए, एक कदम वापस लौट जाने की तरह। बिलकुल दोहराते हुए।

यह बात मेरे अंदर न जाने कब घर कर गयी। चींटीओं के अपने ऊपर रेंगते जाने की तरह यह जो सब यहाँ लिख जाता हूँ, वह सच रहता है या झूठ। दिबाकर बनर्जी के ब्योमकेश किसी से कह रहे हैं, ‘सच के पास वाले झूठ कभी पकड़ में नहीं आते’। पर क्या फ़रक पड़ता है। मालुम नहीं।

शायद हमसब इन बीतते सालों में ऐसे होते जाते हैं। हम चाहे न चाहें। यह होकर रहेगा। एक तरह से नियतिवाद की तरह। सच में झूठ की तरह। घड़े में रखे पानी के जैसे। हम सब परचून की दुकान के परचूनिये ठहरे। नमक में चीनी, अचार में कटहल कभी पकड़ में नहीं आते। मुझे भी कोई नहीं पकड़ पाएगा। कोई नमक का दारोगा भी नहीं। पकड़े जाना चोर-सिपाही के खेल का ख़त्म हो जाना रहेगा। अभी इतनी जल्दी पकड़े जाने का मन नहीं है। अभी तो ख़ैर, खेल शुरू हुआ है। ख़ूब खेलना है। छिपकर। बिन दिखे। इसलिए छिप जाओ, अपनी परछाईं के नीचे। अक्सर झख़रे से अढ़री झार के छत पर सुखाते हुए कोई देख भी नहीं पाता। बदरिया घाम में कौन आ रहा है ऊपर।

इसतरह एकबार फ़िर मेरी नज़रें, मेरी तरफ़ हैं। इलियट की नज़र में यह ‘निर्वैयक्तिकता’ होगी, पर मेरी दृष्टि से यह एक नितांत निजी परिघटना है। जितनी बारीकी से इसके सौन्दर्यशास्त्र को हम चिन्हित कर सकते हैं, दूसरा वहाँ की टोह भी ले पाये तो बड़ी बात होगी। इस पूरी रचना प्रक्रिया में भाषा और उसकी संरचना के भीतर जो वाक्य विन्यास ज़िंदगी के इस पड़ाव में मेरे अंदर दाखिल होते हुए, जिस तरह मुझे ख़ारिज करते जा रहे हैं, वह भी कुछ कम हैरतंगेज़ नहीं है। यह शिल्प, रूप (फ़ॉर्म), अभिव्यंजना के साथ व्यक्तित्व का भी प्रश्न है। यह दिन के रात और रात के शाम में तब्दील होने से पहले ख़ुद का और उन तमाम संरचनाओं का पुनरुत्पादन है।

यह सवाल लगातार उन सवालों को अपदस्थ करते जाने का है, जो हमारे बाहर भी एक दुनिया गढ़ रहे हैं। उस दुनिया के संकट, संघर्ष, जिजीविषा, उद्वेलन, भाव, संवेदनाएं बिलकुल भिन्न धरातल पर अपनी सामाजिक निर्मितियों के साथ उपस्थित हैं। इसके होने न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा। ऐसा कहकर हम इसे खारिज नहीं कर रहे न ही इसका अवमूल्यन कर रहे हैं। बस उस दिन की बात से निकलती तकरीर यही थी कि हमारे अंदर पैदा होते सवालों में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि मैं अपनी अभिव्यक्ति में ऐसे औजारों को नहीं देख पाता, जो उसे किसी कालखंड विशेष में स्थित करते हों। पर शायद यह हमारी तंगनज़री है या भाषा की सीमा। लेकिन यह इतना ज़रूरी क्यों है? या फ़िर बात इससे कुछ और आगे जाना चाहती होगी पर उसके शब्दों से निकलते भाव इतना ही समझा पाये। वरना वहाँ आसानी से इन सारी बातों को पहचानने के उपकरण हमेशा से मौजूद रहे हैं। एक लड़का जो इन शहरों में ख़ुद को साबित करने की दौड़ में बेतहाशा तो नहीं पर भागते-भागते थककर इतना ज़रूर हाँफ रहा है कि उसका दम अब फूलने लगा है। अब भी वह अपनी मंज़िल तक पहुँचा नहीं है।

हो सकता है, वह कुछ दूर चलकर उसे छू ले; पर यह इंतज़ार उसे कचोट रहा है। अंदर-ही-अंदर वह पिघलता जा रहा है, पर इसका इस्पात बनता नहीं लग रहा। अतः वह लौह पुरुष भी नहीं है। फ़िर यह कोई सवाल भी नहीं है जो कभी परीक्षा में कभी पूछा जाएगा। यहाँ एक बात और उसके ज़ेहन में लगातार उमड़-घुमड़ रही है। वह यह कि उसके कमरे, चारदिवारी, मकड़ी के जालों, छिपकलियों, अकेलेपन, असफलताओं, अधूरे सपनों, शहर, उन बीत गए कलों में लौट-लौट जाने ज़िद, यहाँ कहीं न ठहरने का मन कभी किसी तारीख़ का हिस्सा बन पाएगा। उसकी इतनी बेतरतीबी, बेखयाली, उलझेपन को कभी कोई समझने के लिए वापस लौट पड़ेगा या तहरीर का हिस्सा बनने से पहले ही इसकी ‘सामाजिक उपयोगिता’ शून्य बताकर इसे भी कहीं नज़रबंद कर दिया जाएगा। या काला पानी की सज़ा देकर किसी अनजान से द्वीप की अकेली, कड़वी, शांत, चितकबरी, स्थितप्रज्ञ कालकोठरी में बंद कर भुला देने की साज़िश रची जाएगी।

उस चारदीवारी के भीतर भरी सीलन में मेरी बातें, मेरे सारे एहसास उमस बनकर या तो पसीने का नमक बन जाएँगी या भाप बनकर किसी बादल का हिस्सा। फ़िर उसे हवाएँ अपने साथ न जाने किन-किन दिशाओं में लेजाकर बरस जाएँगी। उस पानी से जो फ़सल बनेगी, वह किसी का पेट भरेंगी या उष्ण कटिबंधीय आमों की नाज़ुक-नाज़ुक कलमें तरतीब से कहीं बगिया में पेड़ बनकर किसी दिल को तपती गर्मी में छाया बनकर छा जाएँगी। या उस खाली कुएँ में एक बूँद बनकर गिर जाने में ही उसकी सार्थकता होगी। अगर इनमें से कुछ नहीं हो पाएगा तो मैं चाहूँगा वह सेमर का पेड़ बन जाये, जिसकी रूई से कोई तकिया बना ले। चाचा के पास है। नींद बहुत अच्छी आती है इसपर।

{04/07/2015: 10:30 a.m. }

जुलाई 03, 2015

पापा खिड़की भूल गए..

क्या लिख दूँ ऐसा कि कभी फ़िर लिखने की ज़रूरत ही न पड़े। बड़े मन से कमरे में दाख़िल हुआ था के आहिस्ते-आहिस्ते मन की परतों को उधेड़ता, कुछ नीचे दब गयी यादों को कह जाऊंगा। कहना क्या इतना आसान होता है हरबार। जो मन में आया, कह दिया? पता नहीं। शायद कभी.. कुछ नहीं।

इसबार दो महीने बीत गए और हम कहीं नहीं गए। वक़्त किसी फुर्सत की तरह हमारी ज़ेबों में नहीं अट रहा था। हमारी जेब कहीं डीटीसी की बस में कट गयी। जेबतराशी ऐसे हुई कि हम जान न सके। अब आगे का सफ़र कैसे होगा इसी सोच में हम डूब से गए। चुंगी ऐसे भी ली जाती है, हमें नहीं पता था। अब पता चल गया। पापा बड़ी मुश्किल से गाँव जाने के लिए एक हफ़्ता निकाल सके। जब शहीद एक्सप्रेस पुरानी दिल्ली से छूट चुकी होगी और अगली सुबह गोण्डा जंक्शन पर सवारियों को उतार कर फैज़ाबाद के लिए आगे बढ़ चुकी होगी। और यही प्रक्रिया लगातार वह दो दिन बदस्तूर वैसे ही दोहरा चुकी होगी, तब ख़याल आया। पापा कुछ भूल गए हैं। क्या भूल गए हैं। पता नहीं। पर पापा भूल गए हैं, यह मुझे बहुत बाद में पता चला। बस कुछ था, जो यहीं छूटा रह गया था। उसे ऐसे यहाँ छूट नहीं जाना था।

असल में पापा खिड़की भूल गए। यह दोनों तरफ़ से खुलती थी। जैसे मन हो, जिस तरफ़ से चाहो। हम भी इसके बाहर झाँककर, उनके लौट आने पर उन जगहों पर दोबारा चले जाते। यह जादुई खिड़की थी। जिसे खोलते और हम भी अदृश्य सुरंग से गुजरते हुए वहाँ पहुँच जाते। पापा हमेशा ऐसे ही करते हैं। अपने मन से कभी अपने झोले में नहीं रखते। हम ही उसकी बैटरी चार्ज करते। मैमरी कार्ड खाली करके उसमें लगा देते। चार्जर ध्यान से वहीं बगल में रख देते। पर इसबार पापा उसे लेजाना भूल गए या हमें रखना याद नहीं रहा। पता नहीं।

वही तो एक बहाना बनती, पर नहीं बन पायी। फ़िर भी यह बहुत अजीब बात है, जब भी हम वहाँ जाते तो उन्ही तस्वीरों को बार-बार अपनी आँखों में भर लेने की ज़िद पकड़ लेते। एकबार फ़िर उन सब जगहों को देख लेना चाहते। इस तरह हरबार लौटकर हमारे साथ कुछ गाँव भी लौट आता। लेकिन इसबार वह वहीं रह गया है। यह शायद ‘नॉस्टेलजिया’ नहीं है। या पता नहीं इसके लिए कोई और शब्द क्या हो सकता है। कोई होगा भी तो मुझे अभी नहीं पता। आपकी नज़र में कोई हो तो ज़रूर बताइये। अगली बार लिख लेंगे। पक्का लिख लेंगे।

कभी-कभी सोचता हूँ, हमारे ‘गाँव’ क्यों बन पाये। हमारे लिए गाँव वह जगह क्यों बनी, जहाँ लौटने के सपने हमारे माता-पिता की आंखोंमें आज भी चमक उठते हैं? यह शहर हमारे होकर भी किसी बेवफ़ा की तरह मौका पड़ते ही दूर छिटक जाते हैं। फ़िर यह गाँव ख़ुद मेरे अंदर उन्ही के रास्ते दाख़िल हुआ। वहीं से ब्याह कर तुम्हें लाये। सोचा, इसी बहाने एक और पीढ़ी वहाँ से जुड़ी रहेगी। हो सके तो वह घूमने की जगह से कुछ जादा इसी तरह बनी रह सकती है। वह हमारे घर में हमारे पैदा होने से पहले भी कोई घूमने की जगह नहीं थी। न हमारे आने के बाद उसके दर्ज़े में कोई परिवर्तन आया। हम भी कभी अपने मन में सोचा करते हैं, मौका लगे तो हम भी वहीं लौट चलेंगे। लौट चलेंगे, उसी सपने वाले गाँव। यह किसी को मात्र भावुकता या कोरी संवेदना लग सकती हैं। पर यह इच्छा आज की दुनिया में जितनी ‘फैशनेबुल’ दिखती है, उसकी तरह उतनी खोखली नहीं है। सच में एक दिन होगा, जब हम सच में लौट जाएँगे।

जिस तरह शहर अपने भीतर जीने के मौके जितनी तेज़ी से कम करते जा रहा है, उस अनुपात में हमारे अंदर लौट जाने का भाव उसी संक्रिया नहीं कर रहा। हम चाहते हुए भी इसे अपने ऊपर हावी होने नहीं देते। शायद असल में यह भी एक सुविधावादी भावुक तर्क है। जैसे सब विदेश से कमाकर नोटों को अपनी छाती में बाँधकर, उससे फुलाते हुए छाती चौड़ी करते अपने देस वापस लौटते हैं; शायद बिलकुल वैसे ही यह शहर हमारे साऊदी अरब या संयुक्त राष्ट्र अमेरिका हैं। हमारे भीतर भी इसी तरह गड्डी कमाकर लौटने का भाव कभी घर कर गया होगा। के बिन पैसे वहाँ लौटा नहीं जाएगा। यही हमारे जन्नत की हक़ीक़त है। हमारे जन्नत में भी नालियाँ बजबजाती हैं। 

फ़िर अचानक यह सब लिखते हुए महेश भट्ट की बनाई हुई एक शानदार फ़िल्म, याद की तरह मेरे अंदर कौंध जाती हैं। बिजलियाँ कड़कने लगती हैं। हवा बौछार के साथ पुरवाई में घर के बाहर लगी टीन को उड़ा ले जाती है। हमारे सपने, बारिश की बूंदों की तरह हमपर आसमान से गिर रहे पानी की तरह बरसते हुए हमें गीला करती जाती हैं। हम भीग रहे हैं। कपड़े गीले हो रहे हैं। आँखों से साफ़ कुछ नहीं दिख रहा। सब धुँधला है। तबतक संजय दत्त पर मकोका लगा गया था, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पर उस फ़िल्म में परेश रावल सचमुच के विलन लगते हैं। सचमुच के डॉक्टर डेंग। कुमार गौरव अपने छोटे भाई को वापस ले जाने आए हैं। लेकिन हम सबको पता है, असल में क्या होता है? फ़र्जी दस्तावेज़ों के साथ देश छोड़ना आसान है, पर लौटना कितना मुश्किल। वहाँ वापस लौटने की छटपटाहट है, पर लौट आने के रास्ते सीधे नहीं हैं। मैं ख़ुद यह मिसाल क्यों दे रहा हूँ, मुझे नहीं पता। या शायद मेरा अवचेतन अंदर-ही-अंदर मान बैठा है कि यह शहर कभी किसी को वापस लौटने नहीं देंगे। जैसे जोंक हमारे ख़ून पर जिंदा रहती हैं, यह हमारी ज़िंदगियों पर जिंदा हैं। यह हमें छोड़ देंगे, तो ख़ुद मर जाएँगे। फ़िर हम सब भी अच्छी तरह जानते हैं, मरना हम सबको ही है, शहर कभी ऐसे मरा नहीं करते। तो चलो मर जाते हैं।

आवाज़ें..

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