अगस्त 31, 2015

मुझे मार दिया गया है..

मैं मूलतः इंसान हूँ। इसलिए थोड़ा विचलित हूँ। थोड़ा दुखी भी हूँ शायद। मेरे पास कहने के लिए कुछ ख़ास नहीं है। पर कभी-कभी कहना ज़रूरी लगता है। जैसे आज।

मुझे नहीं पता, आततायी कैसे होते हैं। उनकी शक्लें शायद हमारी तरह ही होती होंगी। लेकिन वह असहिष्णु होते होंगे। उनके पास शायद दिल नहीं होंगे। उनका इतिहासबोध बिलकुल शून्य होता होगा। वह इस तरह इंसान ही नहीं होते होंगे।

इसी में जी लूँगा कि थोड़ा बहुत सही, मेरे अंदर इतना साहस नहीं के दूसरे के अस्तित्व को सिरे से नकार दूँ। कभी इतना साहसी होने का दुस्साहस चाहता भी नहीं। मुझमें हिम्मत नहीं बची है, ख़ुद को बचाने की। इसलिए शायद मेरी बातें प्रत्यक्ष प्रकट न हो रही हों, तो वह केवल मेरी कमज़ोरी मानी जाये। मेरे कमज़ोर देश पर उसकी किसी भी ज़िम्मेदारी से उसे स्वयं च्युत करता हूँ। इसे एक डरे हुए समय का डरा हुआ वक्तव्य माना जाए। इन सबसे अधिक इसमें कल्पना का पुट है। यह वास्तविक से अधिक अवास्तविक समय का सत्य है। थोड़ा बेचैन करता, हाँफता, अधकचरा, विकृत, कुरूप, भदेस, झूठे सच-सा।

आप इसे कुछ भी मान सकते हैं। और अगर इसे कुछ नहीं मान सकते तो एक ख़राब कविता मान लीजिये।

अगस्त 29, 2015

दुःख की कथा

पता नहीं यह कैसी अलसाई-सी सुबह होती? सब तुम्हारे आने की आहट में न जाने कब से टकटकी लगाए ऊँघते उनींदे करवट लिए वहीं बैठे रहते। तुम आते, तो पता नहीं आज कैसा होता। शायद इस अधूरी दुनिया का अधूरापन कुछ कम हो जाता। हम भी कुछ पूरे होकर थोड़े और भर जाते। तुम थोड़ी देर करते, तब भी हम कहीं दूर नहीं जाते, वहीं चाय के कप लिए घूम रहे होते। पता नहीं तुम कहाँ रुक गए। तुमने कुछ कहा नहीं। बस रुक गए। अब यह इंतज़ार करना कैसा कर जाता है। अनमना-सा। जैसे हिचकी फेफड़े तक आकर कहीं पसलियों में अटक जाये। धड़कन धड़कने से पहले कुछ छन और रुक जाये जैसे। टहनी कितना इंतज़ार करती है उन अधखिले नन्ही कलियों का। एक दिन खिलकर वह सचमुच खिल जाती हैं। अनदिखी मुस्कराहटें होंठों से होकर दिल में नीचे उतरती जाती हैं।

तब कोई पूछता नहीं, सब उसी तरह थोड़ा मुस्कुरा देते। उनकी आँखें थोड़ी चमक जाती। उसी चमक में अपना चेहरा भी कुछ और चमकता लगता। पर कमरे में अँधेरा है। सब चुप हैं। शांत हैं। अधूरे हैं। जबसे तुम नहीं आए तबसे यह अधूरापन हर रात उनके दिल में ऐसे ही अधूरा धड़ककर रह जाता। लगता जैसे उनकी यादें, आह बनकर उनके खून में कहीं घुल गयी हैं। दोनों मन में कितनी ही ऐसी बातें लिए उस दानव जैसे काले दरवाजे से चिपके खड़े रहते। इस तरह उनके पास दुखी होने के लिए पर्याप्त मात्रा में दुख था। जैसे-जैसे यह घटना उनसे दूर होती गयी, वैसे-वैसे वह अपने अंदर इस दिन का इंतज़ार करते हुए ख़ुद को खीज से भरा पाते। ऐसा करते हुए उनके अंदर पिछले दिन के अनुपात में कुछ अधिक उखड़ापन घर करता रहता। इसी अनुपात में इस घर की दीवारें और अधिक चुप रहने लगीं। वह भी शायद उनकी तरह इस इंतज़ार में शामिल होकर सब भूल चुकी थीं। भूल चुकी थी, वह दीवारें हैं। जैसे वह दोनों भूल चुके थे, वह दीवार नहीं हैं।

तुम उनके स्पर्श की सबसे कोमलतम अभिव्यक्ति होते। वह तुममे अपनी की छवि देखते। तुम कुछ-कुछ उन सबकी तरह दिखते। आँखों से अपनी माँ पर गए होते। माथा पिता से लेकर बड़े दिखते। रंग से कोई फ़रक नहीं पड़ता। बोलते बिलकुल अपनी अम्मा की तरह। हँसते बिलकुल मेरी तरह। चाहकर भी कुछ काट नहीं सकते। उन सबने मिलकर तुम्हारा नाम ढूँढ़ते पिछली ठंड की गुलाबी दुपहरों को अपने अंदर एहसास की तरह छिपा लिया होगा। वह तुमसे कभी कहते नहीं, पर तुम्हें देखकर उन दिनों को याद किया करते। इस तरह की अनगिन बातों के जब वह दिल को भरा पाते, तब हाथों की उँगलियों को एकदूसरे की हथेलियों में फँसाकर छत पर चले जाते। वहीं घंटों उमस भरी असाड़ की चिपचिपी रातों में खो गए सपने की इस किश्त को ढूँढ़ते रहते। उनकी जेबें खाली हो गयी थीं। वहाँ तुम नहीं थे। यही उनके इस सपने की सबसे बड़ी विफलता थी। उन्हे पता था आज तुम नहीं आओगे, पर कैसे ज़िद्दी हैं, दोनों तुम्हारा इंतज़ार करते-करते वहीं सीढ़ियों पर बैठे-बैठे सो गए हैं। तुम इतने कठोर कैसे हो गए। तुम्हें तो आ जाना था। चुपके से। सपने से बाहर। इन सीढ़ियों के पास। आहिस्ते से।

{अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट पढ़ते हुए तुम्हारे पिता की तरफ़ से, तुम्हारे लिए। हमारे लिए। उसपर आज की तारीखलिखी हुई है। }  

अगस्त 26, 2015

दो की कहानी

बात पता नहीं किस दिन की है। होगी किसी दिन की। हम लोग फरवरी की ठंड में सिकुड़ते हुए नेहरू प्लेस से शायद नजफ़गढ़ जाने वाली बस में बैठे थे। ग्रेजुएशन का आख़िरी साल था। हम जेएनयू फ़ॉर्म भरने जा रहे थे। वह हमारे नए सपने का नाम था। जिस बस में हम थे, उसकी पिछली सीटें भी बस की तरह खाली-खाली थीं। बिलकुल उसी तरह जैसे कुछ देर बाद हमारी दोस्तीयाँ भी खाली होने जा रही थी। हमें अभी मुनीरका उतर जाना था के उससे कुछ देर पहले उसने मुझसे मेरा फ़ॉर्म माँगा। वह उसे इतमीनान से देखती रही और देखकर एकदम चुप हो गयी। चुप होने का मतलब उसी ने कुछ देर बाद पूछते हुए समझाया। तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं? हम दोनों को कुछ देर तो समझ ही नहीं आया कि ऐसी क्या बताने लायक चीज़ थी जो हम दोनों एक-दूसरे को एक साथ बताना भूल गए थे। सच, हम बिलकुल नहीं समझ पाये, हम दोनों के बीच क्या बताना रह गया।

यह शायद हमारे खाली होने की पहली कही गयी औपचारिक शुरुवात रही होगी। पर कभी-कभी कुछ चीज़ें ऐसे एकदम से ख़त्म नहीं होती। ख़त्म होते-होते सालों लग जाते हैं। वह अभी भी आहिस्ते-आहिस्ते ख़त्म हो रही है। यह बात इधर नयी तरह से उन पुरानी कड़ियों को जोड़ते हुए समझ आयी। पर तब डायरी में लिखने के अलावे कुछ और नहीं कर पाया। आज भी काफ़ी देर इस पन्ने को खाली देखते रहने के बाद यह दिन दिखाई दिये। पता नहीं इसे मेरे अंदर का क्या कहेंगे ? यह भी हो सकता है, यह उस क्षणिक घटना की बिलकुल गलत व्याख्या हो? पर जिसे कुछ माना हो, वह जब पास नहीं होता, तब हम ऐसे ही कितने ख़यालों से भर जाते होंगे। यह भरना खाली होते रहने की अदृश्य प्रक्रिया-सा है। चुपके से एक छोटे से सुराख़ के सहारे ख़ून के क़तरे बहने लगते हैं। दिल कुछ धड़कना कम कर देता है। रुक जाता है। हम भी वहीं रुके रह गए हैं। उन सीटों के बीच कहीं छिपे-छिपे से। एक दूसरे में धीरे-धीरे लौटते से। आहिस्ते से। रुके-रुके से।

जैसे अभी रुकना चाहता हूँ। ठहर कर एकबार फ़िर देखना चाहता हूँ। वह सारे पल, जो एक क्षण में नज़रों के सामने से कौंधते हुए गुज़र रहे हैं। यह तंगनज़री उसकी नहीं, मेरी तरफ़ से है। वह तो बस इतना कहती रही, तुम अब बदल गए हो ! पहले जैसा न रह पाने की टीस तब होती जब पता होता, कभी हम कैसे हुआ करते थे। यह भी याद करना पड़ रहा है। तब सबसे पहले याद आती, एक याद। उस इतने बड़े गलियारे में हम कहीं भी होते, घेरे में वापस आने के लिए तड़प उठते। कभी नहीं बताया लाल रंग की धानी साड़ी में जो तुम आज से आठ साल पहले उस कुर्सी पर बैठी हुई इधर देख रही थी, वह तुम ही थी। छिपी हुई। दिल की गहराई में कहीं। डूबी-डूबी-सी। उस दिन बदलने ने ही सब बदल दिया। तुम जो भी थी, तब तुम मेरी सबसे कोमलतम कल्पनाओं में से एक थी। आज कुछ नहीं हो, बस कल्पना हो।

{असल ज़िन्दगी के ख़राब प्लॉट से..}

अगस्त 20, 2015

इन दिनों..

खिड़कियों पर पर्दे डालकर इस लाल अँधेरे में बैठे बहुत देर से सोच रहा हूँ। कई सारी बातें चलकर थक चुकी हैं। कुछ मेरे बगल ही बैठी हैं। कुछ सामने एक बंद किताब की ज़िल्द के अंदर छिपी हुई हैं। डायरी लिखना एक दम बंद होने की कगार पर है। लिखने का मन होते हुए भी पूरे दिन की भागमभाग में ठहर कर इस मेज़ पर आने की फुर्सत भी नहीं मिल पाती। यह कागज़ पर लिखने का छूट जाना है शायद। मन होता है, घंटों इसी कमरे में अकेले बैठा रहूँ। मेज़ पर सामने पड़े काँच के कछुए में बदलकर जड़ हो जाऊँ। इतना लिखकर आगे कुछ कहने का मन नहीं है। शायद कुछ दिनों की लंबी छुट्टी पर जाना चाहता हूँ। अजीब तरह से कुछ भी न करते हुए थक गया हूँ शायद। 

रात सपनों में खाली प्लेटफ़ॉर्म आता है। वहाँ बल्ब की रौशनी में दिखते लोहे के बेंच पर उस सुनसान रात में बारिश की बूँदों के होने का एहसास सिहरन बनकर अंदर दौड़ने लगता है। सुबह तक कोई गाड़ी नहीं है। शाम को भी नहीं। परसो एक मालगाड़ी आएगी उसी के गार्ड के साथ मुझे कहीं के लिए निकलना है। बहुत दूर से यह सब मैं देख रहा हूँ, और वहीं सोचते हुए बहुत चुप हूँ। तभी नींद अचानक टूटती है और बाहर होती बरसात का एहसास मेरे मन को भिगोता हुआ चला जाता है। वहाँ एक खयाल से टकराकर बची खुची नींद भी उड़ जाती है। वह सब लड़कियाँ जो ख़ुद को एक जमाने में 'फ़ेमिनिस्ट' कहती थीं और हम लड़कों के साथ ख़ूब बातें किया करती थी; इधर वह सब शादियों के बाद दो-दो उपनाम अपने कंधों पर लिए चल रही हैं। पहले सिर्फ़ अपने पिता का ढो रही थी, अब 'उनके' पिता का उपनाम भी राजी-खुशी जोड़कर हनीमून पर ग्रीस टहल रही हैं। अब वो भी क्या करें, सारा नारीवाद रिसर्च आर्टिकल लिखने में ख़त्म हो गया।

इसे ख़त्म होना नहीं कहते। ख़त्म होना कहते हैं, किसी भी चीज़ के न रहने पर पड़ने वाले फ़रक को। मन कर रहा है, थोड़ी देर लेट जाऊँ। इन सबमें वैसे भी कुछ ख़ास बचा नहीं रह गया है। जैसे कुछ ख़ास नहीं है, पुलिस का रात के बारह बजे जंतर मंतर पर लाठी चार्ज। इसमें भी कोई नई बात नहीं है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथी एक के बाद एक प्रतिरोध करने वाले लोगों की आवाज़ को कुचलने के लिए उनकी हत्या करने के रास्ते पर खड़े हो गए हैं। जैसे बीसीसीआई की इजारेदार क्रिकेट टीम के कप्तान आगरा में पैराशूट से कितनी भी छलाँगे मारते रहें, आज नहीं तो कल वह आईपीएल में सट्टेबाजी के आरोपों में लिप्त पाये जाएँगे। फ़िर एक दिन वह सब आरोपों से मुक्त हो जाएँगे और उन्हे उपकार त्रासदी में अंसल बंधुओं की तरह तीस-तीस करोड़ रुपये जुर्माना देने के बजाए अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।

थोड़ी देर रुक कर सोचता हूँ, तो लगता है, सब ऐसे ही चलते हैं। सब अंतर्विरोधों को अपने अंदर समेटे हुए खिसकते रहते हैं। हम किसी ख़ास तरह से जीने के बजाए, जीने के ढर्रे चुनने लगते हैं। लोग इसे परंपरा कहते हैं। कुछ इसे परंपरा की आधुनिकता भी कह सकते हैं। लेकिन यह नहीं मानते कि इनके भी इतर कुछ और विकल्प हो सकते हैं। उन मूल्यों से निकलकर, आगे बढ़ते हुए हमें महसूस होगा, जिन चीजों के साथ आज तक हम चल रहे थे, वह किसी चालबाज़ समाज का काइयाँपन था। जब तक उसे समझने लायक होते, तबतक, हम अपनी आधी ज़िंदगी बिताकर चैन की बीड़ी फूँक चुके होते हैं। हो सकता है, आज मेरी इन सब बातों का कोई मतलब नहीं क्योंकि अभी किसी विकल्प का कच्चा ख़ाका भी दिमाग में नहीं है। जब होगा, तब शायद वह इसे अपने सामने पाकर सबसे पहले ख़ारिज़ करने पर तुल जाएँगे। पर इस बार मानुंगा नहीं। सब कुछ भी कहते रहें, पीछे नहीं हटना। उस पर चलकर देखेंगे। कैसा है।

अगस्त 16, 2015

पंद्रह अगस्त, दिल्ली

पंद्रह अगस्त की सुबह

अगर आज कोई रेडियो पर लाल क़िले से प्रसारित होते सीधे प्रसारण को सुन रहा होगा, तो उसे अपनी सहज बुद्धि पर एक दो नहीं कई-कई बार संदेह हुआ होगा कि आज पंद्रह अगस्त की सुबह लाल किले को क्या हुआ(?) जो वह उठकर बिहार सहरसा, बेगू सराय कैसे पहुँच गया।

लगता है, पर'धान सेवक की भाषण की प्रति बदल गयी होगी। शायद।

वह बिलकुल उसी मूड में थे, जैसे चुनावी रैलियों में अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान करके मतदाता को अपनी तरफ़ कर लेने की कवायद में पिछले साल से एक ही टोन में लगे रहे हैं।

ख़ैर, हमारी समझ में 'देश' सरकार से कुछ जादा हैसियत रखता है। उनका 'अर्थ संकुचन' उन्हे मुबारक़। हम तो कभी पतंग नहीं उड़ाते। उनकी तो किले की प्राचीर से कट भी गयी।

पंद्रह अगस्त की शाम

यदि आज किसी ने इस 'टीम इंडिया' वाले भाषण को सुन पाने की अथक व कामयाब कोशिश की है तो कृपया वे मार्गदर्शन करके बतावें कि उन्होने कितनी बार 'मेरे सवा सौ करोड़ देशवासियों' कहा, कितनी बार पंद्रह महीने की सरकार की दुहाई दी, और जितनी बड़ी-बड़ी रकम का हवाला दिया, उसका कितना योग बना।

वे तो अपनी उपलब्धियों का झऊआ गीली रुई की तरह लेकर सब पर बरस पड़े। बीस लाख की सब्सिडी तो स्वेच्छा से ख़त्म करवा देने की उक्ति तो कही पर संसद में चवन्नी-अट्ठनी में मिलती चाय एवं समोसे के कॉम्बो का ज़िक्र करना भूल गए।

अगस्त 15, 2015

लाल किले के कबूतर

खिड़की के बाहर बारिश की बूँदें लगातार छत पर गिर रही हैं। छत की फ़र्श पर नयी बूँद आते ही पुरानी अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में लग जाती है। उन बूँदों को पता है, जब बौछार तेज़ हो जाएँगी तब इस संघर्ष का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। मौसम इतना पानी गिरने के बाद भी ठंडा नहीं है। इस बारिश का, इस ठंडक के न होने का, छत पंखे के लगातार सिर के ऊपर घूमते रहने का इस पंद्रह अगस्त की ढलती शाम पर कोई मतलब नहीं है। यह बातें किसी और दिन भी कही जा सकती हैं। यह साधारण-सी दिखने वाली बारिश भी किसी भी दिन कभी भी हो सकती है। मैं भी यहाँ क्यों आकर बैठ गया हूँ? पता नहीं। शायद गाँधी याद आ गए। राजघाट पहुँचने से पहले उनकी शवयात्रा राजपथ से गुज़र रही है। लोग इंडिया गेट पर जमघट लगाए इंतज़ार कर रहे हैं। 

गूगल आज उनकी 1930 की दांडी यात्रा को याद कर रहा है। सुधीर चंद्र की किताब बताती है, गाँधीजी को पता है, कुछ लोग उन्हे मार देना चाहते हैं। वे कई बार सार्वजनिक मंचों पर इस बात को स्वीकार भी कर चुके हैं। सन् सैंतालीस में आज के दिन वे नोवाखली में हैं। देश का बँटवारा हो चुका है। सांप्रदायिक दंगों से देश में अजीब-सा तनाव फैला हुआ है। हम आजाद भी हुए और एक ही दिन बंट भी गए। लोग बदहवास से अपने दिलों के दर्द को सहेजने को कोशिश में कुछ भी समझने लायक नहीं रह गए होंगे। बेतहाशा भीड़, बंट चुके लोग उन्नीस सौ ग्यारह में राजधानी बनी इस दिल्ली में अनगिन उम्मीदों के साथ डटे रहे। उनके पास अपनी आँखों में आजादी के सपने को साँसों में माँस फट जाने के बाद, ख़ून की गंध को फेफड़ों में महसूस करते शरणार्थी शिविरों में गर्दन झुकाये बैठे रहने के अलावे कोई चारा नहीं था। भीष्म साहनी आज के अतीत में लिखते हैं, वह अपने बड़े भाई बलराज के साथ पंद्रह अगस्त के दिन दिल्ली में थे। आज़ाद मुल्क के पहले प्रधानमंत्री सबके सामने तिरंगा लहराने वाले हैं। कहते हैं देवानंद भी उस दिन लाल किले के सामने इकट्ठा हुई भीड़ में शामिल थे।

वहीं किसी टेंट में सिर छिपाने की जगह ढूँढ़ते मनोहर श्याम जोशी के नाटक बुनियाद के मास्टर हवेलीराम भी हैं और गोविंदपुरा, मुल्तान से आए मिल्खा सिंह भी। इन दोनों की तरह सब किसी कोने में छिपे हुए से अपने सपनों के सच होने का इंतेज़ार कर रहे थे। इन सबका नया मुल्क बनने वाला था, लेकिन उनमें से कोई साबुत नहीं था। सब कच्ची मिट्टी की सुराही के आँच में पकने से पहले ही बिखर गए थे।

हम भी इस विभाजन की त्रासदी को कभी नहीं जान पाते, अगर हमने कभी खुशवंत सिंह की औपन्यासिक कृति पाकिस्तान मेल को नहीं पढ़ा होता। मनो माजरा आज भारत-पाकिस्तान की सीमा से उठकर हमारे दिलों में चला आया है। अगर ऐसा ही चलता रहा तब हम सब एक दिन टोबा टेकसिंह हो जाएँगे। हमारा दिल, दिमाग हो जाएगा। दिल सोचता नहीं है, बस महसूस करता है। तब हम कुछ नहीं समझ पाएंगे हमारे सामने, हमारे देश को यह क्या हो रहा है? हम अगर ख़ुद को बेहतर इंसान बनाना चाहते हैं, तब हमें तमस और आधा गाँव के साथ इंतज़ार हुसैन के उपन्यास उदास नस्लें साथ रखकर अपने आसपास बनी इस जटिल दुनिया को देखना शुरू करना होगा। कबीर खान की बजरंगी भाईजान से काफ़ी साल पहले श्याम बेनेगल ने एक फ़िल्म बनाई, मम्मो इसे देखे बिना हम इस उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी त्रासदी को रत्ती भर भी नहीं समझ सकते। कैसे जड़ें छूटे नहीं छूटती। दिल टूट जाता है, पर कोई वापस नहीं लौट पाता। हमारी सबसे बड़ी दिक्कत शायद यह है कि हम इसे समझना ही नहीं चाहते। समझते हुए न समझने का हुनर हम सबने बड़े करिने से सीखा है।

मुझे नहीं पता हमारे साथ बड़ी हो रही यह पीढ़ी कैसे अपनी आज़ादी को गढ़ेगी? उनके लिए इसके क्या मायने होंगे? कभी-कभी मैं यह भी नहीं समझ पाता कि उन्हे दुख भरे विभाजन के दिनों के निशान किस तरह दिखाई देंगे। वह सब शायद इसे उर्वशी बुटालिया की किताबों से जानेंगे। या कभी मन हुआ तो मुनव्वर राणा के मुहाज़िरनामा से। लेकिन उसकी सघनता तब शहादरा जैसी पुनर्वास कॉलोनियों में कैसी बची रह पायी होगी, पता नहीं। सच, ख़ुद बचपन से दिल्ली में रहते हुए आज तक शाहदरा नहीं जा पाया। खन्ना जी कभी उन दिनों में वापस नहीं लौटना चाहते। वह कभी नहीं बताएँगे। चाहकर भी नहीं बता पायेंगे। हम सब चाहकर भी उस दर्द को कुरेदने से बचना चाहते हैं। लेकिन हमें यह पता है, इस त्रासदी को दीपा मेहता की फ़िल्म मिडनाइट चिल्ड्रन से पहले दीपा मेहता की 1947अर्थ, अनिल शर्मा की सतही समझ वालीगदर से काफ़ी जटिल कथानक को अपने भीतर छिपाये हुए है। उसकी कथा एक सिरे से गुजरते हुए दूसरी गाँठ पर खुलती उसकी त्रासद अभिशप्तता को उघाड़ती चलती है। तब पता चलता है, शांता की आँखें क्यों उस दिन दिलनवाज़ की आँखों में उस खौफ़ को पहली बार महसूस करती हैं। यह पहली बार बदलना इतिहास में सब कुछ बदलकर रख देता है। तब से हम कुछ नहीं कर पाये। 

अगस्त 10, 2015

ये दुनिया अगर मिल भी जाये..

फिल्म एवं टेलीविज़न संस्थान, पूना की बात

पहली बात कि यह FTII के छात्रों के प्रतिरोध को लेकर या उनकी प्रतिबद्धता को लेकर कोई शंका या ऐसा कोई भाव नहीं है लेकिन इसके अलावे भी ऐसी बहुत बड़ी जगह थी, मौके थे, जिसके अवसर उन्होंने खो दिए. सिर्फ़ एक भगवा निदेशक के संस्था पर थोपे जाने का विरोध करके आप क्या जताना चाहते हैं?

क्या आप सब वह लोग हैं जो स्वयं को दक्षिणपंथी राजनीति से अलग दिखाते हुए वैचारिक मोर्चाबंदी की जनवादी कड़ी को और मज़बूत करते हुए आगे बढ़ रहे हैं या यह सिर्फ़ ढकोसला है. अभिनय कैसे किया जाए, इसकी कोई फ़ाँसीवादी किताब रही होगी।

हो सकता है, संवाद अदायगी में 'भाजपा जिंदाबाद' कहना अनिवार्य कर देने का भय रहा हो या कैमरे को पकड़ने की केसरिया ट्रेनिंग भी होती होगी या ऐसे कई संभावित खतरों को आपने चिन्हित किया होगा। मज़ा तो तब आता, जब आप उनके वहाँ रहते अपनी आवाज़ बुलंद करते। आप तो पहले ही डर गए. कुछ सीखिए आईआईटी मद्रास के अंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल से.

{4 अगस्त · नयी दिल्ली, रात आठ बजे। }

आवाज़ें..

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