सितंबर 30, 2015

धर्मनिरपेक्षता

'धर्मनिरपेक्षता' की एक व्याख्या:

"नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता को अन्य धर्मों का स्थान लेने वाले नागरिक धर्म की तरह कभी नहीं लिया। वे धर्म को मिला कर सभी भारतवासियों पर धर्मनिरपेक्ष पहचान का ठप्पा लगाने और इस तरह समाज पर एक नई नैतिकता थोपने के पक्ष में कतई नहीं थे। उन्हें भारत में धार्मिक विश्वासों की गहनता और बहुलता का पूरी तरह अहसास था। दरअसल, इसी वजह से उन्हें धार्मिक-सामाजिक अस्मिताओं को राजनीति के दायरे से बाहर रखने पर यकीन हो गया था। उन्होने अपनी शक्ति धर्मनिरपेक्षता का मत स्थापित करने पर कभी ख़र्च नहीं की। उनकी कोशिश तो धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल को रोकने की ही रही। इसी को वे 'सांप्रदायिकता' कहते थे।"

किताब: भारतनामा: सुनील खिलनानी, पन्ना एक सौ इक्यानवे 

{फेसबुक स्टेटस, बीस सितंबर, लगभग तीन बजे· नयी दिल्ली }

2.
गोपाल मेरे दोपहर में लगाए गए स्टेटस से कुछ असहमत हैं। उनके लिए। किताब वही है, पन्ना एक सौ सत्तानवे।

"गाँधी और नेहरू के राष्ट्रवाद ने न केवल धर्मों का आवाहन करने से, वरन राष्ट्र को बहुसंख्यक समुदाय की भाषा में पारिभाषित करने से सोच-समझ कर परहेज किया था।" लेकिन, "बहुसंख्यकों के लोकतन्त्र का तर्क जैसे-जैसे फैला, वैसे-वैसे कॉंग्रेस के प्रतिद्वंदियों को भी राष्ट्र की नुमाइंदगी का दावा करने का मौका मिला। ख़ासतौर से बहुसंख्यक लोकतन्त्र ने हिन्दू राष्ट्रवादियों को उभरने का अवसर दे दिया।" यह बहुलतावादी राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद के बीच एक द्वन्द्वात्मक स्थिति है।

{ बीस सितंबर, सात बजकर पाँच मिनट· नयी दिल्ली }

सितंबर 27, 2015

लिखना

कभी-कभी सोचता हूँ, जिस तरह ख़ुद को बेतरतीब लगने की कोशिश हम सब कभी-न-कभी अपने अंदर करते रहते हैं, उनका सीधा साधा कोई मतलब नहीं निकलता। यह बिलकुल वैसी ही बात है जैसे लिखने का ख़ूब मन हो और तभी प्यास लग जाये। पानी की बोतल कमरे में दूर रखी है। इसलिए उठना पड़ेगा। पर यकायक पानी के गिलास के साथ हम खिड़की के बाहर देखने लग जाते हैं। सामने वाली छत पर एक लड़की ढलती रूमानी शाम के इस पल टहलते हुए अपने बाल संवारते हुए इस तरफ़ नहीं देखती। क्योंकि उसे पता है,  हम उस तरफ़ देख रहे हैं। इस तरह हम सब भूल जाते हैं। भूल जाते हैं कि वापस मेज़ पर लौटकर कुछ लिखने के ख़याल से भरे हुए क्षणों में हम कभी लौट नहीं पाएंगे।

यह सच है,लिखना अपने आप में असामान्य घटना है किन्तु इस तरह होने के बावजूद यह अपने पीछे छूट गयी निशानियों में कितने सिलसिलेवार तरीके से कई ढर्रों के होने की बात कह जाती है। मेरी डायरियों में कहीं कोई पन्ना नहीं छूटता। एक के नीचे एक बातें तारीखवार आती रही हैं। यहाँ तक के उस वक़्त को भी वहाँ लिखता रहा हूँ। बस पिछले साल की बात है उन अधूरे पन्नों को अलमारी में बंद कर आया। फ़िर जून में इतने दोहरावों में बकाया पन्ने ख़त्म नहीं हुए तो कुछ छोड़ आया। इसके अलावे न जाने कितनी कतरनों पर कुछ-कुछ लिखकर इधर उधर किताबों में संभाले रखा है।

कल बड़े दिनों बाद लाइब्ररी गया तो दोबारामोहन राकेश की डायरी अपनी तरफ़ खींचने लगी। पर नहीं लाया। मलयज अपने हिस्से की बातों को लिखने के लिए कविताओं का सहारा क्यों लेते हैं पता नहीं। इसलिए उन्हे लाने का मन नहीं हुआ। कविता एक तरह का आत्मालाप है। किसी और के लिए होने से पहले ख़ुद के लिए कहा गया वक्तव्य है। पता नहीं इधर ऐसा क्यों हुआ कि इस विधा को अपने अंदर सबसे जादा महसूस करने लगा हूँ। इसमें ईमानदारी न हो तो सब लिखा हुआ बर्बाद है। ऐसा नहीं है, यह विधा अपने आप में किसी तरह की बेईमानी का निषेध करती है। हम मिलावटें भी देख लेते हैं। कहाँ सिवाने उधेड़ने से बचा ली गयी हैं। कहाँ और उघाड़ सकते थे। यह हम सबके साथ होता है। सिर्फ़ मन्नू भण्डारी, लीलाधर मण्डलोई, रमेशचंद्र शाह या कृष्ण बलदेव वैध के साथ ऐसा नहीं हुआ है। न लिखकर वह बहुत सारी बातें टूटने से बचा ले जाते हैं। जैसे जितना मेरा सच है, उससे कहीं जादा छिपा ले जाता हूँ। उसे न कहने से उस घटना या व्यक्तित्व के समझने के दिये गए सूत्रों को छोड़ देता हूँ। न कहकर भी सब कह देने का हुनर आते-आते आता है। इतना आसान नहीं है।

लिखने न लिखने के बीच बहुत सारी ऐसी जगहें हैं, जहाँ कई सवाल मिलते हैं। सबके जवाब किसी के पास नहीं होते। सब अपनी सहूलियतों से उनको कहते छोड़ते रहते हैं। हम सामने कहने से बच रहे हैं तो मतलब यह नहीं कि मन में कुछ नहीं चल रहा। मन अपने अवचेतन में वह दर्ज़ करता चलता है। कहाँ किस चीज़ पर बोल देना था, पर नहीं कहना, उन सम्बन्धों को आगे के कई सालों के लिए बचा ले जाना है। इस ज़िंदगी में ऐसे कई छोटे-छोटे दौर आते हैं, जब हम सबसे जादा अपनी बातों से लोगों को ख़ुद से दूर कर लेना चाहते हैं। हमें पता रहता है, वह पूरी शिद्दत से सामने मौजूद नहीं है, फ़िर भी हम जाने देते हैं। जैसे हफ़्तों बाद किसी दोस्त को फोन करो और घंटी बजने पर भी वह उधर से कोई जवाब नहीं देता। अगर गलती से उठा भी ले तब यह कहकर जल्दी से रख देता है, अभी थोड़ी देर बाद करता हूँ। और दूसरी तरफ़ हमारे हिस्से सिर्फ़ इंतज़ार आता हैं। लिखना भी इन दोस्तियों की तरह है। हम ख़ुद से मोलभाव करते हैं। मन के किन्ही हिस्सों को भूल जाने के लिए उन्हे सबसे जादा लिखते हैं। जिन्हे याद नहीं करना चाहते उन्हे किसी बहाने से पन्नों में दबाकर रख देते हैं। यह चालाकियाँ न हों तो जीना मुश्किल हो जाएँ। यह खाली कमरे की दीवारों से सिर टकराने की तरह है, जहाँ ऐसा करते हुए हमें कोई नहीं देख रहा।

यह किसी कैमरे से तस्वीर खींचने की तरह आसान नहीं है। लगातार ख़ुद को सही गलत जगहों पर फ़्रेम करते रहना है। शब्द जितने पास से गुज़रेंगे उतने ही दिल में अंदर धँसते जाएँगे। भले वह किसी को समझ आए या न आयें, हम उनसे नहीं बच सकते। यह उस लंबी सैर की तरह है, जहाँ हर पत्थर हमारा पहचाना हुआ है। उन आवाज़ों में अपनी आवाज़ को बिन सुने चीन्ह लेने की तरह। याद मेरे लिए कोई ओट नहीं है जिसके पीछे हम छिप जाते हैं। बड़ा अजीब लगता है, जब वह कहते हैं के हमें जब अपना भविष्य नजर नहीं आता, तब हम अपना भूत देखने लगते हैं। उन्हे शायद नहीं पता, यादें हमारे लिए आने वाले कल के सुनहरे सपने हैं। मैं उस खिड़की से सिर्फ़ एक मर्तबा उसे देखता हूँ, जो किसी की पत्नी है। सच, यहाँ मुझे तुम याद हो आती हो। तुम अभी पास नहीं हो। आने वाली हो। इस ख़याल को ऊपर से नीचे आते हुए दोबारा लिखने को मनोविश्लेषक किस तरह लेंगे, पता नहीं। पर यह ज़रूर है,लिखना इसी तरह मेरे लिए बहाना है। अगर मैं पेड़ देखकर लिख रहा हूँ, तो वह मेरे लिए किसी याद में जाने लायक सड़क भी है और वहीं थोड़ी देर बैठे रहने के लिए बन गयी कुर्सी भी।

सितंबर 24, 2015

बातें बेतरतीब..

जब कुछ दिन रुक जाओ तब ऐसे ही होता है। कितनी बातें एक साथ कहने को हो आती हैं। जबकि मन सबको धीरे से कह चुका है, कह देंगे इतमिनान से। पर कौन मानने वाला है। कोई नहीं मानता। कभी-कभी जब अपने चारों तरफ़ देखता हूँ तो लगता है, उन सबमें सुस्त क़िस्म का रहा होऊंगा। कछुए जैसा। तभी आज तक वहीं का वहीं हूँ। वह आले दर्ज़े के इरशाद रहे होंगे, जो क़ाबिल होकर वहाँ पहुँच सके, जहाँ सब पहुँच जाना चाहते थे। मैं कहीं नहीं पहुँच सका। तब एहसास होता, यह कोई दौड़ नहीं है। तब लगता, यह बहस किसी काम की नहीं। इसका कोई मतलब नहीं है। सब बकवास है। मेरी तरह। 

दुनिया इससे भी अश्लील है। और सबसे खतरनाक है, हमारी दुनिया का इस तरह न दिख पाना। ऐसा क्या हुआ जो इसमें इस तरह दिख पाने की क़ाबिलियत कम होती गयी। पता नहीं। पर मेरी समझ में वह सब बहुत कमज़ोर हैं, जो बिन कपड़े वाली अश्लीलता की तरफ़ खिंचे चले जाते हैं। उनमें हिम्मत है। पर उस कमरे के भीतर। वह उन शब्दों से उस स्पर्श को ‘छूने’ में तब्दील कर उस कमरे की खिड़की के पीछे छिप जाते हैं। अकसर ऐसा करते हुए वह अपने अंदर छिपी हुई उन इच्छाओं की तस्वीर उकेरते हुए अपने कोमलतम हृदय को छलनी करते रहते हैं। वह कभी नहीं देख पाते किसी रुखसार पर अटके हुए तिल को गर्दन से होते हुए छूने की तमन्ना पीठ के एक ख़ास कोण पर जाकर ठहर जाना। उनपर ठहरी पसीने की बूँदों से गँधाती बनियान रोज़ पानी से धुलने के बावजूद बदबू से बजबजाना कम नहीं करती। वह नहीं चाहती बदबू देना। तिस पर नहीं लगाना चाहती घरों में पोंचा। कभी नहीं चाहती उन बड़ी औरतों से कुछ सुनना।

इससे जादा अश्लील और क्या होगा, जो लोग पहले कुछ लोगों से उनका पता पूछ-पूछकर मारपीट करते थे, वही अब उनके सांवैधानिक प्रतिनिधि बनने की प्रक्रिया में शामिल हो गए हैं। वह अपनी राजनीतिक ज़मीन की तलाश में महाराष्ट्र से उठकर बिहार चले आए हैं। अब बिहारी होने पर पिटाई नहीं होगी। जब वह नहीं जीतेंगे, तब होगी। क्योंकि इनकी पहचान करना उतना ही आसान है, जितना रात एक बजे किसी होटल के कमरे की कुंडी खटखटाना और लड़का-लड़की को पकड़ लेना। ‘मसान ’ इस हिस्से की सबसे जटिल कहानी कहती है। फ़िर हमें पता चलता है, बनारस छोटा शहर है। उसे बंबई नहीं कह सकते। पर इस नज़र से सब बनारस है और सब शिवदासपुर है।

हम रोज़ उन जगहों से अपने अंदर-बाहर गुजरते रहते हैं पर जैसे हम कुछ देखते ही नहीं हैं। तुम किसी महँगी शराब के फिरोज़बादी गिलास को पकड़े, हाथ की उँगलियों में फंसाई हुई सिगरेट के धुएँ में उन सब पर थूक रहे हो। जो तुम्हारे इस नंगे कमरे से बाहर हैं। यह दुख की बात है। मुझे पता है, तुम मुझे पढ़ रहे हो। इसलिए तुम्हारा नाम नहीं ले रहा। पर दोस्त उन बिखरे कपड़ों के बाहर पड़ी वह लड़की, कुछ पल तुम्हारी नशीली आँखों में डूब कर कोई हसीन खवाब देख रही होगी। क्या तुम चाह कर भी उसके साथ छत पर उन चाँद-सितारों के पार उस सपनीली दुनिया में ले जा सकोगे। तुम शरत चंद्र को पढ़ते हो। पर शरत चंद्र बनने की हिम्मत तुममे भी नहीं है। तुम कहते भले हो तुम्हें पता है। पर तुम जानते नहीं हो। उसे पैसे देकर वापस भेज देना अश्लील नहीं है। तुम्हें पता ही नहीं है, सबसे अश्लील क्या होता है?

सबसे अश्लील होता है, बिन नौकरी शादी कर लेना और माँ के बुखार में तपते रहने के बावजूद ऊपर इस कमरे में आकर लिखते रहना।

सितंबर 17, 2015

पाँच साल बाद: करनी चापरकरन: लौटने से पहले

देखते-देखते पाँच साल बीत गए। जैसे अभी कल ही की तो बात है। लेकिन जैसे अगले ही पल लगता है, यह पिछली पंक्ति और उससे पिछली पंक्ति कितनी झूठ है। सरासर झूठ। पाँच साल। कितना बड़ा वक़्त होता है। हमारी ज़िंदगी के वह साल, जब हम जोश से भरे हुए किसी भी सपने को देख लेने की ज़िद से भर जाते होंगे। भर जाते होंगे, भरी मुट्ठियों से। उँगलियों से। पर वह क्षण लौट के नहीं आएंगे। उनकी यादें इधर-उधर हमारे अंदर हमारे बाहर बिखरी पड़ी होंगी। कभी लगता है, इतने कम अरसे में तारीखें गड्ड-मड्ड हो गईं हैं। वह सत्रह रही होगी या अट्ठारह। महिना यही था। और साल था, दो हज़ार दस। 

पर अब कोई फरक नहीं पड़ता। बस इसी के आस-पास कोई दिन रहा होगा। एक दिन आगे, एक दिन पीछे। फ़िर यह बात कितनी ही बार अपने अंदर दोहराई होगी, बस पाँच साल ! आज यह मोहलत ख़त्म। आज से वापस लौटने की तय्यारी शुरू। पर मुझे नहीं पता इस वापसी में कौन-सा ख़ाका काम करेगा। या फ़िर वापस लौटकर कहाँ पहुँच जाना है। कहीं पहुँचना भी है या ऐसे ही बोल दिया। पता नहीं। पर सच, जब बोला होगा, तब इतना सोचा नहीं होगा। बस बोल दिया होगा। जैसे हम सब ख़ुद को बोल देते हैं। ऐसे ही। 

यह सच है कि सामंती संरचनाओं वाले इस काल खण्ड में इसकी कोई जगह अभी तक तय नहीं हो पायी है। जो ख़ुद को तारीख का ख़ुदमुख़्तार कहते हैं, उनके लिए हम 'आँख की किरकिरी' हैं। इसके बाहर वह किसी भी ऐसी जगह या 'स्पेस' को मानने के लिए तय्यार नहीं हैं। वह कहते हैं, इसके लिए 'इतिहास' में कोई कुर्सी या मेज़ खाली नहीं है। यह उनकी समझ का फेर है या बेदख़ल करने की राजनीति, कह नहीं सकता। शायद दोनों का गठजोड़ होगा। वरना अब मुझे भी यह मानने में कोई ऐतराज नहीं है कि हम भले एक भाषा विशेष में लिख रहे हैं, पर कथ्य के स्तर पर यहाँ जो अभिव्यक्त हो रहा है उसकी नब्ज़ पकड़ने का हुनर उन्हे नहीं आता। फ़िर हम कौन-सा किसी से मानद उपाधि लेने की जुगत लगाने वाले हैं। ख़ैर, हमें क्या करना। हम तो बस ऐसे ही यहाँ आ गए थे। के देखते हैं, कैसा खुला मैदान है?

लिखना मेरे अंदर एक खिड़की का बन जाना है। जैसे हम सब अपनी-अपनी परछाईं में होते हुई भी नहीं होते बिलकुल वैसे। वह हमारे अंदर से होते हुए बाहर की तरफ़ जाती रही हैं। जैसे सबकी ईमानदारियाँ उनकी नौकरियाँ तय करती रहीं और मैं उनके दफ़्तरों के बाहर लगी भीड़ में मारामारी करते हुए अंदर घुसने की फ़िराक़ में लगा रहा। कभी-कभी मन करता है, सब छोड़ छाड़कर बैठ जाऊँ। पर कर नहीं पाता। सोचने और करने जो फ़र्क है, वह यहीं से शुरू होता है। बिलकुल इसी पंक्ति से। यहाँ जितने भी किरदार हैं, उनमें कहीं-न-कहीं मेरा अक्स छिपा हुआ है। वह सब मुझमें अपने अपने हिस्से लेकर इन पन्नों पर बिखर गए हैं। इस तरह सब सामने होते हुए भी सामने नहीं है।

ऐसा करते-करते बहुत सारी चीज़ें बदल गईं। रहने के लिए यह दुनिया बद से बदतर होती गयी है। जो शक्तिशाली हैं, वह अपने इसी अहंकार में चूर हैं। जो शक्तिशाली नहीं हैं, वह उस शक्तिशाली की नकल में ही ख़ुद को मसरूफ़ रखे हुए हैं। जो न नकल कर सकते हैं और न शक्तिशाली हैं, वह इन दोनों के बीच पिस रहे हैं। हम सब इस चक्की में गेहूँ की तरह पिसने के लिए पैदा हुए हैं। सुन रहा हूँ, अब हम सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाने जा रहे हैं। वहीं मैं एक ऐसे देश में रह रहा हूँ, जहाँ पढ़ लिखकर इन पाँच सालों में एक अदद नौकरी तक नहीं ले सका। सारे तंत्र इस तरह भ्रष्ट होते जा रहे हैं, जिनमें किसी तरह की संभावना नहीं दिखती। मैंने एक संभावना इस लिखने में ढूँढ़ी है। ख़ुद को ज़िंदा कहने के लिए मैं इसकी ओट में आकर छिप गया हूँ। ताकि जब कोई पूछे, तब कुछ कह सकूँ। यह लिखना ही मेरी राजनीति है। लिखना कहीं चले जाने से पहले किसी खाली पन्ने पर अपने पते को लिख जाना है। 

मैं भी अपना यही पता दुरुस्त करता जा रहा हूँ। लिखकर देख रहा हूँ, दुनिया का कौन-सा कोना मुझ जैसे व्यक्ति को अपने भीतर समेटे रहेगा। शुरू-शुरू में लगता था, लिखना पलायन कर जाना है। थोड़ा लिखा और भाग गए। पर लिख लिखकर मालुम पड़ा, लिखना अपने भीतर चलने वाला एक सतत् संघर्ष है। लिखने के लिए हिम्मत चाहिए। यह सबके बस की बात नहीं। मैंने ख़ुद अपनी पड़ताल शुरू की। भले यह दुनिया का सबसे आसान काम लगता हो, पर लगने से क्या होता है। यहाँ बिखरी मेरी एक-एक बात, इस देश और काल पर एक अनसुनी टिप्पणी है। यह उस मर्मांतक पीड़ा का छोटा-सा रुक्का है। यह पढ़े जाने लायक भाषा में कहने की छोटी-सी कोशिश भर है।

{इससे जादा कहने का कोई मतलब नहीं। पहले ही औकात से जादा कह गया हूँ। बस इधर पिछले चार सालों की सालगिरहों को लगाता चल रहा हूँ। मन करे तो देख लीजिएगा। सब एक के पीछे एक हैं।  साल पहला, साल दूसरा, साल तीसरा और साल पिछला। }

सितंबर 15, 2015

हिन्दी दिवस: इस मरतबा

असहमति

अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हमारे मास्टर रहे हैं। हम आज भी उनसे काफ़ी कुछ सीखते हैं। हमने उनसे बात को तार्किक आधार से कहने का सहूर सीखा और लिखकर उसे कहने का कौशल भी। लेकिन वह एनडीटीवी के 'मुक़ाबला' में कैसी बात कह रहे हैं। समझ नहीं आता। वह जब अल्पसंख्यक समुदाय का हवाला देते हुए यह कहते हैं कि उस 'पशु विशेष' में ही सारी पौष्टिकता प्रचुर मात्रा में है और उसी झोंक में यह भी कहते हैं कि यह माँस ही उनकी क्रय शक्ति के भीतर है; बात समझ नहीं आती।

इस प्रचुरता को तो थोड़ी देर वह एक तरफ़ रख दीजिये, बस वह इतना बता दें कि किस शोध के हवाले से वह यह बात कह रहे हैं।

उन्हे शायद अब थोड़ा भूगोल पढ़ना चाहिए। जिस तरह के गरम भौगोलिक परिवेश में हम रहते हैं, उसमें उपरोक्त पशु के मांसाहार से शारीरिक व्याधियाँ अधिक घेरती हैं, पौष्टिकता तो जाने दीजिये। और वह शायद तब यह भी देख पाएँ कि कैसे हरित क्रान्ति की आँधी में नकदी फसलों के प्रोत्साहन से किस तरह दालें कहीं पीछे की कतार में जाकर खड़ी हो गयी, जो पॉल्ट्री उद्योग के अंडे आने से पहले भारतीय समाज में प्रोटीन की स्रोत रहीं थी।

मुझे पता है, उन तक मेरी बात नहीं पहुँचेगी। फ़िर भी कहे दे रहा हूँ।

{सितंबर चौदह, नयी दिल्ली, शाम छह बजे }

2.
आज हिन्दी दिवस है। मैंने आज पूरा दिन हिन्दी में ही दिमाग चलाया। जो भी दृश्य लिखे वह सब इसी भाषा में थे, मेरे रेडियो पर भी सब हिन्दी फिल्मों के गाने बज रहे हैं। जिसमें सबसे बढ़िया गाना फेंटम का अफ़गान जलेबी लगा। मन हो, वक़्त हो आप भी सुन सकते हैं।

इस तरह मेरा हिन्दी दिवस मन गया। बस माइक्रोसॉफ़्ट वालों से गुजारिश है, मुझे अपने विण्डो फ़ोन में हिन्दी लिखने की 'गूगल इनपुट' सेवा या उनकी खुद की 'भाषा' सेवा देने की कृपा करें। जय हिन्दी।

{चौदह सितंबर, नयी दिल्ली, आठ बजे रात }

3.
जो राजेन्द्र यादव ने कभी नहीं किया, वह एबीपी न्यूज़ के हिन्दी उत्सव  में जाकर रचना यादव ने कर दिखाया। उन्हे बधाई। पुराने ढहेंगे, तभी नए बनेंगे। नव-निर्माण की शुरवात हो चुकी है।

#‎राजेन्द्र_यादव‬ ‪#‎हिन्दी_उत्सव_पुरस्कार‬

{पंद्रह सितंबर, शाम सवा सात बजे }

4.
यह हमारी सहूलियत है या कुछ और कह नहीं सकता के कैसे 'श्रृंखला' की जगह आज जनसत्ता ने 'इंदिरा और राजीव वाले टिकटों की छुट्टी' शीर्षक से छपी ख़बर में 'शृंखला' का इस्तेमाल किया है।

कोई भाषाविद् या तकनीकी ज्ञान से सम्पन्न व्यक्ति इस पर प्रकाश डाल सकें तो हम भी इसे जान सकेंगे।

वरना इसके बाद सिरे से महादेवी वर्मा की कृति को ढूँढ़ते हुए हिन्दी समय से लेकर विकिपीडिया तक 'शृंखला की कड़ियाँ' लिखा हुआ मिला। क्लिप का लिंक  यह है।

{सितंबर पंद्रह, रात पौने बारह के लगभग }

सितंबर 13, 2015

चुप घर

कोई भी उस कमरे में कभी भी दाख़िल होता, तो उसे लगता, यह कमरा एक जमाने में किसी दफ़्तर का हिस्सा रहा होगा। टूटी मेज़। धूल खाती फ़ाइलें। कोनों में पड़ी कुर्सियाँ। कटे-फटे जूते। मकड़ी के जाले। खिड़की से आती हवा। इधर-उधर बिखरे पड़े पन्ने। चूहों की लेड़ीयाँ। बजबजाता फ़र्श। फटा हुआ परदा। सूखते हुए पेशाब की साँस रोक लेने को मज़बूर करती बदबू। उखड़ता पलस्तर। रुका हुआ पंखा। रुका हुआ वक़्त। बंद दरवाज़ा। यह दरवाज़ा ही था, जिसने इस अकेले ऊबते कमरे को दुनिया में मिलने से रोक रखा था। 

लेकिन आज यह दरवाजा खुल जाएगा। आज इसमें हम रहने आ रहा है। ऐसा सोचकर वह दोनों ठिठक गए। ठिठक गए एक दूसरे को इतनी पास देखकर। ऐसे होते हुए दोनों ने एक-दूसरे को एकबार फ़िर देखा। यह इस शहर में उन दोनों की एक साथ पहली रात है। अब यह अँधेरा कमरा उन दोनों के लिए घर था। चुप घर।

वह दो थे। ज़ोर लगाकर जैसे ही दोनों दरवाज़ा खोलकर अंदर घुसे, फ़र्श पर बिखरा बरसात का पानी किसी तालाब में तैरते हुए कछुए की तरह पैरों में लगा। वह एकदम डर गयी। घबराहट उसके सीने से होती हुए उसकी काँख में कहीं गुम हो गयी। उसने फिल्मों से सीखा था, ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए। ऐसा सोचते हुए वह डरकर उससे चिपक जाती। लेकिन इससे पहले कुछ और सोचकर वह पिछले दरवाज़े तक गयी। जैसे उसे कुछ याद आया। वहाँ पीछे लकड़ी की अलमारी में लगी दीमक उसे खाने की कोशिश में पिछले कितने सालों से लगी हुई हैं, वह अंदाज़ा नहीं लगा सकी। वापिस आकर सिर झुकाए वहीं पीढ़े पर बैठ गयी। अंदाज़ उसे इस बात का भी नहीं, वह अब कहाँ है। वह भी जो उसके साथ था, वह पीढ़े के बचे हिस्से पर बैठने की सोचकर पास ही गर्दन झुकाये उकड़ू बैठा रहा। दोनों चुप हैं। 

कभी लगता यह चुप्पी दीवारों से टकराकर इन तक आती और कभी इनसे टकराकर दीवारों तक जाती। इस तरह इनका चुप रहना शुरू हुआ। दोनों पूरा दिन सिर झुकाये चुप रहते। उनकी गर्दन में दर्द बिलकुल नहीं होता। यह झुकी गर्दन एक सहमति भी होती। दोनों एक-दूसरे से जितनी बात नहीं करते, उससे जादा गर्दन देखकर समझ जाते। खाना है, यह पूछना नहीं पड़ता। नमक ठीक है। एक और रोटी लोगे। थोड़ा चावल ले लो। यह अनकहे संवाद बिन कहे सब कह देते। तुम भी खालो अब। लो, एक रोटी मेरे पास जादा है। ले लो, यह चावल भी बच गया। अचार तो तुमने लिया ही नहीं। लो लसुन वाला, कटहल का तो ख़त्म हो गया। असल में दोनों अपने माता-पिता की बात न मानने के ज़ुर्म में घर से निकाल दिये गए थे। तभी से उनकी गर्दन झुक गयी और घर से बहुत दूर यह घर, उनका चुप घर बन गया।  

{चुप घर: एक,चुप घर: दो }

सितंबर 12, 2015

कल रात

कल रात इस ख़याल के दिल में उतरते जाने की देर थी कि नींद फ़िर लौट के नहीं आई। उस दृश्य को अपने सामने घटित होते देखता हूँ तो रौंगटे खड़े हो जाते हैं। रात ऐसे ही कई बार गिरफ़्त में ले लेती है। फ़िर छोड़े नहीं छोड़ती। गुप्ता जी वहीं कहीं सड़क किनारे ख़ून से लथपथ पड़े रह गए होंगे। कोई उनके पास नहीं आया होगा। सब जो पास से गुजरे होंगे, गुज़र गए होंगे। अगर वक़्त रहते वह जिला अस्पताल पहुँच जाते तो वह आज भी होते। वह हमारी याद का हिस्सा तबसे हैं, जब हम बोलना सीख रहे थे। जब कुछ बोलने-सुनने लायक हुए वह चले गए। हम सबकी ज़िंदगियाँ ऐसी ही किसी बात याद के आसपास खुद को बुनती रही हैं। उनका पूरा नाम भले जयप्रकाश गुप्ता रहा हो हमारे लिए वह गुप्ता जी ही थे। उनकी ज़िंदगी इस दुनिया में हमारी तरह एक मामूली ज़िंदगी बनकर रह गयी।

कभी सोचता हूँ, उसी भागीरथ प्लेस मार्केट में उनकी एक तस्वीर लेकर जाऊँगा। लोगों को दिखा दिखाकर पूछूंगा। कोई जानता है इन्हे? कौन हैं यह? यह हमारे गुप्ता जी हैं। यहीं किसी जमाने में काम किया करते थे। इस तरह पूछ पूछकर अपनी ज़िंदगी की सबसे पहली डॉक्युमेंट्री फ़िल्म बनाऊँगा। देखुंगा, लोग मरकर भी कैसे सबके दिलों में ज़िंदा रहते हैं। वह भी कहीं न कहीं ज़िंदा होंगे। ज़रूर होंगे।

ऐसे ही कितने ख़याल मेरे दिल में, मेरे मन में लगातार चलते रहते हैं। जब नहीं लिख रहा होता, तब लगता है, कोई मेरे अंदर धीमे-धीमे बोल रहा है। उन सारी बातों को सुनने की कोशिश करते-करते थक जाता हूँ। थककर उन बातों को याद करने की कोशिश में लगता है, जैसे इन बातें ने धीरे-धीरे मेरे इर्दगिर्द किसी महीन मकड़ी की तरह अनदेखा जाला बुनकर अपने शिकार को घेर लिया हो। कभी-कभी लगता है मेरा दिमाग अपनी क्षमता से अधिक ऊर्जा की खपत कर रहा है। वह भी शाम ढलते-ढलते कमरे में आकर इस खिड़की के बाहर की दुनिया को अपने अंदर समेटने की कोशिश करने लग जाता है। मन कहीं एक जगह टिक कर नहीं बैठता। उसकी आदत हो गयी है बेतरह घूमते रहने की। उमर जैसे-जैसे बढ़ रही है, वह हमें आवारा बदहवास बनाती जा रही है। उसे शायद यही करना आता है। उसकी यही आदत है।

छोटी-छोटी बातों पर दिल बैठने लग जाता है। लगता है जैसे इस दुनिया में कुछ ऐसा नहीं जो अपने असल शक्ल में बचा रह पाया हो। पिछले साल की बात है। अप्रैल की। हमारी तरफ़ शादी के जब दुल्हन चार-पाँच दिन ससुराल रहकर अपने पीहर जाती है, उसी फुरसत में लड़का-लड़की दोनों अपने-अपने ननिअउर हो आते हैं। इस रसम को ‘ननिअउर गोंजना’ कहते हैं। पर मैं कहाँ जाता? कहीं जाने के लिए कोई जगह बची नहीं रह गयी। बहुत पहले मामा, फ़िर नाना और नानी। कोई नहीं बचा। एक मामा हैं, वह आधा घर बेचकर कहीं कमा रहे हैं। इस बात को वहीं दिल में दबाकर रख दिला। कुछ नहीं कहा। बचपन का वह नानी घर  इस बड़ी-सी दुनिया में कहीं गुम हो गया।

ऐसी कितनी अनगिन बातें हैं, जो इस बहुत गहरी अँधेरी रात की तरह गाढ़ी होकर मुझे चारों तरफ़ से घेरे रहती हैं। जिन्हे लिखते वक़्त दिल में कहीं खो देने के बाद कुछ बचा नहीं रहता। सुबह के साढ़े तीन बजने वाले हैं, नींद अभी भी गायब है। थोड़ी देर के लिए बाहर गया, लगा जैसे मौसम में थोड़ी ठंडक है। चाँद आसमान में गुम होकर कहीं खो गया है। कोई रौशनी नहीं है। ट्यूब पहले ही बंद कर दी। अंदर आया तो लैम्प की रौशनी में बैठे वही किस्से फ़िर ख़ुद को दोहराने लगे। कल इतवार है। वह बलरामपुर से अगर आए होते तो आज ज़रूर आते। यह जो सामने रेडियो पड़ा है, उसे पापा के साथ वहीं उनके चाँदनी चौक से खरीदकर लाया हूँ। पर पापा को इतनी रात में जगाकर बताया नहीं के अभी इसमें अपनी आवाज़ ढूँढ़ते-ढूँढ़ते गुम हो गया हूँ। सब सो रहे हैं और अब मेरी आँखें दर्द करने लगी हैं। उनमें अँधेरे की कड़वाहट भर गयी है। पर सोचता हूँ, मेज़ की तस्वीर लगाकर सो जाऊँ। फ़िर थोड़ा छत पर घूम लूँगा, तो नींद आ जाएगी। सच में। आ जाएगी।

सितंबर 11, 2015

गुप्ता जी की याद..

इधर सोचने बहुत लगा हूँ। पुराने दिनों पर घंटों सोचते हुए हफ़्तों बिता सकता हूँ। इतने दिन बिता देने की यह काबिलियत मुझमें अचानक घर नहीं कर गयी। यह मेरे ख़ून में है। क्योंकि मेरे ख़ून में इस मिट्टी की हवा नहीं है। पानी भी नहीं है। कुछ भी नहीं है। जिन-जिन के ख़ून में यहाँ की हवा नहीं होगी, वह बिलकुल मेरी तरह किसी खाली कमरे में बैठे कभी-भी गुम हो सकते हैं। हम भले इस शहर में पले-बड़े लेकिन इसकी आपाधापी से बचने के हुनर जबतक सीखते, यह शहर अपनी शक्ल बदल लेता। शक्ल बदलना इसकी पुरानी आदत है। पर जिस जगह हम रहते हैं, वह अभी भी मेरे बचपन के दिनों को समेटे हुए बिलकुल वैसी ही है। कोई पत्ता इधर से उधर नहीं हुआ, इमारत की ईंट तो बहुत दूर की बात है। ऐसे ही गुप्ताजी हमारे बचपन में लौटा ले जाने वाली खिड़की हैं।

यह आख़िरी पंक्ति हमारे बड़े होते दिनों की अलिखित भूमिका है। यह वही नक्शा है, जिसपर लिखा था, आने वाले दिनों में हम दोनों भाइयों को कैसे होते जाना है। कहीं-न-कहीं हम उन दिनों के खालीपन को अपने अंदर महसूस करते खो जाते हैं। पर पता नहीं क्यों कभी-कभी लगता है, जैसे शायद असल ज़िन्दगी में वह दौर कभी रहा ही नहीं होगा। हम बस उसे अपने अंदर ही गढ़ते रहें होंगे जैसे। जैसे वह खुली आँखों से देखा एक अधूरा कोमल सपना होगा, जिसमें नींद टूट जाने पर आँख मलते हमें स्कूल जाने में देर हो रही होगी। जैसे मम्मी कह रही हों, अब उठ जाओ। नाश्ता बन गया है। स्कूल बस भी अभी आती होगी। हर सोमवार इस स्कूल बस के आने से काफ़ी पहले इतवार भी आया करते, जब हमारे घर गुप्ताजी आने की सोचा करते। जैसे उनके आते पर ही हमारे रुके हुए इतवार आ जाया करते।

सच यह हमारे बचपन के वह साल थे, जब हम सड़कों पर इस दिन को अपने अंदर उतरता हुआ महसूस करते। ढलती हुई शाम लेम्पोस्ट से आती पीली छाया में ख़ुद को ढूँढ़ते। थोड़ा-सा ख़ुद को छिपाते। सच तब दिल्ली थोड़ी-सी तब चश्मे बद्दूर जैसी रही होगी, थोड़ी चित्तचोर के आमोल पालेकर जैसी। उनके गाने, आज से पहले आज से जादा खुशी, आजतक नहीं मिली। सुनकर देखिये, उस वक़्त में वापस न लौट जाएँ तो कहिए। हम भी उनकी याद में बार-बार लौट जाते। वह आयेंगे अपनी ख़ूब सारी बातों के साथ। यादों के पुलिंदों को कंधों पर उठाए। पहली बार हमने ध्यान से सुनना तभी शुरू किया। तब से लेकर कितने साल लगातार उन्हे सुनते रहे, बिन रुके। बिन थके।

रात में खाना खाकर वह मर्फी का रेडियो और फ़ोल्डिंग चारपाई लेकर छत पर निकल आते। वहीं नींद आने तक वे विविध भारती सुनते। तभी सुनना शायद वह एक इस बाजे का ही पसंद करते रहे होंगे। यह कल जो मैं पापा के साथ फीलिप्स का थ्री इन वन रेडियो लेता आया हूँ, वह मेरे अंदर उन दिनों की किसी बची हुई याद का बचा रह गया कोई कतरा होगा। वह शायद सीलमपुर जाने वाली दो सौ पंद्रह दो, सौ सोलह नंबर की बस के इंतज़ार में बिरला मंदिर वाले स्टैंड पर चले जाते। कभी वहाँ बस टर्मिनल हुआ करता था। उन्हे सीमा पुरी नहीं जाना होता, वह उससे काफ़ी पहले ही लाल किले पर उतरकर लाजपत राय मार्केट होते हुए भागीरथ प्लेस की अपनी अजानी-सी दुकान पर पहुँच जाते। मेरे पास उस इतवार शाम की बहुत ही धुँधली-सी याद है, जब हम लोग भी कभी शास्त्री पार्क वाले इनके किराये के मकान पर गए होंगे। मीरा चाची आई हुई थीं तब। तब मम्मी का पैर ठीक था। उसमें न सूजन थी, न इस तरह दर्द हुआ करता था। रात अँधेरे में वह गलियाँ कुछ ख़ास याद नहीं, पर लौटते हुए उस दीवार पर काली सफ़ेद पट्टियाँ ज़रूर अभी भी कभी धुँधली धुँधली-सी नज़र आती हैं।

मम्मी तब भी बड़ी मुश्किल से उन ऊँची दीवारों को लाँघ पाईं थी, इसका कारण बहुत दिनों बाद तब जान पाया, जब हमने मिशेल फूको की किताब में 'पॉलिटिक्स ऑफ़ बॉडी' को पढ़ा। तब फ़िर पता चला, सिर्फ़ पढ़ने से इस दुनिया का कुछ भी नहीं होने वाला।

{अनकही कहानी के अधूरे मुक़ाम से..}

सितंबर 08, 2015

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी..

रात अभी शुरू हुई है। मन में न जाने कितनी बातें एक-दूसरे को धकेलते हुए मरी जा रही हैं। कोई भी किसी का इंतज़ार नहीं करना चाहती। बस एकबारगी कह दूँ तो उन्हे चैन पड़े। पर उन्हें एकसाथ यहाँ कहूँगा तो कोई मतलब भी बन पड़े, कह नहीं सकता। इसलिए तरतीब होनी चाहिए। एक सलीका सबको सीखना पड़ता है। तुम भी सीख लो अविनाश। सही कह रहा हूँ। तुम्हारी कविता ठीक-ठाक बन पड़ती है। ऐसे लिखते रहे, तब भी अपनी कोई जगह तो बना ही जाओगे। पर अपने मन को कैसे समझाऊँ। वह किसी बात पर राजी नहीं है। वह जिद्दी है। शाम से ही पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि इसपर हर छपी किताब पढ़ लेने की ज़िद सवार ही गयी। वह लिखता है, उसकी कई सारी बातें अभी भी पूरी नहीं हुई हैं। पर लगता है, जैसे मेरे मन में झाँककर वह अभी गया हो जैसे। जैसे खिड़की के बाहर अँधेरे में जुगनू घूमते हुए कहीं थम जाएँ। थमकर उस दूसरे जुगनू की रौशनी में अपनी परछाईं देख सोच में पड़ जाएँ। हो सकता है, इन कही गयी बातों में भले कोई मतलब अभी न हो, आगे भी कभी नहीं रहेगा, ऐसा कतई नहीं कह रहा। यहाँ लिखी, कही, छपी हर बात का कोई मतलब है। कोई जाने न जाने। कोई माने न माने।

जैसे एक बात न जाने कब से इस चारदीवारी के चक्कर लगाए जा रही है। वहाँ सामने कील पर तुम्हारी कोई तस्वीर नहीं है। पर वह सोचता रहता है कि अब तुम अब थोड़ी मोटी हो गयी हो और थोड़ी बदसूरत भी..। इस पंक्ति के बाद जो कहा जा सकता है, वही कहने जा रहा हूँ। शादियों के बाद लड़कियाँ ऐसी ही हो जाती हैं। तुम भी हो गयी तो ऐसा कोई पहाड़ नहीं टूट गया। यहाँ मैं बिलकुल उस पुरुष की हैसियत से यह बात कह रहा हूँ, जिसमें एक लड़का, किसी लड़की को ख़ुद के लिए अप्राप्य वस्तु की तरह देखा करता है। वह उसके लिए किसी अधूरे सपने की तरह ही बनी रहती है। उसकी सबसे बड़ी जीत इसी में होती है कि उसकी औकात से कहीं आगे दौड़ने वाली वह लड़की उसे कभी नहीं मिल पायी। मिल जाना सपने का टूट कर बिखर जाना है। लेकिन एक बात है, जो तुम कभी अपने ध्यान में नहीं ला सकती। के जैसी रंगत के साथ हमने तुम्हें अपने अंदर महसूस किया है, वैसे तुम्हारा पति भी कर सकता है, कहा नहीं जा सकता। 

पता नहीं इस बीती पंक्ति का लोड तुम्हारा दिल कैसे ले(?) इसलिए छोड़ दो। तुम्हें नहीं समझ आने वाली मेरी बात। मुझे तो यह भी नहीं समझ आता तुम सब लोग क्यों फ़ेसबुक पर अपनी अपनी तस्वीरें लगा कर हमें जलाया करते हो। क्यों एहसास दिलाते हो कि हम लोग अभी भी उसी घेरे में रहा करते हैं, जहाँ पेट काट काटकर घर चलाने वाले मुहावरों को हम जीते हैं। हम मूलतः ऐसी पितृसत्तात्मक संरचनाओंमें बंधे हुए हैं, जहाँ कोई भी कदम अपनी मर्ज़ी से नहीं उठा सकते। इस अर्थ में बाज़ार के लिए निकालने से लेकर बीवी के लिए लिपिस्टिक लाने तक के सारे निर्णय जाँच आयोग के सामने से गुज़रकर अपनी नियति को प्राप्त होंगे। हमारे यह आदर्श इस शहर से कहीं छह सौ किलोमीटर दूर गोण्डा, बहराइच, बलरामपुर से होते हुए इस एक कमरे वाले गाँव तक पहुँचते हैं। यह नौकरी होने या न होने से परे हैं। यह एक ऐसे बिन्दु पर अवस्थित हैं, जहाँ ऐसे कोई भी सवाल उन्हे छू नहीं सकते। छूने पर वह पिघलेंगे नहीं, करंट मारेंगे।

यह सिर्फ़ मेरी, इस शहर, इस घर की, उस कभी न मिल पाने वाली लड़की की बात नहीं है। यह उन तमाम न कही गयी चुगलियों का लेखा-जोखा है, जो सामने होते हुए भी सामने नहीं है। इस तरह पता है, मैंने क्या किया है। मैंने तुम्हें बचा लिया। तुम जो ताजमहल को पीठ दिखाये मेरी तरफ़ देखते हुए फोटो खिंचा रही हो, वहाँ तस्वीर खींचने वाला भले कोई और है। पर जब-जब उसे देखता हूँ तो लगता है, तुमने बड़ी चालाकी से मेरी तरफ़ हिकारत की नज़रों से देखते हुए उस तरफ़ देखा होगा। तुम कहाँ इस तरह मेरी ज़िंदगी में अट पाती। कहाँ तो हम पहलीबार तुम्हारी सहेली की शादी में किसी कानपुर जा पाते। तुम्हारा इस बड़ी-सी खिड़की वाले कमरे में दम घुटता। अच्छा हुआ हमने आपस में शादी नहीं की। सच, तुम जहाँ हो वह इससे लाख गुना अच्छी जगह है। मैं भी यही चाहता था, तुम अच्छी जगह रहो।

मेरे पास बस एक गाना बचा है, इस रात को बिताने के लिए, वक़्त हो, मन हो, तो तुम भी सुन लेना कभी।

सितंबर 06, 2015

विवेक के हक़ में

यह तस्वीर जिस वक़्त की है, तब घड़ी पाँच बजकर बाईस मिनट पर स्थिर है और मदन कश्यप अपनी कविता ‘ढपोरशंख’ सुना रहे हैं। मुझे भी आए हुए काफ़ी देर हो चुकी है। शायद एक डेढ़ घंटे से खड़ा हूँ। खड़े-खड़े कमर में दर्द जैसा था, पर लौटने का मन नहीं था। देवेश से पहले समर मुझे वहीं एक कंधे वाला झोला टाँगे देखे। पास बुला लिया। साथ खड़े रहे। हमारे आसपास बहुत से लोग घेरा बनाकर कुर्सियों के इर्द-गिर्द खड़े हैं। हम भी उसी घेरे का एक हिस्सा हैं। हमसब शर्तिया बूढ़े घुटने वाले लोग नहीं हैं। उनकी ताकत अभी चुकी नहीं है। हम खड़े हो सकते हैं। फ़िर सार्वजनिक रूप से ऐसे किसी कार्यक्रम में पहली बार जाने का लाभ यह होता है कि भीड़ में अपरिचित बनकर आप काफ़ी देर तक वहाँ जमे रह सकते हैं। कोई नहीं पूछता कैसे हैं? क्या कर रहे हैं? वहाँ बहुत से सार्वजनिक व्यक्ति परिचय से बचना चाहते हैं। चाहते हैं यह संकोच कोई पास आकर न तोड़ दे। लेकिन ऐसा होता कहाँ है। जो पहचान जाते हैं। वह बता देते हैं, हम पहचान गए।


धीरे-धीरे सूरज ढल रहा है। गर्मी नहीं है। उसका एहसास नहीं है। बीच में एक चाय वाला प्लास्टिक के गिलास लिए घूमता दिखा। याद नहीं किसी ने उससे कुछ लिया भी हो। इस बैनर के पीछे से संजीव सर आगे बैठे किसी बुजुर्ग के लिए चाय का कप लाये और पूछने लगे कुछ और लेंगे। वे मुरली मनोहर प्रसाद हैं। सहजता से वे मना कर देते हैं। इधर मंच पर कभी अशोक कुमार पाण्डे उद्घोषक की भूमिका में होते कभी संजीव जी। संचालन इसी तरह चलता रहा। शमसुल इस्लाम के बाद मंच पर जनम की एक साथी ने राजेश जोशी की कविता ‘वली दक्कनी’ का पाठ किया। कविता की सबसे शानदार पंक्तियाँ अंत होने से कुछ क्षण पहले खुलती है, जब वे कविता में कहते हैं:

यक़ीन करें मुझे आपकी मसरूफ़ियतों का ख़्याल है/ इसलिए उस तवील वाकिए को मैं नहीं दोहराऊँगा/ मुख़्तसर यह कि/ एक दिन..!/ ओह ! मेरा मतलब यह कि/ इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के शुरूआती दिनों में एक दिन/ उन्होंने वली दकनी का हर निशान पूरी तरह मिटा दिया/ मुहावरे में कहे तो कह सकते हैं/ नामोनिशान मिटा दिया !/ उन्ही दिनों की बात है कि एक दिन/ जब वली दकनी की हर याद को मिटा दिए जाने का/ उन्हें पूरा इत्मीनान हो चुका था/ और वे पूरे सुकून से अपने-अपने/ बैठकखानों में बैठे थे/ तभी उनकी छोटी-छोटी बेटियाँ उनके पास से गुज़री/ गुनगुनाती हुई: वली तू कहे अगर यक वचन/ रकीबां के दिल में कटारी लगे !

अचानक मेरी नज़र अपने पीछे दायीं तरफ़ गयी तो कुर्ते पयजामे में सतीश देशपांडे खड़े दिखे। तब इनकी वह बात याद आती रही कि हिन्दी भाषी नहीं हूँ पर हिन्दी में ही कहने की कोशिश करूँगा। सीआइई की वह रिकॉर्डिंग पता नहीं कैसे मोबाइल में गुम हो गयी जो अभी तक मिली नहीं है। प्रियदर्शन अभी आकर भीड़ में गुम होना ही चाहते थे कि बिलकुल हमारे पीछे उन्हे उनके एक फ़ेसबुक मित्र ने न केवल पहचान लिया बल्कि इतमिनान से बताने लगा कि वह कितनी गंभीरता से उनकी पोस्टों को पढ़ता है। वह पता नहीं किस बात पर कह रहे थे, सब पूँजी का खेल है। होगी कोई बात। विजेंदर जी और नीलिमा जी दोनों साथ आए थे। और दिल्ली विश्वविद्यालय के साथी मास्टरों से मिलते हुए कहीं गुम हो गए। संजय सहाय, संपादक हंस, एवाने गालिब जैसी ही पोशाक में थे। वे आगे जाकर कुर्सी पर विराजमान हो गए। आनंद प्रधान को अपने लंबे होने का फ़ायदा मिलता है। वे दूर से ही पहचान लिए जाते हैं। समर इनकी टोह लेते हुए पकड़े गए थे।

देवेश ने भी अपनी शिक्षिकाओं को दूर से ही अभिवादन कर लिया। ऐसे न जाने कितने लोग, इसी पहचानने और न पहचानने के अनकहे दौर में बीत गए होंगे। अभी तक ख़ुद नहीं पहचान पाया कि वह डी. राजा ही थे, जो बगल में कुर्सी पर बैठे हुए थे। शाम की बातें बहुत सारी हैं। जैसे पंकज सिंह की लंबी कविता। केरल से दिल्ली चलकर आए उस दल के जिन्होने मलयालम में क्रांति गीत गाया। वह भी जब बालेंदु जी मसिजीवी की बात को थोड़ा रद्दोबदल के साथ दोहराते हुए कहते हैं: हिन्‍दी में कोई ऐसा कुछ क्‍यों नहीं लिख पाता कि उससे व्‍यवस्‍थाएं इतना डर जाएं कि गोली मारना लाजिमी हो जाए। आप मारिए। कितनों को मारेंगे। हमें ख़ुद को मरने के लिए तय्यार करना है।

आप इन सवालों से जूझते रहिए। समाचार यह है कि इस हत्या के विरोध में उदय प्रकाश, अशोक वाजपेयी और चित्रा मुद्गल के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, मोहनदास पर मिले 2010-11 के साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटा रहे हैं। हम सब भी लौटेंगे, एक दिन।

{किश्त पिछली, इसे एक राजनीतिक वक्तव्य होना था।}

सितंबर 05, 2015

गुरु-चेला संवाद

गुरु: पुनीत जी आपकी इस किताब पर मैंने जनसत्ता में लिखा था। वह भी खरीद कर। इस पर लिखी गई बेहद कम समीक्षाओं में एक वह भी। लेकिन हम जैसे हिंदी के मामूली लेखक आपको याद नहीं रहते। हिंदी के लेखक में ग्लैमर नहीं होता न। लेकिन दुर्भाग्य से आप भी उसी ग्लैमरहीन भाषा के लेखक हैं। बहरहाल शुभकामना आपको। ख़ुशी हो रही है।

चेला: सरजी, ऐसा क्यों कहते हैं.. हमें इस किताब को लेकर एक-एक लोग याद हैं.. आपने लिखा सो लिखा ही.. मौके-मौके पर जबरदस्त ढंग से इसकी बात लोगों तक रखी. कुछ बातें दुरुस्त करके स्टेटस में लिखी है, पढ़िएगा न।

चेले का दुरुस्त स्टेटस:
हिन्दी के तमाम अखबार के लोगों ने इसे पढ़ा। फोन पर बधाई दी, मिलने को कहा। और बेहतर करने के सुझाव दिए लेकिन इस पर कुछ लिखना-कहना जरूरी नहीं समझा.. इस बीच निशांतजी का विस्तार से लिखा जनसत्ता में आया.. निशांतजी के लिखे की सबसे खास बात थी कि उन्होंने किताब के उस हिस्से को मजबूती से पकड़ा जहां पत्रकारिता, धंधा और राजनीतिक धत्तकर्म एक सर्किल बनाते नजर आते हैं. किताब युवा साहित्य अकादमी की आखिरी दौड़ तक जाकर रह गई। निशांतजी ने इस पर फिर से स्टेटस अपडेट किए और कुछ वो वजहें बताई जो पुरस्कार-सम्मान की मकड़जाल की कहानी कहती है। 

चेला (दोबारा, हिचक से बाहर आकर): निशांतजी जब कभी मेरी वॉल पर अपने को हिन्दी का मामूली लेखक लिखते हैं, लगता है अपना माथा नोच लूं या फिर अपनी आंखें फोड़ लूं। न ये आंखे रहेंगी और न ऐसे वाक्य पढ़ने पडेंगे।

हिन्दी क्या दूसरे अनुशासन के लोगों का मार्केज से परिचय करानेवाला, स्कॉर्पियो क्लास लिखनेवाला, टेढ़ीपुलिहा को नए लोगों के लिए छपाई का ऐशगाह बनानेवाला हिन्दीजीवी आखिर किस हाल में मामूली होगा। असल में हम जिसे निशांतजी की सहजता समझते हैं, बाकी कई दूसरे लोगों की अकड़ के पाजामे धारण करनेवाले से अलग समझते हैं, निशांतजी खामखां उसके लिए मामूली शब्द का इस्तेमाल कर जाते हैं। निशांतजी, आप जब भी अपने लिए मामूली शब्द का इस्तेमाल करते हैं, मुझे अपना कद बहुत ज्यादा ठिगना लगने लग जाता है..आप हमारे लिए इंचटेप हो, हम अपना कद आपसे मापते हैं..प्लीज मत लिखा करें ऐसे शब्द..हमारा उत्साह मरता है..चायगोई का लेखक तो मामूली करार दिए गए लोगों के उद्दात्त रूप को हमारे सामने ला रहा है..उसका मामूली होना जमाने का प्रहसन है।

{यहाँ गौर करने लायक है, चेले का गुरु के नाम की माला जपना। ख़ुद गिनकर देखिये, कितनी बार निशांतजी का नाम लिया गया है }

सितंबर 04, 2015

इसे एक राजनीतिक वक्तव्य होना था..

बिलकुल अभी, सीढ़ियाँ चढ़ते हुए सोच रहा था, कितना अच्छा होता, मैं इस दुनिया के किसी भी देश का नागरिक न होता। पर इस सोचने के साथ ही एक पल में मैंने न केवल राष्ट्र-राज्य के राजनैतिक इतिहास को ख़ारिज कर दिया अपितु इस किसी भी तरह से हताश दिखने वाली टिप्पणी में उन सारी परिस्थितियों को भी ताक पर रख दिया, जिसमें यह छोटी-सी छत का एक बड़ा-सा कमरा मुझे अपने अंदर छिपाये रखता है। यह वह अवस्थिति है, जो एक पागल अस्थिर दिमाग की उपज जादा लगती है। हो सकता है, यह है भी। जैसे हम होते गए हैं उसमें इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। पर इस स्थिति को थोड़ी देर स्थगित करते हुए थोड़ा सोचने लगता हूँ तो दीपांकर गुप्ता याद आने लगते हैं। 

हमें एक उपनिवेश होने का लाभ मिला, जिसके फलस्वरूप हमने लोकतान्त्रिक व्यवस्था को शासन प्रणाली के रूप में चुना। आरक्षण के रूप में सकारात्मक भेदभाव को चुनते हुए, धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के संरक्षण को भी सशक्त रूप से स्वीकार किया। यह सब माँगें भले पश्चिम की अवधारणों से निकली थीं, लेकिन यह विविधता पूर्ण राष्ट्र के भविष्य के लिए देखे गए सपने थे। स्वतन्त्रता आंदोलन के रूप में एक साथ इन सभी विरोधाभासी घटकों को लेकर आज़ादी की तरफ़ बढ़ रहे भौगोलिक क्षेत्र को दीर्घकाल में एक समतामूलक समाज में परिवर्तित हो जाने के लिए बाध्य परिस्थितियों का निर्माण करना था। आज भी हम इस संघर्ष में डटे हुए हैं।

लेकिन लगता है, कहीं चूक हो गयी है। जिन प्रणालियों को हमने अपनाया, वह इस समाज के लिए जैविक निर्णय की तरह नहीं बन पायीं। यह कौन-सी ताक़तें हैं, इसकी पहचान इतनी मुश्किल भी नहीं है। महात्मा गाँधी की दिल्ली में हत्या इस असंतोष की पहली प्रामाणिक उपस्थिति है। इसे किसी सिरफिरे के दिमाग की उपज कहकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता। पूरा देश जिस तरह ख़ुद को गढ़ने की कोशिश कर रहा था, उसमें यह सबसे बड़े हस्तक्षेप के रूप में आया। फ़िर भी यह देश सपनों का देश है। आज भी जब कभी कसप उठाता हूँ, आगे लिखी देवीदत्त की पंक्तियाँ, इस देश पर सबसे बड़े राजनैतिक वक्तव्य की तरह मिलती हैं:“दुर्भाग्य से इस देश में एक ख़ास तरह का काईयांपन प्रबुद्धता के नाम पर प्रतिष्ठित हो गया है और मैत्रेयी उससे अछूती नहीं रह सकी है। यह काइयांपन शायद ह्रासोन्मुख हिन्दू मानस की देन है। इसके चलते गरीबी और उपभोग की संस्कृति का वह दारुण समन्वय किया गया है, जिसका नाम आधुनिक भ्रष्ट भारत है। इस भारत के लिए प्रतीकात्मकता ही सब कुछ है। तकली थाम लेने से गांधीवाद हो जाता है। बंदूक पकड़ लेने से माओवाद। सेमीनार कर लेने से संस्कृति। चुनाव करा देने से लोकतंत्र। सड़क बना देने से प्रगति। संस्था खोल देने से संस्था के उदेश्यों की पूर्ति”।

इसी के आसपास पार्थ चटर्जी सन् उन्नीस सौ छियानवे में जर्मन दार्शनिक इमानुएल कांट के सहारे कहते हैं, हर कोई स्वतः प्रबुद्ध नहीं होता, उसे प्रबुद्ध होने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जो गुज़र गए हैं, वह सीमातित हैं। वह अपने लिए उस परिधि का निर्माण करते हैं, जहाँ वह तर्क कर सकें, वह सहिष्णु हो सकें। स्वयं में दूसरे की बातों को सुनने के साहस को भर सकें। वह वैचारिक भिन्नता का आदर करते हैं। स्वतन्त्रता के सपने देखने के लिए स्वतंत्र होते हैं। वह एक मुक्त और सार्वभौमिक क्षेत्र होता है, जहाँ प्रबुद्ध होने की परिस्थितियाँ लगातार बनती हैं। इसके लिए सबसे ज़रूरी है, विचारों की स्वतन्त्रता। स्वतन्त्रता का उत्तरदायित्व पूर्ण निर्वहन। दुर्भाग्यपूर्ण है, किन्तु यह सत्य है, हम अपने यहाँ ऐसे क्षेत्रों का निर्माण करने में बहुत पीछे छूट गए हैं। पीछे छूटना एक ख़ास तरह की सुविधा का उपभोग करना है। वह तार्किक नहीं हैं इसलिए आस्थावान हैं। उनके पास अपनी भावनाओं के ठेस पहुँचने का सारा बहीखाता है।

मैंने भी कह दिया है, कलतीन बजे जंतर मंतर मिलुंगा। वहाँ कोई मुझे पहचानेगा नहीं पर फ़िर भी ख़ुद के लिए जाऊँगा। हो सकता है, एक दिन मेरी पत्नी भी दरवाजा खोलकर उन दोनों कम उम्र के नौजवान लड़कों को बैठने के लिए कहे और वह मुझे देखते हो बंदूक से मार दें। मैं जाऊँगा कि हमेशा बोल सकूँ। उनकी आदत अगर मारना है, तब हमारी आदत बोलना है। हमें ख़ुद तय करना है, हम चुप रहेंगे या उस देश को बनाएँगे जो सबकी आवाज़ों को सुन सके। मेरा लिखना ही मेरी ज़िन्दगी है। आने वाली पीढ़ियाँ भी कह सकें इसलिए जाऊँगा।

{दिन शनिवार, जंतर मंतर, विवेक के हक़ में। }

आवाज़ें..

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