अक्तूबर 28, 2015

चुप घर

वह एकदम शांत क़िस्म की दीवारों वाला घर था। छिपकली भी आहिस्ते से उनसे चिपकी रहती और कोई जान भी न पाता। जाले दरवाज़े के पीछे छिपकर सालों से वहीं बने हुए थे। पलस्तर धीरे-धीरे अम्मा की अधीर आँखों की तरह उखड़ रहा था। सफ़ेदी को सीलन के साथ पपड़ी बने ज़माना बीत गया, किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ा। सब उस फ़र्श पर चिपके गोबर की तरह चितकबरी रोटी खाते रहे। कोई कुछ बोलता, उससे पहले ही खाकर उठ जाते। सब एक-दूसरे से बोलने को होते पर बोल नहीं पाते। सबके पास न जाने कबसे यह अनकहे अनुभव ऐसे ही अनसुने रह गए।

यह न सुनकर सुनना, इस घर की अपनी अलग पहचान थी। सबने अपने-अपने बर्तन चुन लिए थे। फूले की थारी बाबा की।  इस्टील वाली बड़की अम्मा की। एलमुनियम का कटोरा काका का। दो छोटे चिम्मच लड़कियों के। एक-एक कटोरी उस छोटकी बिटिया के जिसके पेट से बाद में यह दोनों पैदा हुईं और तबसे घर समेत सब कुछ भी कहना भूल गए। वह बस अपने बर्तनों को ख़ास धुनों में बजाते और सब समझ जाते।  किसने किससे क्या कहा। कौन क्या कह रहा है। किसे क्या चाहिए।

इस कहानी को कहता कोई नहीं, बस सब अपनी याद में याद करते। एकबार जेठ का महिना रहा। तपता। पिघलता। चिपचिपा। उमस भरा। बरसात की एक बूँद भी नहीं बरसी थी तब तक। तब इस गाँव के गरम दिमाग वाले परमुख जी इस घर तलवार लेकर आए और सबकी ज़बान काटकर अपने साथ ले गए। कोई कुछ नहीं समझ पाया। कोई कुछ नहीं बोल पाया। सब जैसे अंधे हो गए। सबसे पहले उन्होने उसकी जीभ काटी, जो पंचायत में हारकर भी कोरट जाने की धमकी देती रही। एक वो दिन है, एक आज का दिन है। तब से लेकर आजतक यहाँ जब भी कोई बच्चा पैदा होता, उसका बाप सबसे पहले उसकी मुलायम-सी गुलाबी जीभ काटकर उनके दुआरे चढ़ाये आता। बिन कहे। यह जिंदा रहने की पहली शर्त थी। यही आख़िरी शर्त थी।

तब से यह चुप घर था। दूर से भी चुप। पास से भी उतना शांत। बिन झिलमिलाये। कोई हरकत, किसी भी तरह की हरारत से मुक्त। अंदर-ही-अंदर कुढ़ता, उमस भरा, साँस लेता, फेफड़े जलता, फ़िर भी मरा हुआ। चुप घर।

{चुप घर: एक, दो, तीन

अक्तूबर 27, 2015

किस्सा किताबों का


पुरानी दिल्ली, दरियागंज। किताबों की ज़िंदगी भी कैसी होती है। कभी ऐसा भी होता है, हम अचानक उस किताब तक पहुँच जाते हैं, जो इसी शहर में न जाने किसकी अलमारी में, मेज़ पर, कहीं अलगनी पर टंगे झोले में कब से पड़ी रही होंगी। फ़िर एक दिन आया होगा, जब उनकी कीमत मूल्य विहीन होकर धूल खाने से जादा नहीं रही होगी। वहाँ देखता हूँ, किताबों के ढेर के ढेर पड़े हैं। बेतरतीब। वह कौन से पल होते होंगे, जब हम किताबों को अपने घरों, दीवारो, छतों से निकालने के ख़याल से भर जाते होंगे। समझ नहीं पाता, कैसे ख़ून की तरह हमारी नसों में बहती किताबों को बेचने के लिए वह तय्यार होते होंगे।

अभी इसी इतवार की बात है, अज्ञेय की एक किताब है, आदम की डायरी। किताब खोलते ही उनका जीवन परिचय है। भारतीय आधुनिकता के पुरोधा कवि, कथाकार, आलोचक, संपादक। बिलकुल इसकी पीठ पर, अगले पन्ने पर बॉल पेन से लिखा है, ‘प्रिय रश्मि को जन्मदिन पर सप्रेम भेंट’। लिखने वाले का नाम देवेन्द्र है। तारीख़ पड़ी है, बीस जुलाई दो हज़ार दस। सरसरी निगाह डालने पर कहीं किसी पन्ने पर कोई पैन-पेंसिल का निशान तक नहीं है। इस छोटी-सी कहानी में नायिका का नाम मैंने बदल दिया है। बाकी सब वही है। यह कैसे हुआ कि एक कहानी की किताब घर में जगह नहीं बना पाती। हो न हो यह दोनों नाम शशि-शेखर के उसी दौर को दोहरा रहे हैं। हमारा समाज आज भी प्रेम के लिए सहिष्णु नहीं बन पाया है। उसे बनना है।

ऐसे ही दो किताबें अनुपम मिश्र की मिली। गांधी शांति प्रतिष्ठान से प्रकाशित इन पुस्तकों पर उनके हस्ताक्षर हैं। पहली किताब, ‘राजस्थान की रजत बूंदें’, किन्ही ‘प्रिय संजय जी को भेंट’ है। अपने हाथों से उन्होने तारीख भी लिखी है, एक फरवरी, सन् दो हज़ार। दूसरी किताब है, ‘आज भी खरे हैं तालाब’। यह केवल ‘सादर भेंट’ है। यहाँ भी शब्दों के ऊपर शिराएँ जल की लहरों की तरह तरंगित हैं। गतिमान हैं। उसके अगले पृष्ठ पर उस पुस्तक के क्रेता ने अपने साइन करके तीस अगस्त दो हज़ार दो की तारीख डाली हुई है। ‘साफ़ माथे का समाज’ दिखी, पर मेरे सामने ही कोई और खरीदकर ले गया। ख़ैर।

फ़िर जो आप इतनी देर से ऊपर लगी यह तस्वीर घूर रहे हैं, इस किताब का किस्सा भी यही है। आलोक श्रीवास्तव की अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित कृति 'आमीन' का राजकमल प्रकाशन से यह तीसरा संस्करण है। और मेरी तरह आप ठीक पहचान रहे हैं। पहले मैं भी आश्चर्य में पड़ गया था। कैसे किसी की सप्रेम भेंट की गयी कृति के साथ ऐसा बर्ताव किया जा सकता है। जबकि आप एक साहित्यिक ब्लॉग जानकी पुल के मॉड्रेटर कहे जाते हैं। जिनकी दुकान से यह किताब ली गयी है, उन्होने बताया, क्या बताएं भाई, कॉलेज में उनके तो चार कमरे किताबों से भरे पड़े हैं। हमने तो सारी किताबें चौबीस हज़ार में खरीदी हैं। अब हाफ में भी न बेचें तो कैसे काम चलेगा। शायद हिन्दी के उपरोक्त लेखक द्वारा प्रयुक्त की गयी यह युक्ति, इस रूप में 'पुस्तकों का लोकतंत्रिकीकरण' है के हमने अपने यहाँ से किताबें निकाल दीं हैं, अब खुले बाज़ार में उन्हें कोई भी खरीद सकता है।

हो सकता है, वह पुलिहा से किताबें फेंककर पानी की गहराई नाप रहे हों। तैरने से पहले नापना, बुद्धिमानी का लक्षण है।

अक्तूबर 26, 2015

मन भी क्या अजीब चीज़ है

पता नहीं यह दिन कैसे हैं? कुछ भी समझ नहीं आता। मौसम की तरह यह भी अनिश्चित हो गये हैं जैसे। जैसे अभी किसी काम को करने बैठता हूँ के मन उचट जाता है। खिड़की पर पर्दे चढ़ाकर जो अंधेरा इन कम तपती दुपहरों में कमरे में भर जाता है, लगता है, वहीं किसी कोने से दाख़िल होकर मेरे मन में भी बैठ जाता होगा। उस लाल ढलते सूरज की परछाईं में लेटे-लेटे खोने लगता हूँ। मन किया तो धीमे-धीमे गाने की आवाज़ को सुनने की कोशिश में लगता नींद आने वाली है। नींद वहीं दरवाज़े की ओट में या खिड़की के शीशे पर घात लगाए बैठी रहती है। मुझे दिन की दिहाड़ी के लिए किसी लेबर चौक पर सुबह-सुबह नहीं खड़े होना। इस इतिहास चक्र में हमारे परिवार के पास जो भी सांस्कृतिक पूंजी है, उसके सहारे मैं अभी थोड़ी देर बाद रोटी या दाल के लिए चौराहे की दुकान तक चिरौरी करने नहीं बल्कि कालीबाड़ी की तरफ़ रातरानी की सुगंध ढूँढ़ने जाऊंगा। इसतरह हम सब अपनी अपनी ज़िंदगियों को रोज़ तलाशते हैं। आहिस्ते-आहिस्ते। कोई बताता नहीं है।

जैसे मेरे दोस्तों को किसी ने नहीं बताया, उन्होने ख़ुद इस बात को जान लिया। के जिन परिवारों से वह आते हैं, उनमें पैसा कमाने का हुनर सिर्फ़ उनके पिता के पास था। जिसे उन्होने इतने सालों तक संभाले रखा। यहाँ तक के अपनी पत्नी, उनकी माताओं तक को नहीं दिया। वह वही हुनर अब आपकी बहन को न देकर सबकी निगरानी में हमारे सुपुर्द कर रहे हैं। अब वह सब इस देश में छितर गए है, सब कमाने और निचोड़ने लगे हैं। अब परदेस में उग आए उन नए घरों को संभालने लायक लड़कियों की तलाश में जुट गए हैं। अम्मा तो अब वैसे भी बूढ़ी हो चलीं हैं, पिताजी को संभाल ले वही ठीक है। पर ऐसे बहुत से लड़के होंगे जो पार साल और उसके भी पहले बिन नौकरी माता-पिता की मर्ज़ी से शादी कर चुके होंगे। उनके निर्णयों को किस नज़र से देखने की ज़रूरत है, पता नहीं। पर इसके अलावे भी बहुत-सी बातें होंगी। नहीं होंगी।

जैसे मेरा जनवरी में ख़रीदा फ़ोन अब किसी नयी एप्लीकेशन को क्यों नहीं डाउनलोड कर पा रहा। क्यों पूरा दिन इस कमरे में रहने के बावजूद अभी दस मिनट पहले उठा और बोतल से पानी गिलास में डालकर पिया। क्या मौसम इतना ठंडा हो गया है या कोई और बात है। क्यों चाँद को देखने के लिए खिड़की से पर्दे को हटा दिया है। ऐसा ख़याल पहली बार कब आया के कुछ कुछ दिन उन दोस्तों के नबरों को ब्लॉक लिस्ट में डालकर देखते हैं। कभी उनको याद आएंगे भी। क्या उन्हे कभी इतनी फ़ुरसत होगी के अपनी फ़ोनबुक में मेरा नाम देखकर कुछ सोचते होंगे। अब क्या ऐसे दिन आ गए कि जिन बातों को डायरी में छिपाकर रख लेना था, उन्हें यहाँ शाया करने लगा। या शायद हम उन आख़िरी लोगों में हैं, जो कागज़ पर कलम से भी लिखते हैं और इस हाइपर रियल मीडियम पर भी अपना दखल रहते हैं। वैसे सच है, इधर कागज़ पर लिखना कम हुआ है। पर यह भी सच है, उतनी शिद्दत से शैफ़र, लैमी, सरवेक्स के फाउंटेन पैन ख़रीदने लगा हूँ। कुछ नए पन्ने कहीं से मिल जाएँ। कई बातें अधूरी रह गयी हैं, कुछ अधूरी छोड़ दी हैं, उन्हे सिरे से देखते हुए तरतीब से लगाना है। ऐसे लगाना है कि दूर से दिख जाए।

दिख जाये कि यह भी कोई जगह है, जहाँ अपने मन को आसमान में ढलते चाँद की तरह नीचे, अपने दिल में उतरते देख सकते हैं। वह ठंडक जो इस शहर की आबोहवा में कहीं गायब हो गयी है, उसे कुछ देर महसूस कर सकें। उन आँखों के कोनों में आ गयी नमी से धुँधली होती दुनिया में ख़ुद का अक्स झिलमिलाता देख पाएँ। सोचा था, बड़े शानदार तरीके से इसके लेआउट और पूरे हुलिये को बदल दूँगा। आप देख कर बताइये, कुछ कमियाँ ज़रूर हैं पर कैसा लग रहा है। चार दिन से लगा हुआ हूँ। एचटीएमएल एडिट करना नहीं आता, फ़िर भी ज़िद से इतना सुधार पाया। बस अभी इतना ही। कॉफी ठंडी हो रही है।

अक्तूबर 22, 2015

एक लड़के की डायरी

पता नहीं वह उस पल के पहले किन ख़यालों से भर गया होगा। यादें कभी अंदर बाहर हुई भी होंगी? बात इतनी पुरानी भी नहीं है। कभी-कभी तो लगता अभी कल ही की तो है। दोनों एक वक़्त पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर खड़े, अपने आगे आने वाले दिनों के खवाबों ख़यालों में अनदेखे कल के सपने बुना करते। बुनते-बुनते थक जाते। पर कभी उन लोहे के बेंचों पर नहीं बैठते। बैठना सपनों में कहीं ठहर जाना था। जैसे कुछ दिनों बाद दोनों अब रोज़ मिलने के बहानों से कहीं दूर जाने वाले थे। लड़का-लड़की का यह जीने-मरने वाला प्यार था। जिसमें दोनों का मन ‘कसमें वादे निभायेंगे हम’ वाला ड्यूट गाने को करता रहता। कभी शायद गाया भी होगा। मन में। चुपके से। बिन किसी को कहे। उन्होने कभी बताया नहीं।

एक तरफ़ दोनों थे। एक तरफ़ सब थे। सब कहते, वह कभी नहीं मिल पायेंगे। सब उन्हे उनसे कुछ जादा जानते थे। क्योंकि वह सब भी नहीं मिल पाये कभी। सब असल में डरे हुए लोगों का जमावड़ा थे। वह इस भीड़ में जीते और इसी भीड़ में मर जाया करते थे। हम सोचते, एक दिन आएगा जब लड़के की नौकरी लग जाएगी, तब देखेंगे। इस ‘हम’ में हमेशा ‘लड़के’ होते। हमारे पास उस वक़्त न नौकरी थी, न इस सवाल का कोई जवाब था। हम बस उन दिनों दोनों का साथ होना देखते रहे। हमें कुछ करना नहीं था, बस देखना था।  

क्योंकि हम लड़के हैं इसलिए दूसरे लड़कों को समझने में जादा दिक्कत नहीं आती। मुझे हमेशा लगता, लड़के चाहे जैसा भी सोचा करते हों, वह मूलतः ‘पुरुष’ होते हैं। वह घर में शादी की बात पर ऊपर से कुछ भी दिखाते रहें, अंदर से वह ख़ुद परिवार से हार जाना चाहते हैं। वह कभी उस लड़की को अपने साथ ज़िंदगी भर नहीं झेल सकते, जो उनके अतीत में बराबर की भागीदार रही हो। उनके मन में हमेशा ऐसी लड़की की छवि बनती रहती है, जिसे उन्होनें कभी नहीं देखा हो। देखना, सपनों में बनती छवि का टूट जाना है। फ़िर वह जो हमें अरसे से जानती है, उसके सपने भले आते रहें, पर मन कुछ और ही गढ़ता रहता है। मुझे नहीं पता कि लड़कियों के मन में यह प्रक्रिया किस प्रकार घटित होती होगी। लेकिन हमारे समाज की इस संरचना में, जहाँ अभी भी माता-पिता घर में शादियाँ तय करते हैं, वहाँ इससे इंकार नहीं किया जा सकता। यह इस ‘उपभोक्तावादी समय’ में हमेशा कुछ बेहतर की उम्मीद है। यह हमारे भीतर संवेदना का ‘स्थगन काल’ है। हम इस वक़्त को अपने चेतन-अवचेतन के भीतर बिना किसी प्रतिरोध, ‘आत्मसात्’ कर रहे हैं। यह हमारे लिए एक ‘सुविधा’ बनता जा रहा है।

जिस तरह यह शहर शैक्षिक संस्थानों के भीतर लड़के-लड़कियों के लिए एक वृहद परिधि का निर्माण करते हैं, वहाँ इसके संभावना सबसे अधिक है। जितनी सहजता से हम यहाँ आपस में मिलते हैं, दूसरी ऐसी कोई जगह नहीं है। इसके बावजूद हम सबके अंदर, कहीं गहरे यह बात गड़ी रहती है कि भले इस सामने वाली लड़की के साथ हम किसी भी तरह से पेश आयें, यह हमारे माता-पिता या घरवालों को रास नहीं आएगी। क्यों नहीं आएगी, इसके तार्किक आधार भी हमारे मन मस्तिष्क में बनते-बिगड़ते रहते हैं। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बिन्दु छूटा जा रहा है कि आख़िर इसमें शिक्षा की क्या भूमिका है। वह कुछ करने की हैसियत में है या हम उसे अभी देख भी नहीं रहे हैं।

ध्यान से देखने में हम पाते हैं कि शिक्षा इस पूरी प्रक्रिया में उन्ही सांस्कृतिक-सामाजिक मूल्यों का पुनुरुत्पादन बड़ी बारीकी से करने लगती है, जिनके विरुद्ध वह ख़ुद को स्थापित करना चाहती थी। वह करिने से समझाती है के सामने वाली लड़की हमारे जाति की नहीं है। उनके यहाँ रीति-रिवाज़ हमारे धर्म के मुताबिक नहीं हैं। उसकी सोच भले आधुनिक मूल्यों से संचालित हो पर घर में हमें कोई मोर्चा नहीं खोलना। हम चाहते हैं, वह उस घर को जैसे भी हो, संभाल ले। क्योंकि हम बचपन से उस घर को देखते आ रहे हैं, इसलिए हमारी इतनी दोस्त हमारी पत्नी नहीं बन पाती। यह आख़िरी पंक्ति भी बड़ी चालाकी से उन संघर्षों की भविष्य में बनने वाली पृष्ठभूमियों को सिरे से ख़ारिज कर देती है। इसमें क्या छिप गया है, उसे अधिक विचलित होने की ज़रूरत के बिना, ऊपर की बातों को साथ लेकर थोड़े धैर्य से देखते चलना हैं।

एक तरफ़ मैं अपनी दोस्त से शादी न करके, उसके अच्छे खासे जीवन को असहज एवं असुविधाजनक बनने की संभावना को सिरे से ख़ारिज कर देता हूँ। वहीं दूसरी तरफ़ अपनी आधुनिक, जुझारू, संवेदनशील छवि को हमेशा के लिए बचा ले जाता हूँ। यह इस छवि के पीछे मेरी अक्षमता को छिपा ले जाना है। जहाँ मेरा बचपन का घर मुझसे नहीं छूटता। जो मेरी स्मृतियों में आज भी वैसा का वैसा बना हुआ है। इसे मैं तुम्हारे लिए छोड़ तो दूँ, पर मन वहीं किसी कोने में अरझ कर रह जाएगा। फ़िर जब मैं तुमसे झगड़कर किसी बात को मानने के लिए कहूँगा, तुम्हारे मन में हमारे बीते दिनों की यादें एक तुलनात्मक अध्ययन खड़ा करने में तुम्हारी मदद करेंगी। फ़िर तुम्हें मेरे व्यक्तित्व में फाँक नज़र आएगी, जिसे आख़िर तक सामने नहीं लाना चाहता था। मैं भी सोचने लगूँगा जहाँ से हम चले थे, वहाँ मैं भी ऐसा नहीं था।

अक्तूबर 20, 2015

उस रात तुम्हें देखते हुए..

जब हम सब खाना खा लेते हैं, तब सोचने लगता हूँ कि वह जल्दी से बर्तन माँज लें और हम दोनों हर रात कहीं दूर निकल आयें। हम दोनों की बातें पूरे दिन इकट्ठा होती गईं बातों के बीच घिरकर, झगड़ों के बगल से गुज़रकर सपनों के उन चाँद सितारों में कहीं गुम हो जातीं। हर रात ऐसा ही होना लिखता रहता। लिखता रहता उन सपनों का होना। उनका नींद में होना। रातरानी की महक जैसे। सुरमई चाँदनी की रौशनी की तरह। कहीं बैठे रहें घंटों। अकेले। कमरे के अंदर। खिड़की के पार।

पर वह थोड़ी थक जाती हैं। थकना कभी इंची टेप से मापा नहीं, पर वह इसे थोड़ा ही कहती रही हैं। बिलकुल हमारी माँ की टू-कॉपी। वक़्त इस तरह हरबार रसोई में ख़ुद को दोहराता रहा। चाहे हम देखें या न देखें। फ़िर सब कहते भी हैं, लड़कों को अपनी मम्मी नहीं शादी के बाद बीवी ही नज़र आती हैं। शायद सब सच ही कहा करते होंगे। पर दोनों को पूरे दिन की भागादौड़ी के बाद कभी यहाँ आकर इस किताब को पढ़ने की फ़ुरसत उन्हे कहाँ? दोनों एक-दूसरे की आँखों में सब पढ़ते रहे हैं।

अक्तूबर 19, 2015

हमारी अधूरी कहानी..

हम कभी नहीं सोचते, पर हो जाते हैं। कितने दोस्त बन जाते, इसी सब में। पर फ़िर भी हम तो दोस्त उसी के बनना चाहते। मन मार लेते। सब साथ दिखते। पर हम उसके साथ होना चाहते। कुछ न बोलते हुए भी सब बोल जाते। पर वह कहीं न होती। हम कहीं न होते। जगहें वहीं रह जातीं। हम हम नहीं रह जाते। वह वह नहीं रह जाती।

फ़िर सालों बाद कहीं कोई तस्वीर दिख जाती। कुछ कह जाते, कुछ उसकी आँखों की गहराईयों में ही खो जाते, कुछ नहीं कह पाते। हम सिर्फ़ अकेले नहीं थे। बहुत थे। पर लगता रहता, हम अलग हैं। हम कहते एक बार तो मान जाती। यही सोच बीत जाते।

अक्सर सबके दिल के किसी कोने में कुछ खास उग रहा होता है, जो सामने वाले को दिख भी रहा होता, तो भी वह नहीं दिखता। ऐसा सामने वाले को महसूस नहीं होता, पर सब वहीं होकर भी नहीं होता। सबको पता होता है, कुछ है। पर उन्ही दो को नहीं पता चल पाता।

कह कर भी क्या करते। नौकरी हुई नहीं थी। लड़की कुछ जादा सुंदर थी। साँवली-सी। मेरे रंग की। अपन कुछ खास नहीं रहे होंगे। दिखते भी उलझे-उलझे से। बेतरतीब। बे फ़िकर। अल मस्त। हिज्जे हरबार ऐसे ही उलझ जाते। कुछ नहीं कहना ही सब कुछ कहना रहता।

फ़िर एक शाम होती, जब पुराने दोस्त दोबारा मिल जाते। फ़िर वही पुराने पन्ने पलटते। कुछ उस सामने वाली डेक्स पर बैठने वाली लड़की की बात कह चुप हो जाते हैं। ऐसी ही बहाने बनाकर उन दब गयी डायरियों के मुड़े पन्ने फ़िर खुल जाते। पर अब वह वक़्त कहाँ। कल ही उसने अपनी तस्वीर लगाई है। कहीं पहाड़ों पर ढलते सूरज को देख रहें हैं दोनों।*

*पता नहीं, वह अपने हिस्से वाली इश्क़ की कहानियाँ कब कहेगी ? उसी इंतेज़ार में रात के नौ बज गए। दस, बारह, एक, दो भी बजते हैं, रोज़। पर वह कभी नहीं कहती, अपने हिस्से का इश्क़। मुझे पता है, कभी नहीं कहेगी वह। कुछ नहीं कहेगी कभी।

{ पीछे पन्नों पर, हमारी अधूरी कहानी..}

अक्तूबर 18, 2015

दीवान-ए-ख़ास : जो पिच्चीकारी जानते हैं

आज कल यह तर्क बहुत चल रहा है कि जनता भी विरोध दर्ज़ करना चाहती है, पर उसके पास सुघड़ भाषा और उसकी पिच्चीकारी करती मुहावरेदार शैली नहीं है। वह सब, जो इसकी ओट में पीछे खड़े हैं, इस बहाने से आम जनता के प्रवक्ता बनकर उभरे हैं। वह ख़ुद इस पद पर नियुक्त कर लिए गए हैं। यह संगठित रूप से विरोधी या असहज या स्पष्टवादी लहजों को ख़त्म कर देने की अतिवादी ज़िद है।

{इक्कीस सितंबर, सुबह ग्यारह बजकर चालीस मिनट · नयी दिल्ली }

इनाम इकराम के अलावे
यह जितने भी लोग प्रतिरोध, असहमति, विवेक के नाम पर लेखकों के इनाम और इकराम लौटाने की बात पर उनकी पीठें ठोक रहे हैं, क्या उन्हें बिलकुल भी नहीं पता कि यह अपनी बिरादरी के एक सदस्य की हत्या के बाद लामबंद हुए हैं। वह कभी किसानों के द्वारा की जा रही आत्महत्या पर नहीं बोले, भ्रष्टाचार को अपनी आँखों के सामने घटित होता देखते रहे।

वह तब भी कुछ नहीं बोले जब बेरोज़गारी से इस देश के नौजवान अपनी जवानी में इन कन्धों पर अपना बोझिल बुढ़ापा लिए घूमते रहे। सांप्रदायिकता और जातिवाद से देश झुलसता रहा वह तब भी चुप रहे। आज अपनी 'वैधता' को बचाए रखने के लिए जन सरोकार की आड़ में छिप रहे हैं। अगर लेखक होना औरों से अधिक संवेदनशील हो जाने की वरीयता प्राप्त कर लेना है, जादा जिम्मेदार हो जाना है, तब तक मेरी असहमति रहेगी। यह लेखक नहीं कुछ और हो जाने की आज़ादी लेना है।

{सत्रह अक्तूबर, रात ग्यारह बजे लगभग। नयी दिल्ली। }

जो बातें रह गईं, दोबारा से
अभी लगता है, दो-तीन बातों को और स्पष्ट करने की ज़रूरत है या उन्हें फ़िर से कहा जाना चाहिए।

‘अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’ लेखकीय जीवन के लिए मूलभूत आधार है। उसके लिए एकजुटता प्रदर्शित करने, राज्य के विरुद्ध प्रतिरोध करने के कई सारे तरीके हो सकते हैं। पुरस्कार लौटाना आततायी शासक से रूठ जाने का अभिनय करने जैसा है। विनोद कुमार शुक्ल कहते हैं, जो ख़ुद को दरबारी कवि-लेखक मानते हैं और यह मानते हैं पुरस्कार में दी गयी राशि सत्ता ने अपने घर से दी है, वह राशि लौटा सकते हैं।

फ़िर आगे के रचनात्मक प्रतिरोध के लिए कोई नक्शा क्या है? अगर उस दिन अशोक वाजपई एनडीटीवी पर नहीं बोलते, तब क्या कोई मीडिया घराना इस ख़बर की ‘सेलिंग पावर’ को देखता? शायद नहीं। और जैसी ख़बरे नामवर सिंह की तरफ़ से आ रही है कि ऐसा करना ‘साहित्य अकादमी’ को अस्थिर करना होगा, तो वह निराधार लगती हैं। वह ऐसा बोलकर ‘सेफ़्टी वॉल्व’ बनना चाहते हैं।

मैं अभी भी अपनी उस बात पर कायम हूँ कि यदि लेखक होना औरों से अधिक संवेदनशील हो जाने की वरीयता प्राप्त कर लेना है, जादा जिम्मेदार हो जाना है, तब तक मेरी असहमति रहेगी। यह लेखक नहीं कुछ और हो जाने की आज़ादी लेना है। साथ में आज यह भी जोड़ देने की ज़रूरत है कि इस आलोचना से यह बिलकुल भी अर्थ नहीं लेना चाहिए कि हम सहिष्णु, समरस, संवेदनशील समाज के निर्माण में लेखकों की भूमिका को कम करके देख रहे हैं। पर सवाल क्या सिर्फ़ इनाम और मिली रकम तक सिमट कर नहीं रह गए हैं।

उन्हें तो अभी और आगे जाना था। ख़ैर..

अक्तूबर 15, 2015

एक पति के नोट्स

पता नहीं अंदर ख़ुद से कितने झूठेवादे कर रखे हैं।

एक मेंहम शादी के बाद पहली बार अकेले घूमने निकलने वाले हैं। मैं सारी ज़रूरी चीजों में सबसे पहले कैमरे को संभालता हूँ। जिद करके उधार ही सही, नौ हज़ार का डिजिटल कैमरा ले आता हूँ। कहीं पहाड़ पर जाएँगे, तब अपनी साथ वाली तसवीरों वाली याद कैसे लाएँगे। अपने आने वाले दिनों में जब छोटे नन्हें-मुन्हे पूछेंगे, तब हम कहानी की तरह एक-एक बात बताते जाएंगे। दूसरे में, हम अपनी पहली सालगिरह में आगरा जा रहे हैं। मैंने किसी को बताया नहीं है। बस जैसे जैसे दिन पास आएगा, मैं कह दूँगा। तुमने ताजमहल नहीं देखा है। हम साल भर बाद भी कहीं जा नहीं सके हैं। इसलिए इस सरप्राइज़ को तुम्हें चुपके से दे दूँगा।

तीसरे में इस दिसंबर हमराकेश के यहाँ होते हुए पंचमढ़ी जाएँगे। हम डेढ़ साल में सिर्फ़कानपुर के अलावे कहीं नहीं गए हैं। तुम्हारी सहेली की शादी न होती तो वह भी मौका कब लगता, कह नहीं पाता।

मेरी दिक्कत है कह न पाना। इनसपनों को हक़ीक़त में बदलने के लिए कुछ भी करने की जद्दोजहद में फँस जाना। न मालुम किस चीज़ के टूट जाने के डर से डरता रहा हूँ। इधर एक और सपना वादे की तरह घूमता जा रहा है, के अगर वजीफ़े के पैसे मिलने लगेंगे तो कैसे भी करके पहाड़ों पर हफ़्ता भर के लिए चले जाएँगे। इस कैमरे से कुछ यादों को अलगनी पर टाँगने के लिए लेते आयेंगे। पर सच कहूँ, मुझे नहीं पता पैसे मिलेंगे भी या नहीं। हम कब जा पायेंगे। देखना है, आगे सबकैसा है। इसलिए चुप हूँ। 

{तस्वीर असली है। महेंद्र भल्ला ही हैं। ‘एक पति के नोट्स’ वाले । बाक़ी कुछ असली नहीं। एक -एक शब्द झूठ है, और कुछ नहीं। }

अक्तूबर 13, 2015

चुप कविता

मैं कभी कुछ नहीं बोलूँगा, बस चुप रहूँगा। आप जब कुछ कहेंगे, तब मैं कुछ नहीं कहूँगा। आप देखने को कहेंगे, मैं बिलकुल नहीं देखुंगा। आपकी सहजता को असहजता में नहीं बदलने दूँगा। आप सहज रहें इसलिए खुद ही असहज होता रहूँगा। कुछ बोलने से पहले कुछ नहीं बोलूँगा। आपके लिए अपना बोलना स्थगित कर कहीं किसी खाली कमरे में बैठा रहूँगा। आप ढूँढ़ना चाहेंगे, तब भी ढूँढ़ नहीं पाएँगे। मैं कहीं बाहर नहीं, मैं कहीं आपके अंदर ही बैठा रहूँगा। वह अँधेरा काला कमरा कुछ और नहीं आपका डर होगा। डर जो आपके दिलों की डरी दीवारों-सा चुप कोने में खड़ा होगा। आपको जिस दिन, जिस पल लगे, आप जैसे कहेंगे, मैं अपनी पेंसिल से लिखी सारी पंक्तियाँ मिटा दूँगा। आप बस एकबार कहकर देखिये। 

2.
पर क्या करूँ आपके कहने से पहले ही भूलने लगा हूँ। मेरे कागज पर लिखी मेरी कोई भी मिटाने लायक स्याही से नहीं बनी है। अभी देखा तो दिखी वह पंक्तियाँ ख़ून से बनी स्याही से बनी हैं। शायद यह ख़ून मैंने वहाँ से इकट्ठा किया था, जहाँ वह मारने वाले, उन्हें मरा मानकर लौट आए थे। मैं वहीं से गुज़रता हुआ एक छोटा-सा तिनका था। मैंने उसे स्याही समझ समेट लिया था। अपने अंदर इस कविता को उगता देख उसे पहले ही कह रहा हूँ। क्या पता आप कहने की प्रक्रिया को ही अवैध घोषित न कर दें। आपको साथ बताता चल रहा हूँ। बताना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि मैं डर गया हूँ। मुझे डर आपसे नहीं लगता। मुझे डर लगता है, अपने अंदर इस घटना के घटित होने के पल से।

3.
उस पल क्या पता मेरी किसी कही बात से आप डर जाएँ। डरकर कहीं छिप जाएँ। मैं आपकी हर बात मान रहा हूँ। क्या आप मेरी एक बात भी न मानेंगे। जाइए। वो सामने पेड़ के पीछे अपने गिरेबान में झाँक कर देखिये। कॉलर कितना गंदा हो गया है, आपका। चितकोबरे की तरह कितने छींटे पड़े हैं वहाँ। देखिये वहाँ छिपे हुए आपके औज़ार भी कितने कमजोर होते जा रहे हैं। जो मेरे बेहैसियत शब्दों में ताक़त भर रहे हैं। ख़ून से बड़ी तो कोई ताक़त नहीं जी। चलिये, हम दोनों अपना काम करते हैं। आप ख़ून करते रहिए। हम ख़ून लिखते रहेंगे।

अक्तूबर 11, 2015

हमारी अधूरी कहानी..

हज़रत निज़ामुद्दीन घंटा भर पहले पहुँचकर वह क्या-क्या कर सकता है, इसकी लिस्ट वह कई बार बनाकर मिटा चुका था। हर डूबती शाम, उसका दिल भी डूब जाता। जिस कमरे पर वह साल दो हज़ार दो से रह रहा था, उसे अपने ही गाँव के एक लड़के को दिलाकर एक ठिकाना बचाए रखने की ज़िद काम नहीं आई। हर रात किसी बहाने वह सौ रुपये मार ही लेता। इसने भी सोचा, चलो किराया ही सही। सोच लेगा दिल्ली और महँगी हो गयी।

वैसे भी यहाँ अब कुछ खास बचा भी नहीं है। नौकरी वहीं सेंटर स्कूल में कर ली है। अब शादी की बात सोचते ही माँ-बाउजी अचानक बूढ़े हो चले हैं। पीएचडी का सपना था। कर नहीं पाया। बस अपने सपने को पीएचडी करता देखता रहा। जब तक वह यहाँ पढ़ रही है, तब तक बार-बार खिंचा चला आता। इसबार उसे कहने आया है। बात फ़ाइनल हो जाये, तभी यहाँ से लौटेगा, चाहे जितने सौ रुपये लग जाएँ।

उसने बात करने के लिए कहीं किसी पुरानी सहेली से नंबर लिया। सोचा रात में खाली रहेगी, पर थकी होगी। सुबह इस बात के लिए ठीक वक़्त नहीं। दोपहर कॉलेज में होगी। फ़िर बात करे तो कब करे? यही सोच-सोच कर उसने दिमाग खराब कर लिया। पर बात तो करनी है। उसके बिना काम नहीं चलेगा। ऐसे सोचते-सोचते उसने नंबर फोन में सेव कर लिया। तब उसे पता चला। वाट्स एप पर उस नंबर से उसी सुबह उसके लिए एक मैसेज था। मैसेज एक प्रोफ़ाइल फ़ोटो थी। उसने बिन कुछ बोले बता दिया। उसकी शादी हो गयी है।

{अगले पन्नों पर, हमारी अधूरी कहानी..}

अक्तूबर 09, 2015

उन बातों पर दोबारा गौर करते हुए

पता नहीं कभी-कभी क्या होता है, हम चाहकर भी नहीं समझ पाते। शायद तभी उन बीत गए दिनों में लौट कर उन्हें दुरुस्त करने की ज़िद से भर जाते होंगे। अगर ऐसा न होता तब मुझे भी हलफ़नामे की तरह दोबारा उन बातों पर गौर करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सोचता हूँ, अगर मेरे मन में वह ख़याल दोबारा न आए होते, तब उन सवालों का क्या होता। मेरा अवचेतन कब तक उनसे बचता रहता। इसे छिपना भी कह सकते हैं। अगर कोई फ़ेहरिस्त होती तो उनमें सबसे ज़रूरी सवाल होता, क्यों ज़रूरी था उन बातों का कहा जाना। उससे भी गंभीरता से सोचने वाली बात होती, उस रात में ऐसा क्या था कि वही सब लिखा गया। कुछ और नहीं।

हम सबकी ज़िन्दगी में ऐसे दौर आते हैं, जब हम सब कुछ दिन के लिए मर जाना चाहते हैं। फ़िर जब वह दौर ख़त्म हो जाता होगा, तो लौट आने के ख़याल से भर जाते होंगे। इधर भी कुछ ऐसे ही हो रहा होगा शायद। शायद इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद कोई मुझे चाहकर भी कोई मनोचिकित्सक के पास जाने की सलाह न दे पाये। पर क्या करूँ। इन बीतते वक़्त में लगातार ऐसा होता गया हूँ। मुझे यह स्वीकार करने में किसी भी तरह की कोई शर्म या अवसाद नहीं महसूस हो रहा। ऐसा लिखते हुए और ऐसा सोचते हुए भी सपनों के साथ हूँ। भले पन्नों पर कितना भी पीछे चला जाऊँ, कुछ बातें सिर्फ़ कहने के लिए कहते हैं। यह ईमानदारी का लबादा ख़ुद को बचा ले जाने के लिए ओढ़ना पड़ता है। लेकिन वह झूठ नहीं है तो सच भी नहीं है। एक बारीक से परदे के पीछे सब साफ़-साफ़ है। उस अधूरेपन में, उसके लिए जो हम सबमें एक अजीब तरह की कशिश है। वह हमें हमारे आज से कहीं दूर उस जगह ले जाती है, जहाँ वह अधूरा है।

हमें लगने लगता है, जहाँ हम हैं वहाँ चीज़ें वैसी नहीं हैं जैसी वह हमारे मन में थीं। हमें लगता है, हम एक बार फ़िर वहीं पहुँच जायें, जहाँ हम सब चीजों को वैसे का वैसा छोड़ आए हैं। पर यह हमारी सबसे बड़ी भूल है। वह हू बहू कहीं नहीं रहता, सिवाय हमारे मन के। हमारा मन खुद को बचाए रखने के लिए यह दुनिया रचता है। हमें लगता है, एक जगह है जो अभी भी हमारे काबू में है। लेकिन उस छोड़ने से लेकर आज तक कुछ भी वैसा बचा नहीं रहता। उस तिलिस्म में हम खो जाते हैं। यही हम चाहते भी हैं। यह अपने दिमाग को कुछ देर के लिए स्थगित कर देना है। मैं भी ऐसे ही इस दुनिया से कुछ इस तरह से गायब हो जाना चाहता हूँ, कि जब लौटूँ तो कम से कम एक दफ़्तर ऐसा हो जो मेरा इंतज़ार कर रहा हो। जहाँ सबकुछ मेरे आने के बाद ही चलना शुरू करे। सच मुझे लगता है, यह ख़राब दिन भी चले जाएँगे।

{ उस रात तिलिस्म से निकला पन्ना }

अक्तूबर 07, 2015

अनमने से ख़याल..

कभी-कभी सोचता हूँ, हम भाग कर शादी कर लेते तो क्या होता? मेरे पास आज तक नौकरी नहीं है। इन दोनों बातों में प्रश्न-उत्तर वाला संबंध नहीं है, फ़िर भी दोनों एक-दूसरे का जवाब हैं। यह दोनों बातें आपस में ऐसे गुथी हुई हैं, जैसे तुम्हारी कल शाम वाली बँधी चोटियाँ। उनमें गुथे हुए फूलों की ख़ुशबू में खो जाने की हैसियत जुटाते-जुटाते मेरे गुम होते जाने की कहानी शुरू होती। आज तक एक भी ढेला न कमाने वाला लड़का प्यार करता और उस प्यार में इतना आगे बढ़ जाता के उस लड़की से शादी की बात करते हुए रूमानी होते हुए डूब जाता। तुम हाथ पकड़ कर उस दरिया से निकाल भी लाती और अपनी बाहों में भरते हुए तालकटोरा गार्डन की झड़ियों में हम दोनों कहीं गुम हो जाते। इस तरह हम दोनों की तरह हमारे सपने आपस में गुथ जाते।

पर सच तो यह है कि हमारे यहाँ नौकरी एक सीमा तक पढ़ाई करने के बाद भी नहीं मिलती। लड़के मेरी तरह धक्के खाते रहते हैं। और लड़कियाँ उन उदास खिड़कियों के पल्लों से झूलती हुई किसी और कमरे में परिवार द्वारा नियुक्त किए गए पतियों की सेवा में दिन-रात जुट जाती हैं। वह कभी नहीं बतातीं। कभी कोई उनका भी सपनों का राजकुमार था, जो उनके सारे सपनों को चुरा ले गया। उन्होंने ऐसा कभी न करने की सीख हिन्दी फ़िल्में और मोहल्लों की मौसियों और चाचियों के मुँह से सुनी कहानियाँ सिखा देतीं।

फ़िर मैंने भी तो कोई वादा कभी नहीं किया। न तुमसे। न ख़ुद से। शायद मुझमें हिम्मत नहीं थी या मैं शुरू से ही डरता था। कहीं तुम मान जाती तब? शुरू से ही मैं एक डरा हुआ लड़का बना रहा। खोया खोया-सा। कभी-कभी तो लगता जैसे मैंने इस खोयेपन को ओढ़ लिया था। क्योंकि मुझे कहीं तुम्हारी आँखों में इस खो जाने को लेकर एक अजीब-सी कशिश दिखी। पर असल बात यह नहीं थी। पता नहीं तुममें पता नहीं क्या था, जिसे लेकर में खिंचा चला जाता। हर बार जब भी देखता, तुम मुझे फ़ारुख शेख़ वाली दीप्ति नवल दिखने लगती।

शायद यहबात बहुत देर से तुम्हें पता चली। या पता नहीं, आज तक पता ही न हो तुम्हें। तुम्हें लेकर आज तक वापस लौट लौट आता हूँ। पता नहीं ऐसा क्या है जो वापस मुझे वहीं ले जाता हैं। शायद कोई अधूरी बात अभी भी कहीं किसी कोने में रह गयी होगी। या हो सकता हैं, उस अधूरेपन में ही वह ताकत हो जो लौट-लौट मुझमें तुम्हारी शक्ल के पास वापस लाता रहा है। तुम वह आखिरी चेहरा बनी रही, जिसे चाहकर भी कुछ नहीं कहा। कहा भी तब, जब हम एक पल बाद कभी न मिलने के लिए लौट जाने वाले थे। वह बहुत कमज़ोर-सी कोशिश थी। जिसमें मुझे पता था,  कोई भी नहीं रुकता। न मैं न तुम। और देखो सचमुच मेरा अंदाज़ कितना सही था। एक बार हुआ भी कि वापस लौट जाने के कुछ रास्ते छोड़ जाऊँ। पर नहीं। किसी पत्थर पर कोई निशान नहीं छोड़ा, जिसे पहचानकर हम कभी कहीं मिल पाते।

इतनी बातें कहते हुए भी नहीं लगता कि मैंने कुछ भी कहा है। जैसेतुम्हें नहीं कहा। यहाँ तक आते-आते मेरी आँखें दर्द करने लगी हैं। सिर भारी हो रहा है। लगने लगा है मेरी तरह मेरी बातें भी उतनी ही झूठी हैं। जैसे आगे इस आख़िरी झूठी बात को कह कर ख़ुद को जुगुप्सा से भर लूँगा कि मेरे अंदर उन दिनों यह ख़याल न जाने कितनी ही बार दिल में, दिमाग में, मेरी सैकड़ों नसों में ख़ून की तरह दौड़ने लगा था कि एक आख़िरी बार तुमसे पूछकर इस किस्से को हमेशा के वहीं दफ़न कर देते हैं। क्या पता शायद जब तुमने अपनी शादी के लिए हाँ कहा होगा, तब तुम भी मेरी तरह इन ख़यालों से भर गयी होगी। कहीं-न-कहीं मुझे कई सालों तक लगता रहा तुम बिलकुल मेरी तरह सोचती होगी। फ़िर हम दोनों अगर हमक़दम बनते तो कैसा रहता। क्या हम सपनों के बाहर भी साथ रह पाते। तुम ख़ुद पूछो। मुझे नहीं पता।

पर अब इन बातों का किसी सायको एनालिस्ट के अलावे किसी के लिए कोई मतलब नहीं। हम बिन नौकरी वाले डरे हुए लड़के करते तो अधूरे प्यार हैं पर उन्हे कितने सालों तक हम अपने दिलों में जिंदा रखेंगे, यह नहीं जानते। हो सकता है, आज भी तुम्हें इन बातों में शिद्दत से किया हुआ बेतरतीब प्यार जैसा कुछ दिख जाये। वह शायद हम सबमें ऐसे ही थोड़ा-सा बचा रह जाता होगा। सच में इतने सालों बाद वह तुम्हारे दिल के कोने में छिप भले जाये पर अपने अंदर झाँककर देखना, तुम्हें भी मैं ज़रूर नज़र आऊँगा। वहीं चुप-सा।खोया खोया-सा

अक्तूबर 02, 2015

‘डिजिटल इंडिया ’ का विखंडन

डिजिटल इंडिया ऐसी तकनीक साबित होगी, जिससे अब अंतरजातीय विवाह सुगमता से होने लगेंगे, जातिवाद देश से उखड़ जाएगा। फ़ेसबुक मेट्रीमोनियल साइट में तब्दील होने जा रहा है। कोई मुजफ्फरनगर, बथानी टोला अब नहीं होगा। कोई किसी के लिए हिंसक शब्दावली का इस्तेमाल नहीं करेगा। अब यहाँ सौहार्द, शांति, परस्पर विश्वास का संचार होगा। डेंगू से यहीं विजय प्राप्त कर ली जाएगी, गलियों नालों की सफाई की नौबत नहीं आएगी। एमसीडी वाले वैसे ही साल भर खोखीयाए रहते हैं।

गोरखपुर के दिमागी बुखार में अब सिलिकन घाटी से बैठे-बैठे स्वस्थ लाभ हो जाया करेगा, सब वहीं से नियंत्रित होगा। नौकरियाँ तुरंत लग जाया करेंगी। अधिग्रहित जमीन के बदले किसानों और आदिवासियों को यहाँफ़ार्मविले ’ की जमीने दी जाएँगी। फ़िर बरसात, उर्वरक, क़र्ज़े, आत्महत्या सबको एक बार ही ठिकाने लगा दिया जाएगा। देश के ऐसे संभावित भविष्य को देख कर मेरी आँखें चुंधिया रही हैं। अब और नहीं देखा जाता। आपको बदलाव नहीं दिख रहा, परिवर्तन शुरू हो चुका है; उन तीन रंगों के बीच अशोक चक्र नहीं अब लोग ख़ुद आ गए हैं।

अट्ठाईस सितंबर, सुबह सात बजे, बाथरूम जाने से पहले· नयी दिल्ली।

दोपहर
यह जो लोग एफ़बी पर अपने प्रोफ़ाइल की तस्वीर को रंगीन किए जा रहे हैं, उन्हे पता भी है, यह 'डिजिटल इंडिया' किस चिड़िया का नाम है। हम 'मेक इन इंडिया' की बात करते हुए विदेसी कंपनियों की आउटसोर्सिंग पर निर्भर हो गए। हमारे परधान सेवक सिलिकन वैली में जूतियाँ घिस रहे हैं। अपरोक्ष रूप से भारत सरकार ऐसा ढाँचा खड़ा करने में अपनी अक्षमता प्रकट कर रही है। इसे किस तरह लेना चाहिए पता नहीं।

इसे नेट न्यूट्रेलिटी से कैसे जोड़ेंगे, इस पर थोड़ी देर बाद।

शाम
एक 'डिजिटल इंडिया' की शुरवात समाजवादी सरकार उत्तम प्रदेश में लैपटॉप बाँटकर  पहले कर चुकी है। जहाँ सड़कें नहीं हैं, शौचालय नहीं हैं, बिजली नहीं है, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्था से सब पीड़ित हैं, उन ग्रामीण अंचलों में इंटरनेट पहुँच जाने से क्या बदल जाएगा, पता नहीं। जो काम ठीकठाक तरीके से रेडियो जैसा सस्ता सुलभ माध्यम नहीं कर सका, वहाँ इस सुविधा के आ जाने से दुनिया एकदम पलट जाएगी।

इस परिवर्तनकामी योजना से उन लोगों को पता चल जाएगा कब बैंक वाले घर और खेत कुर्की करने आने वाले हैं। उन्हे यह भी पता चल जाएगा कि इस बार भी मौनसून ठीक नहीं रहने वाला, इसलिए शहर पलायन कर जाना ही ख़ुद को जिंदा रख पाने का एक मात्र विकल्प बचाता है। इस तरह की असीम संभावनाओं को और टटोला जा सकता है। आप चाहें तो नीचे बिन्दुवार इसमें कई छूट गयी संभावनाओं को सूचीबद्ध कर सकते हैं।

गाँधी जयन्ती की डिजिटल सुबह
अभी हफ़्ता भर नहीं हुआ परधान सेवक की जूतियाँ घिसे। कैलिफ़ॉर्निया से लौटे हैं। उसी गूगल ने कल एनी बेसेंट का डूडल बनाया, लेकिन आज वहाँ से गाँधी गायब हैं। वह संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस भी भूल गया।

वही गूगल डूडल आज इटली में 'ग्रैंड पैरेंट्स डे ' मना रहा है। जो लोग समझ रहे हैं सुंदर पिचई की शक्ल में एक भारतीय है और वह 'डिजिटल इंडिया' की क्रांति का अगुआ बनने जा रहा है, तब उन्हे एक पल सोचना चाहिए।

आवाज़ें..

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