नवंबर 28, 2015

चुप घर

इन दीवारों के बीच रहते-रहते वह इतना बड़ा हो गया कि घर में होता तो कभी बाहर निकलने के एहसास से नहीं भर पाता। वह चुप रहकर इन दीवारों को सुनने की कोशिश करता। तब उसे एक धुन सुनाई देती। धीमे-धीमे। आहिस्ता-आहिस्ता। जिधर से वह आवाज़ आती, वह उस तरफ़ अपनी थाली घुमा लेता। प्यास लगती पर पानी का गिलास नहीं उठाता। ऐसा करते हुए, वह अपने अंदर लौटने लगता। उसे लगता, जैसे उस मुलायम रेत की ठंडक, उसके रोवों में बिजली की तरह उतरने लगी हो। एक अजीब-सी नमी उसकी साँसों में होती। इस ख़याल में वह अपनी पत्नी के स्पर्श को पाता। वह समझ नहीं पाता, इन सालों में उसकी माता के हाथों की छुअन कहाँ गुम हो गयी? वह ख़ुद कहाँ गुम हो गया।

इस ख़याल के मन में आने के एक पल के भीतर उसकी पलकें वहीं थम जाती। वह पलकें उठाकर दोबारा देखने की कोशिश करता। कोशिश हमेशा हारने वाले करते थे। वह भी हमेशा से हारता आया था। इसलिए कोशिश करते हुए वह थक जाता। उसकी आँखें सोचती, यह तस्वीर हमारी ज़िंदगी का धागा है। एक अनसुनी कविता जैसे। हमसब इस बड़ी-सी दुनिया में खोये हुए, इसके भीतर रहकर, असाध्य वीणा की तरह इसे समझने में लगे हुए हैं।

आपके लिए यकीन करना मुश्किल होगा। सबके लिए होता है। उसने अपने मन में यह सोचा और नीचे रखे कागज़ पर लिखने लगा। वह डायरी में हमेशा ऐसी बातें लिख लिया करता। वह इधर सब भूलने लगा था। पर आज इतना सोचकर वह लिखने लगा, तब उसकी आँखें धुँधली होकर सोचने लगी। इस सामने टंगी घड़ी को देख फ़िर देखने लगता है। वक़्त वही हो रहा है, जो उन्होंने बताया था। वह बस अभी आने वाले होंगे। तब क्या होगा।

हुआ बस इतना, जब पार साल जब अम्मा ने उसकी लिखने वाली किताब कबाड़ी को बेच दी, तब उसका बड़ा लड़का एक कागज कर लिखा हुआ एक पुर्ज़ा ले आया था। उस पर कुछ ख़ास नहीं लिखा था। बस उसे भेजने वाला चाहता था, वह अब लिखना बंद कर दे। उसे ऐसी बातें कतई नहीं लिखनी चाहिए। वरना सब जान जाएँगे, हमारे यहाँ आज भी ऐसे घर हैं, जो कहीं ज़िन्दगी की किताबों में दर्ज़ हो रहे हैं। जहाँ लोग सिर्फ़ जीते नहीं, उसे ख़ून की तरह अपने अंदर महसूस करते हैं। यहाँ लोग, लोग नहीं, जोंक होते हैं। पर उसे पता है वह जोंक नहीं, इस घर की दीमक है।

बस इसका फैसला होना अभी बाकी है, वह घर को दीमक की तरह खा रहा है या घर उसे।  

नवंबर 24, 2015

मन, मौसम, पेड़, बेखयाली और चिट्ठी..

कहीं कोई होगा, जो इस मौसम की ठंडक को अपने अंदर उतरने दे रहा होगा। कोई न चाहते हुए भी ऐसा करने को मजबूर होते हुए खुद को कोस रहा होगा। दुनिया में इन दो तरह के लोगों के अलावे भी कई और शैदाई होंगे, जो उन सड़कों, गलियों, अनदिखे मोड़ों पर रुककर, किसी अनजाने एहसास का इंतज़ार कर रहे होंगे। मेरे लिए यह खुद को कमरे के अंदर बंद कर लेने वाली शामें हैं। अँधेरा होते ही सब दिख रही चीज़ें जब छिपने लगती हैं। मैं भी उस ढलते सूरज के साथ यहाँ आकर चुपके से बैठ जाता हूँ। वह मेरे पीछे न जाने कहाँ-कहाँ घूमकर कल फ़िर आ जाएगा। इस तरह वह मेरे साथ खेलता है। मन में सोचता हूँ, हम किसी को नहीं बताते, हमें कैसा लग रहा है। पर कोई-कोई होता है, जो सब जान रहा होता है। तुम्हारे बाद यह मेरा मन है, जो सब जान जाता है। तुमसे कहने का ख़ूब मन किया करता है, पर ख़ुद से बात करने का जी नहीं होता। मन होता है, बस तुम्हें देखता जाऊँ, अपने अंदर। इस सबके दौरान, पता नहीं कुछ है, जो छूट रहा है लगता। दिन का रात में ढलना और वहाँ तुम्हारा न होना जैसे। जैसे कितने मन से उस किताब को सिराहने रखकर भूल जाना। प्यास का लगना और गिलास पास न होना।

हम कभी-कभी कितने तरह से किसी को अपनी बात कह देने के बाद भी खाली नहीं होते। कभी कुछ न कह कर भी खाली हो जाते हैं। वह पेड़ जो सामने वाले बागीचे में हमारे बचपन से खड़ा है, अब कुछ नहीं कहता। चुपचाप खड़े-खड़े उसने कितना वक़्त गुज़ार दिया। कभी कहीं नहीं गया। इन ठंडियों में भी वह कोहरे में छिप जाएगा। तब हमें लगेगा, वह कहीं चला गया। पर नहीं। वह वहीं खड़ा, हमें सुन रहा होगा। सब कह रहे हैं, यह जगह रहने लायक नहीं रही। हवा भी हवा की तरह न होकर कुछ और बनती जा रही है। कोई तुमसे क्यों नहीं पूछता। तुम तो सबसे बेहतर तरीके से उन्हें समझा सकते हो न। समझा सकते हो न? तुम्हें लगे न लगे, पर मैं तुम पर ऐसे ही विश्वास करता रहूँगा। ऐसा करते हुए, तुम मेरे अंदर उग आए पेड़ बन जाओगे। पेड़ उगने के लिए ज़रूरी है, मिट्टी बन जाना। मैं धीरे-धीरे मिट्टी बन रहा हूँ। हम सब धीरे-धीरे ऐसे होते जाएँगे। कोई पहले, कोई बाद में। मेरे अंदर भी यह जड़ें जम रही हैं। मैं भी एक जीवन को अपने अंदर पलते हुए देखना चाहता हूँ। जिसे मैं अपना कह सकूँ। कहने में एक सुनना भी है। मैं यही सुनना चाहता हूँ।

इन बेतरतीब बातों के बीच जो एक लकीर मेरे दिल की आकृति को बना रही है, उसकी धमनियों में गुज़रता हुई रक्ताभ किरण से ख़ुद को बुनते हुए एक पश्मीने की शाल बनाऊँगा। अम्मा को इस ठंड में उनके चारों तरफ़ इससे घेर दूंगा। उनके इन सालों में कठोर हो गए हाथों में इन मुलायम धागों का स्पर्श, उन्हें कश्मीर से आती जनवरी की ठंड में छिपा ले जाएगा। तुम्हारे लिए तनचोई के रेशम से बने कागज़ पर तुम्हें ख़त लिखुंगा। लिखुंगा वह सारी बातें, जो तुमसे तुम्हारे कान के पास आकर कहूँगा। तुम्हारे साथ वहीं बैठ जाऊंगा। घास पर गिरती सीत, अपनी बाहों पर गिरते देख हम भी अपने अंदर लौट आयेंगे। चप्पल में लग गयी घास की ख़ुशबू में हमारी देह की गंध, परछाईं बनकर, वहीं रह जाएगी। फ़िर, जब कोई अनदेखा वहाँ लौटेगे, तब हमारे कदमों को पढ़कर, उस चिट्ठी को समझ जाएगा। चिट्ठी, जिसमें कहीं कोई शब्द नहीं था। कुछ गंध थी, कुछ घास के सूखे तिनके थे, कुछ हमारी पसीने की बूंदें थीं। वह सूख भी जाएँगी, तब भी हम दिखते रहेंगे। वहीं उसी पेड़ के नीचे, पश्मीने की शाल में लिपटे। अम्मा के साथ। हम सब, सपने में आज रात लखनऊ मेल पकड़कर गाँव जा रहे हैं। पापा ऑटो रुकवा रहे हैं। भाई, बहन के साथ वहीं आती जाती गाड़ियों के धुएँ को देखते हुए, तुमसे बात कर रहे हैं पेड़।

नवंबर 22, 2015

ये दाग़-दाग़ अँधेरा, ये शब-गज़ीदा शहर

हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहाँ हम ख़ुद नहीं जानते कि यह दौर हमारे साथ क्या कर रहा है। यह पंक्ति, अपने पाठक से बहुत संवेदना और सहनशीलता की माँग करती है कि वह आगे आने वाली बातों को भी उतनी गंभीरता से अपने अंदर सहेजता जाये। जब हम, किसी दिन अपनी ज़िन्दगी, इसी शहर में बिता डालने की सोचने लगते हैं, तब अपने साथ किस तरह की सहानुभूति चाहते हैं? हम दरअसल वह मौकापरस्त हैं, जो शहर में टिके रहने के बहाने बनाने लगा है। हम जिन जगहों को छोड़कर यहाँ आए हैं, उनके बारे में कभी सोचते हैं तो दिल भर आता है, आँखें ढलते सूरज की तरह डूब जाती हैं। ऐसा करके हम थोड़े रूआँसा हो आते हैं, थोड़ा रो लेते हैं। पर थोड़ी देर का ख़ुमार, थोड़ी देर में उतर जाता है।

उपरोक्त क्रिया करके हम यह समझते हैं, उस छोड़ आई जगह से अभी तक कितने प्यार से भरे हुए हैं और आगे भी भरे रह सकते हैं। लेकिन, असल में यह प्यार हमारी कमज़ोरियों को छिपा लेजाने का बहाना है। हम कभी उन जगहों पर वापस लौटकर, उन्हें रहने लायक बनाने की हिम्मत से भर नहीं पाये। इस तंत्र ने हमें हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी का एहसास दिलाया है, हम कितने कमज़ोर हैं। हम कुछ भी करने लायक नहीं बचे हैं। पर क्या इतनी भी हिम्मत नहीं बची कि हम उस जगह को कोई नाम दे सकें। आपके हिस्से में पड़ने वाला नाम कुछ और हो सकता है, हमारे हिस्से यह हमारे बाबा-दादी का गाँव है। गाँव, जहाँ से कभी हमारे पिता पढ़ने के लिए निकले थे और आज, वह हमारे लिए शहर में रह रहे हैं। हम भी इस दुनिया के कमज़ोर लोगों की तरह कमज़ोर हैं, पर थोड़ा सोचने समझने लगे हैं। यही सोचना समझना सबसे बड़ी दिक्कत बनकर उभरने लगा है।

जब हम देखते हैं, अपनी जमीन को बचाने, उसे आपे मन मुताबिक इस्तेमाल करने की इच्छा से भरे रहने का यहाँ कोई मूल्य नहीं है। चूंकि आप अपनी जमीन को आततायी सत्ता से बचाने के लिए आंदोलन करते हैं, तब विकास विरोधी बताकर हाशिये पर डालने की साजिशें की जाती हैं। हर किसी को विकास का इकहरा अर्थ समझाया जाता है। जहाँ बड़ी-बड़ी अमानवीय मशीनों से गुज़रे बिना विकास संभव ही नहीं है, तब यह प्रक्रिया समाप्त होने पर कितनी अमानवीय व्यवस्था को जन्म देगी, इसका अंदाज़ा कोई नहीं लगाना चाहता। सत्ता संचालकों के चेहरे बदल जाते हैं, पर उनकी नीतियाँ वही रहती हैं। वह इस देश के लिए जिसे विकास कहकर थाली में सजा रहे हैं, उसमें सबसे अधिक नुकसान यहाँ के लोगों का हुआ है। हम अपने लोगों के लिए नहीं, उन बड़े बड़े प्रतिष्ठानों के लिए अपने संसाधन, पूँजी, प्रकृति, हवा, पर्यावरण, पर्यावास सब कुछ दांव पर लगाने के लिए तय्यार हैं।

जबतक हमारी यह मनोवृत्ति नहीं बदलेगी, हम अपनी जमीन के लिए संघर्ष करने वालों को नक्सली कहकर मारते रहेंगे। तब-तब कोई मेधा पाटकर, अरुंधति रॉय उनकी आवाज़ को दुनिया के सामने चीख़-चीख़ कर कहती रहेंगी, पर हमारी आँखों के सामने अँधेरा छाया रहेगा और कानों पर जूं का रेंगना स्थगित रहेगा। हमें वह सपने देखने होंगे, जो आज तक हमने नहीं देखे हैं। उनमें ख़ुद को महसूस करते जाने की हद तक डूबते जाना है। हमें हिम्मत से भरना होगा। पर अगर आप इन उबाऊ, निरर्थक बातों से आए दिन परेशान रहने लगे हैं और यह सब आपको बेकार के  प्रोपेगंडा लगते हैं, तब आपको जितना जल्दी हो सके कनु बहल की भारत में हाल ही में प्रदर्शित फ़िल्म, 'तितली' देखनी चाहिए। वह आपको आपकी भाषा में बताएगी, इन विकास, प्रगति, शहर जैसे बड़े-बड़े शब्दों ने हमारे साथ क्या किया है। यह शहर असल में हमें अपना उपनिवेश बनाते हैं, और कुछ नहीं। 

{शीर्षक, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म 'ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर ' से माफ़ी के साथ, यह पिछली किश्त: शहर की आदत में हमारी जगह और उससे पहले की कड़ी: शहर के शहर बने रहने की पुरुष व्याख्या  पर इधर आखिरी हिस्सा..}

नवंबर 21, 2015

शहर की आदत में हमारी जगह

उसमें बहुत सारी चीज़ें या तो अपने आप गुम हो गई हैं या गुम कर दी गयी हैं। चीजों का न दिखना अकसर हमें ऐसा ही करता जाता है। लगता है, ऐसा बहुत कुछ था जो दिख नहीं रहा, उसे कौन कहेगा। मैंने ऐसा जान बूझकर नहीं किया। कभी हो जाता हो, तो पता नहीं। इसने कहीं से भी शहर को ढक नहीं लिया है। शहर  इससे भी जादा कहीं बाहर छूट गया होगा। हमसे भी तो कभी-कभी एक बार में सबकुछ कहा भी तो नहीं जाता। कहने का सहूर आए या न आए, इसकी तमीज़ आते-आते आती है। हम कितना कुछ रोज़ देखते रहते हैं। कभी कुछ नहीं कहते। बस उसका गुजरते रहना आदत बनकर रह जाता है।

वह इतनी सारी लड़कियाँ जो यहाँ पीजी में अकेले रह रही हैं। वह कंपनियों की अनुबंधित गाड़ियों से गली के एक ख़ास मोड़ पर उतरकर, उन खिड़कियों से अंदर झाँकते हुए सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त, अपने पापा को याद करती सारी थकान भूल जाती हैं। और चट से अम्मा को फ़ोन करके पापा की दवाई की यादी दिलाती हुई ताला खोलने लगती हैं। वह सब लड़के जो किसी सपने की गिरफ़्त में उनकी तरह यहाँ अपने परिवारों से दूर चार बाई आठ के कमरे में क्रिसश्चन कॉलोनी में पड़े रहते हैं। खाना बनाते हुए चाची के हाथ की घुइए की सब्ज़ी याद करते हुए, उनके बनाए कटहल के अचार को खाते-खाते कहीं किसी और ही दुनिया में चले जाते हैं। जहाँ सब है। वह सीढ़ियों पर ख़ास अंदाज़ से चलने वाली आवाज़ वाली लड़की भी।

यह विस्थापन  इस शहर की निर्मिति में इस कदर जुड़ गया है कि किसी भी चीज़ के इसके बाहर होने की संभावना कम ही लगती है। हम सब कभी-न-कभी, किसी-न-किसी वक़्त अपनी असल कही जा रही जगह पर कहीं और से चलकर ही पहुँचे होंगे। ‘कहना’ चूँकि ‘मान लेना’ है और यह ‘मान लेना’ हमारे सामने ‘घटित’ नहीं होता इसलिए हम बचपन से रह रही जगह को स्थायी मानकर आसान-सी ज़िंदगी जी रहे होते हैं। जबकि ऐसा है नहीं। हम लगातार जगहों को अपने लिए बुन रहे होते हैं। इस क्रम में या तो जगहों को अपने मुताबिक ढाल रहे होते हैं या उनकी तरह ढल रहे होते हैं। या जितनी सरल प्रक्रिया दिखती है, उससे जटिल इसे एकबार में समझ लेना है। कोई यह भी कह सकता है, हम इतिहास की एक तारीख़ को पहले जगह को ढाल रहे थे, और अब यह ढाल पाना हमारे बस में नहीं रहा, इसलिए ढल रहे हैं। एक आग है, जो काँच को चूड़ियों में बदल रही है।

ऐसा करते हुए इस प्रक्रिया की समाजशास्त्रीय व्याख्या में जो-जो सत्ता के केंद्र बनकर उभरे होंगे, हम उनकी भूमिकाओं को हम सिरे से नज़रअंदाज़ करते चल रहे हैं। क्या हमसब वक़्त के किसी दौर में जब यह सभ्यता या समाज अपने निर्माण के प्रारम्भिक दौर में रहा होगा, तब क्या ऐसा हो सकता है कि हम सब स्वयं में इतने शक्तिशाली रहे होंगे कि उन निर्मितियों में हमारे द्वारा सुझाए गए कार्यों, ढांचों, सिद्धांतों, प्रारूपों, विधियों को इस समाज की गतिकी में स्थान मिल पाया होगा? इसे समझने की ज़रूरत है और हमें इसके लिए गिलोय का काढ़ा नहीं पीना है और न ही कपालभांती प्राणायाम करने का अभ्यास करना होगा। इसके लिए आप अपने आसपास देखिये। इस समाज को समझने की कोशिश कीजिये। बहुत आसान है समझना।

वह रिक्शे वाला  जो हमें चूनामंडी पहाड़गंज की गलियों से होता हुआ, अपनी पैरगाड़ी पर बिठाकर, पिंडलियों की नसों के खिंच जाने की हद से वापस लौटते हुए आधा किलोमीटर दूर, रामकृष्ण आश्रम मार्ग लाया है। क्या हमने उसे उतने ही रुपये(?) देना बड़ी आसानी से मान लिया था, जितना उसने हमसे पहली मर्तबा माँगा था? हम ऐसा कभी किसी रिक्शे वाले को अपने साथ करने नहीं देते हैं। लेकिन अभी रिक्शे से उतरकर, जब कुछ कदम चलकर हम मेट्रो स्टेशन में दाख़िल होंगे, तब क्या होगा? यहाँ दो तरह से किराया लिया जाएगा। एक, यहाँ लाइन में लगकर टोकन लेना पड़ता है या दूसरा, स्मार्ट कार्ड से एएफ़सी गेट पर अपने आप निर्धारित राशि कट जाती है। क्या कभी हमने सोचा है, एक जगह हम अपनी मनमर्ज़ी चलाने, धौंस जमाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते। वही दूसरी तरफ़ बड़े-बड़े फ़न्ने खाँ स्टेशन में दाखिल होते ही किसी भी प्रकार की बहस या मोल भाव करने के खयाल से नहीं भर जाते। यह विरोधाभासी परिवर्तन इतनी सहजता हमारे अंदर घटित हो जाता है। हमें पता भी चलता होगा, तो हम छिपा ले जाते हैं।

कभी सोच कर देखिएगा? ऐसा क्यों हुआ? हमारे इतिहास में ऐसी कौन-सी घटना घटी होगी, जिसके परिणामस्वरूप, हम एक स्थान विशेष की परिधि में आते ही अपने अंदर यह गुणात्मक परिवर्तन देखने लग जाते हैं। यहविस्थापन है। जिस अर्थ में आप देख रहे हैं, वैसा तो यह बिलकुल नहीं है। ऐसा कहकर इस पूरी व्याख्या को संकुचित नहीं करना चाहता, पर यहाँ खत्म करते हुए इतना ज़रूर कहूँगा कि यह विस्थापन कहीं इतिहास में घटित हुआ है, जिसे हम आज भौतिक रूप में अपने चारो तरफ़ घिरा पाते हैं। यह अँग्रेजी का ‘माइग्रेशन’ नहीं, ‘डिसपोज़ीशन’ है। यह मनुष्य के इतिहास में ऐसा अध्याय है, जिसमें हम सब कहीं बाहर खदेड़ दिये गए हैं। यह मानवीय संवेदनाओं का सामाजिक रूप से स्खलन दर्शाता है। हमने अपने ऊपर एक ऐसा तंत्र हावी होने दिया है, जिसमें हमें मनुष्यों से जादा उसके द्वारा बनाई गयी संस्थाओं पर विश्वास है। इसे हम सिर्फ़ मनुष्यों की जगह संस्थाओं के आ जाने की बात कहकर समझ जाएँगे, नहीं। यही वह क्षण था, जब हमने ख़ुद को इतिहास में अपनी निर्धारित जगह से ख़ुद को धकेल दिया। जो जगह मनुष्यों द्वारा भरी जानी थी, वहाँ भी उसने ख़ुद को उसकी ओट में रख लेना ठीक समझा। ऐसा करके हमने एक पदानुक्रम स्थापित कर लिया है।

{इस पूरे विश्लेषण को हम सिर्फ़ पिछली पोस्ट के साथ जोड़कर ही नहीं, बल्कि अपने सामाजिक ढाँचे, उसके अंदर के हर एक रेशे को समझने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। अब दिमाग है, तो उसका इतना चलना तो बनता है। अगर नहीं चला सकते तो, वह किसी काम का नहीं। }

तितली: मिथक टूटने की कथा

तितलियाँ तो रंग बिरंगी होती हैं। उड़ती हैं, फूलों पर नाचती हैं। उनके पराग कणों पर बैठती हैं। सबसे पहले यह फ़िल्म, इस नाम के मिथक को तोड़ती है। फ़िर एकएक कर सब चीज़ें टूटकर बिखरने लगती हैं। बिखरना नयी संरचनाओं के लिए सबसे अनिवार्य तत्व है। उनकी इस तितली का रंग गेंहुआ है। पर हमें इसका रंग, स्याह दिखता। वह उड़ नहीं पाती थी। वह छटपटा रही थी। वह जिस घर में थी, वहाँ उसका दम घुटता था। पहली बार लगा, कोई इतनी सहजता से भी हमारे इंसान न रहने की कहानी कह सकता है।

यह हमारे दौर की सबसे सशक्त फ़िल्मों में से एक है, जो इतनी बारीकी से इस तरल समय की तमाम जटिलताओं के रेशे-रेशे उधेड़ कर रख देती है। यह निर्ममता इस माध्यम में नहीं, हमारे देशकाल में है। जो लगातार हमारे अमानवीय होते जाने की कहानी को एक सरल रेखा की तरह खींच देती है। बताती है, हम किस रास्ते से ख़ुद को बर्बाद करके यहाँ तक पहुँचे हैं। यह उस वक़्त की कहानी भी है, जब हम विकास और प्रगति जैसे शब्दों में मकड़ी की तरह ख़ुद को उलझा हुआ पाते हैं और समझ नहीं पाते कि जो सामने दिख रहा है, उसे क्या समझें। इस परिदृश्य में, जबकि हम सोचने समझने के क़ाबिल नहीं छोड़े गए हैं, यह कोई छोटी बात नहीं है कि हम इन रूपों में देखकर जान सकते हैं के 'आधुनिकता' की प्रक्रिया ने हमारे साथ क्या किया है?

तितली घर का सबसे छोटा लड़का है। तीन भाइयों और एक पिता के साथ वह उस घर को बनाते हैं, जहाँ सबसे बड़े भाई की पत्नी, अब अपनी बेटी के साथ वहाँ नहीं रहती। फ़िल्म यहीं से शुरू होती है। उलझी हुई सी। बेटी का जन्मदिन है, फ़िर भी वह रात को वहाँ रुकने से मना करती है। वह कैसे भी करके छुटकी को साथ लेकर लौट जाती है। रात में ऐसा क्या है? यह रात थोड़ी देर बाद समझ आती है। रात चोरों की होती है और वह सब रात के चोर हैं। सुनसान सड़कों पर गाड़ी वालों को लूटते हैं। उनकी गाड़ी, फ़िर कभी गाड़ी की तरह सड़क पर नज़र नहीं आती। हमेशा के लिए गायब हो जाती।

यह अपने भीतर कई सारे सवालों को लेकर एकसाथ चलती है। वह इस घर से भागना चाहता है, चाहकर भी भाग नहीं पाता। उसका असफल हो जाना, हमारे सामने और बड़े मंज़र को खोलता है। हम देखते हैं, इस आधुनिक काल ने उसने केवल पितृसत्ता के साथ समझौता नहीं किया बल्कि उसके औज़ार और पैने किए हैं। उस मॉल में विक्रम जहाँ गार्ड की नौकरी करता है, वहाँ एक लड़की मुस्कुरा-मुस्कुरा कर एक पुरुष की दाढ़ी बना रही है। यह दृश्य जब टीवी सेटों से निकलकर उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बनकर सामने आता है, तब इसके मानी बिलकुल बदल जाते हैं। मँझला भाई, इसे सिर्फ़ तितली को घर में रोकने की तरक़ीब नहीं बनाता, बल्कि अपने रात के काम को दिन में करने के लिए इस्तेमाल भी करता है। ऐसा करते हुए वह बिलकुल उसी लहज़े में सोचता है, जिस भाषा में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बिक्री बढ़ाने के लिए स्त्री देह का प्रयोग करती हैं। उनका विज्ञापन अब नीलू करेगी।

नीलू। तितली की पत्नी। इस कैरेक्टर की एंट्री के साथ फ़िल्म एक दूसरे स्तर पर पहुँच जाती है। कनु बहल बड़ी कुशलता के साथ इस क्राफ़्ट से चीज़ों को सुलझाते हुए कहते चलते हैं, जहाँ हम बस देखते रह गए और हमारी नसों में बहता ख़ून, उसका एक-एक कतरा वहीं का वहीं थम गया। कार टेस्ट ड्राईव के लिए लेकर निकलना और उसके बाद उस वीभत्स रक्तरंजित दृश्य रचने की हिम्मत दिखाना, किसी बड़े विजन वाले डायरेक्टर की उपज है, यह दिखता है। सबसे हृदयविदारक दृश्य सिर्फ़ अनुराग कश्यप की 'पाँच' या 'गैंग्स् ऑफ वासेपुर' में नहीं हैं। जहाँ हत्या को 'ग्लोरीफ़ाय' करने के लिए उनका इस्तेमाल किया गया है। 'अग्ली' में जब गुम हुई बच्ची मिलती है, तब भी दिल इसतरह जुगुप्सा से नहीं भर पाता। सच में मन किया था, ऑडी थ्री से निकलकर बाहर घूम आऊँ थोड़ा। अगर समर और संदीप न होते तो बाहर चला भी जाता। वहाँ बैठे रहने की हिम्मत नहीं बची थी।

इस हिंसा को हम देख पाने में सक्षम हैं, जिसे परंपरा, ख़ून के लाल रंग के साथ संबंध जोड़कर हमें बताती आई है। लेकिन उसे क्या कहेंगे, जहाँ एक ऐसा वर्ग भी है, जो अपने स्वार्थ के लिए -या यह इस संदर्भ में बहुत छोटा शब्द बनकर रह गया है, जो उस सघनता से बात को नहीं कह पा रहा- दूसरे वर्ग के 'मन' को अपने कब्ज़े में ले लेता है। हमें हमेशा लगता रहेगा, हम जो कर रहे हैं, अपने लिए कर रहे हैं। पर असल में ऐसा होता नहीं है। वह वर्ग हमारे मन का उत्पीड़न करता है एवं उसका व्यवस्थापक बन जाता है। विक्रम और उसके दोनों भाई। उनसे से पहले उनके पिता। सत्ता के नियामक सब जानते हैं। फ़िर भी पुलिस कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करती। वह ऐसे प्रतीक रूप में उभरती है, जहाँ उसने इन्हे अपने लिए खड़ा किया है। एक गराज वाला है, जिसके लिए वह गाड़ी चुराते हैं, इनको बचाता है। फ़िर अपने बाक़ी के पैसे निकालने के लिए पुलिस अफ़सर इन्हें हवाला के पैसे लाने ले जाने वाले व्यक्ति का सुराग देता है और उसकी हत्या करके एक करोड़ रुपये लूटने की योजना इन्हे बताता है। उनके घर देसी कट्टा भेजता है।

लेकिन इतना होने पर अभी भी कोई है, जिस तक हम पहुँचे नहीं हैं। उसकी पहचान अभी भी छुपी हुई है। उसने सीधे तौर पर पूँजीवादी व्यवस्था के खोल के भीतर ख़ुद को समेट लिया है। पुलिस निजी पूँजी की संरक्षक है। वह कोई भी ऐसा काम नहीं करती, जिससे पूँजीपति की निजी संपत्ति को हानि हो। उसने हमारे अधकचरे विकासशील समाज के उस हिस्से को अपने लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, जिसका इस प्रगति से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। वह इस धारा से छिटके हुए लोग हैं। वही लोग हमें इस फ़िल्म के मुख्य चरित्रों के रूप में दिखाई देते हैं। जमना पार, किसी गटर की पहचान वाली गली के एक मकान में रहने वाले। शहर की परिधि पर स्थित। पर वह कभी ख़ुद को ऐसा मानने के लिए तय्यार नहीं होता। उसे मानना पड़ेगा, उसने अपने अस्तित्व के लिए यह शहर और यह वर्ग बनाया है। इनके बिना उसका काम नहीं चल सकता।

साफ़ तौर पर यह नज़र आने लगता है उनका गाड़ी चुराना, लूटपाट करना, एक संकेत है। आज जबकि दिल्ली की सड़कों पर बारह सौ कारें रोज़ सड़कों पर उतार आती हो। उनके द्वारा हो रही पर्यावरण की क्षति को अर्थव्यवस्था, शहरीकरण और विकास जैसे शब्दों के जाल से ढक दिया जाता हो, तब भी क्या उनकी पहचान छिपी रह गयी है? बिलकुल नहीं। तितली मेरठ में जिस मॉल की पार्किंग के लिए तीन लाख रुपये इकट्ठा कर रहा है, वहाँ किनकी गाडियाँ खड़ी होंगी। उन आलीशान महँगी बड़ी-बड़ी दुकानों में, उन आलीशान कारों से ख़रीदारी करने कौन आएगा? अगर अभी भी समझ नहीं आया, तब उनके लिए यहाँ नीलू ऐसी लड़की के रूप में उभरती है, जो शादी की पहली रात अपने पति को ऐसा कुछ भी करने नहीं देती, जिसकी कल्पना हमारे मन आजतक हम दूध के गिलास और हाथ के दूरी पर रखे टेबल लैंप बुझने के साथ करने लगता है। आप पायेंगे, यह लड़की कुछ अलग है। वह ऐसी बड़ी-बड़ी इमारतों को बनाने वाले बिल्डर के शादीशुदा बेटे के साथ प्यार में हैं। वह नाम से ही प्रिंस नहीं है, सच में उसका राजकुमार है, जिसके कहने पर वह तितली से शादी करने के लिए राजी हो जाती है। यह वही सुविधाभोगी उच्च वर्ग है, जो बहुमंजिला इमारतों में, ग्रेटर कैलाश, हौज़ खास, साउथ एक्स की बड़ी-बड़ी कोठियों में रह रहा है। नवीनतम तकनीक का उपभोग कर रहा है। उसने अपने लिए ऐसे तंत्र और तबके को खड़ा कर लिया है, जिसके पीछे वह छिपकर कुछ भी कर सकता है। इससे उसकी पहचान ही मुश्किल नहीं हुई है, उसतक पहुँचना भी उतना कठिन है। वह एकसाथ, इतने विरोधाभासों के बीच होने के बावज़ूद, ख़ुद को 'आधुनिक' कहने की सुविधा का उपयोग करता रहा है। उसे पहचान कर भी हम उसे रोक नहीं पा रहे। यही हमारी हार है।

अब तक थोड़ा अंदाज़ तो आपको भी हो गया होगा, जो फिल्म एक-एक फ्रेम में इतनी बारीकी से चीजों को रच रही हो, उसे देखे बिना कुछ ख़ास समझ में नहीं आने वाला। लिखने वाले पर भी यह दबाव हमेशा रहता है कि पढ़ने के बाद भी, यह 'देखना' बचा रह जाये। बहरहाल। वापस लौटते हैं। सच में, यह फ़िल्म, इस छोटी-सी सुविधाजनक व्याख्या में नहीं सामने वाली। इसका फ़लक इससे बहुत बड़ा है। यहाँ हमें यह भी चिन्हित करना पड़ेगा कि इस दरमियान हमारे भीतर क्या-क्या टूट रहा है और उससे क्या बनकर सामने आया? यह हमारे शहरों, उनमें दिखने वाले प्रगति सूचकों के पीछे की कहानी है। थोड़ी असहज, खुरदरी, उलझी हुई। एक पंक्ति में यह हमारे अमानवीय होते जाने की कथा है। इसका हर दृश्य इतनी सघनता से अपनी बात कहता जाता और उसके घटित होने पर कुछ सोचते, उससे पहले हमारा दिमाग एकदम सुन्न होने लगता। जैसे-जैसे हम साँस लेने में असहज होते गए, वैसे-वैसे तितली हमारे साथ साँस लेता रहा। फ़िक्र मत कीजिये, अभी भी बहुत कुछ ऐसा है, जिसे देखे बिना दिल नहीं मानेगा। इस फ़िल्म को बनाने के लिए जितनी हिम्मत चाहिए, उससे कहीं जादा हिम्मत, इसे देखने के लिए चाहिए। अगर आप थोड़े हिम्मती किस्म के हैं तो आप फ़िल्म देख सकते हैं।

नवंबर 16, 2015

हमारी अधूरी कहानी..

इस हिस्से की कहानी उसकी है। अगर उसमें भी मैं हूँ, तब यह मेरी भी उतनी ही होगी, जितनी उसकी। कभी उसने यह 'याद शहर' वाले नीलेश मिसरा को नहीं भेजी। कभी वह भेज नहीं पाया। अक्सर हम ऐसे ही होते हैं। अधूरे। अनकहे। छिपे हुए से। पर वह अभी-अभी मेरे मन के ख़यालों से गुजरते हुए दिल में कहीं चुभ गयी। उसने कहीं अपने मन में यह बात रख ली। वह अब कभी किसी से प्यार नहीं करेगा। वह भी तब, जबकि प्यार हम करते नहीं, वो नामुराद ख़ुद ब ख़ुद हो जाता है। हम तय कहाँ कर पाते हैं। तय करने वाले प्यार नहीं कुछ और करते होंगे। शायद उसे लगा होगा वह तय कर रहा है, क्योंकि वह लड़का है। लड़कियाँ तय कहाँ कर पाती हैं। उन्हे तो बस उससे प्यार करने के लिए ख़ुद को बनाना होता है। पता नहीं यह कैसा था। अधपका। अधकचरा। अधखिला। आप इश्क़ में हैं, यह पता चल जाने के बाद जिसके साथ अपनी आगे वाली ज़िन्दगी देख रहे हैं, उसे बताने से पहले अभी थोड़ा और उखड़ेना पड़ेगा। परतें मिट्टी के तालाब में सूखने के बाद कैसे पपड़ी बन जाती हैं, बिलकुल वैसे ही किसी सतह पर उसे वह यादें सपने बनकर सतायेंगी। चुभेंगी हर पल उन ख़ास लम्हों की बातें।

{ पिछली किश्तें हमारी अधूरी कहानी : एक दो }

नवंबर 15, 2015

शहर के शहर बने रहने की पुरुष व्याख्या

ड्राफ़्ट में देखा तो तारीख़ आठ मार्च दो हज़ार तेरह की है। उसके साल भर पहले, आठ मार्च के दिनशहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्या  लिखी थी, तभी समझ गया था, स्त्री-पुरुष दोनों एकसाथ चलते हुए किसी भी निर्मिति को बनाते हैं। भले हम उसके अलग-अलग पाठ बनाते जाएँ, पर वह एक-दूसरे के पूरक के रूप में उभरने लगेंगे। आप एक सिरा पकड़ेंगे तो उसका दूसरा कोना, उस दूसरे तक अपने आप ले जाएगा, जिसे हम छोड़ना चाह रहे थे। हम चाहते हुए भी उससे बच नहीं सकते। बचना, एक किस्म का पूर्वाग्रह होगा। लेकिन दिलचस्प यह देखना है कि उस साल के भीतर एक नहीं दोबार अलग-अलग ड्राफ़्ट डैशबोर्ड में मिले। ऐसा क्या था, जो तब मन में चल रहा होगा? कौन-सी बातें छूटी लग रही होंगी, जो कहने के बावजूद कहने में दिख नहीं पाई वहाँ। वह ड्राफ़्ट इस वाले से भी तेरह महीने पहले का है। उसमें कोई तस्वीर नहीं लगाई है। वहाँ इस पुरुष व्याख्या करने की ज़िद इस दृष्टि के बनने से पहले की है।

उसमें सिमोन के हवाले से कुछ बातें हैं। वह कुछ इस तरह शुरू होता है। 'ऐसा नहीं है कि शहर की स्त्री व्याख्या में पुरुष नेपथ्य में है, उसकी भी उतनी ही हिस्सेदारी है, जितनी उसकी पत्नी की। सिमोन कहती हैं, स्त्री का जन्म नहीं होता, उसे बनाया जाता है, तो उसी क्रम में पुरुषसत्ता पुरुष को पुरुष की पूर्वनिर्धारित भूमिका में ढ़ालती है। इस वाक्य की छाया से थोड़ी देर के लिए निकल आया जाये तो हो सकता है कुछ और भी दिखे'। इसके बाद क्या हुआ होगा? कोई अंदाज़ा नहीं लग रहा। जादा से जादा दिमाग वापस उस पोस्ट को नए सिरे से पढ़ने लौट गया होगा और कुछ न समझ आने के बाद, इसे वहीं छोड़ दिया होगा। इतने दिनों बाद वापस लौटना संभव नहीं है। न इसका कोई रफ़ ड्राफ़्ट किसी पन्ने पर होने की कोई उम्मीद है। बस अभी थोड़ी देर उन सवालों को यहाँ स्थगित रखना है, जिससे हमारे दिमाग में वह इस स्थापना को भंग कर दे। थोड़ा मुश्किल है। पर करना पड़ेगा।

इस दरमियान हम दोबारा उस तार को कैसे पकड़ सकते हैं, इसके लिए एकबार फ़िर कोशिश करते हैं। जिसके लिए हम यह पूर्वधारणा पहले से लेकर चल रहे हैं कि पुरुषसत्ता पुरुषों को वैसा बनती है, जैसे वह हमें समाज में दिखते हैं। इसके बाद हमें करना बस इतना है कि एक ऐसे शहर की कल्पना करनी है, जहाँ स्त्रियाँ नहीं हैं। वह स्त्री शून्य क्षेत्र है। स्त्री, जिसे हम उसकी पत्नी के रूप में पिछली पोस्ट में रेखांकित कर चुके है। ऐसा करना मुश्किल लग रहा है, तो ज़रा अपने अनुभव के गलियारे में थोड़ी सैर करके जल्दी से वापस लौट आइए और उन जगहों, पेशों की स्मृतियों को फ़िर से बुनने की कोशिश करिए, जहाँ केवल पुरुष ही थे। चलिये आप भी क्या याद करेंगे। थोड़ा आपका काम मैंने नीचे कर दिया है। आपका दिमाग तो पहले ही बंद था।

वह गोल मार्केट में ' वैष्णो ढाबा' चलाने वाले पुरुष हैं। बेयर्ड लेन में 'हिमालय हैयर कटिंग सैलॉन' में बाल काटने वाले आदमी हैं। पहाड़गंज मेन बाज़ार में जितनी भी दुकानें हैं, उनमें कोई भी स्त्री के अधिपत्य में नहीं है। आजादपुर सब्ज़ीमंडी में सारे अढ़ाती, सारे सब्ज़ी बेचने वाले वाले मर्द हैं। इतवार दरियागंज में लगने वाला किताब बाज़ार पुरुषों की आर्थिकी का सृजन करता है। हमारे समाज के गेट पर दो शिफ़्टों में बदलने वाले गार्ड इतने सालों से आज तक पुरुष ही हैं। ठेका देसी शराब पर महिलाओं का पाया जाना गधे के सिर पर सींघ ढूँढ़ने जैसा है। खारी बावली, सदर बाज़ार, चाँदनी चौक, गाँधी नगर सब जगह बेलदारी करने वाले ठेले खींचने वाले कौन हैं? आपको नहीं पता नेहरू बाज़ार में ठेले पर फल बेचने से लेकर अवंतिका में स्कूल से सौ गज़ की दूरी पर जूस की दुकान से भी महिलाएँ अनुपस्थित हैं। पालिका प्लेस की फर्नीचर मार्केट में भी कील ठोकने से लेकर कुर्सी मेज़ रंगने वाले सब पुरुष हैं। भजनपुरा, कापासहेड़ा, मुनिरका, ढक्का, कोटला मुबारकपुर लेबर चौक किनसे अटे पड़े हैं। रीगल बिल्डिंग में पिंड बलूची के दरवाज़े पर पुतला भी बैठा रहता है, वह किसी पंजाबी पुरुष का प्रोटोटाइप है। कभी सुबह जल्दी उठकर अख़बार डालने वाले को देखा है। वह भी उस मदर डेरी पर बैठे आदमी जैसा दिखता है न। शिवाजी स्टेडियम के गिरिराज बुक स्टाल वाले। उस पीपल के पेड़ के नीचे वाले शनि मंदिर में पंडीजी भी तो अकेले रहते हैं।

ऐसा नहीं है कि यह किसी ‘पुरुष गणराज्य’ की परिकल्पना है, जिसे आगे सिद्ध किया जाएगा। इन सीमित उदाहरणों से केवल यह देखने और चिन्हित करने की कोशिश है कि जिसे हमारे समाज में हम 'निम्न वर्ग' कह जाता है, क्या उसकी कोई पहचान उभर रही है? क्या यहाँ पुरुष बड़ी सहजता से स्त्रियोचित कार्य बड़ी सरलता से करते नज़र नहीं आ रहे? साथ ही यह भी देखने लायक है कि कहीं ऐसा तो नहीं है के छोटी पूँजी या जिन पेशों में स्थायित्व नहीं है, उनका संबंध 'विस्थापन' से तो नहीं जुड़ रहा? यदि ऐसा है, तब यह विस्थापन का पहला दौर है, जिसमें कमाने के लिए पुरुष घर से निकला है। यह विवेचन अब 'निम्न वर्ग की पुरुष व्याख्या' जैसा कुछ लगने लगे, तब भी हम कुछ नहीं कर सकते। उसकी जटिल संरचना ऐसी ही है।

अब यहाँ इस बिन्दु पर इस पूरे परिदृश्य को और समस्याग्रस्त करने की बारी आती है। जिसमें सबसे बड़ा सवाल उभरता है, क्या शहर का मूल निवासी यह 'विस्थापित' ही है, जो यहाँ थोड़े पैसे कमाने और उनसे अपनी ज़िंदगी को जिंदा रखने की जद्दोजहद में रोज़ पिसता हुआ मर रहा है। उसने अपना परिवार शहर की परिधि से बहुत दूर किसी अजाने से गाँव में झोपड़ी या छप्पर के नीचे रख छोड़ा है। जिससे वह हर शाम खाना खाने के बाद, फोन से बात करने के लिए बेचैन हो उठता है। माँ से बहन से, दो-दो बच्चों को पैदा करने वाली अपनी बीवी से। सबको कुछ-न-कुछ लाने के सच्चे झूठे वादे करके, थोड़ी-सी शराब पीकर उन सपनों में खो जाता है। तीज-त्योहार में रेलगाड़ी में भूसा बन, जादा समान पर घूस देकर कुछ दिन के लिए शहर के किस्सों के साथ, अपने घर लौट जाता है। वह इस बार पूरे छह साल बाद अकेले नहीं लौट रहा। बीवी बच्चों के साथ आ रहा है। वह सोच रहा है, इससे यहाँ खाने की समस्या तो खत्म हो जाएगी, उससे जो पैसा बचेगा, वह बच्चों की पढ़ाई में खर्च कर देगा। इस बहाने शहर में थोड़ा घर भी आ जाएगा।

{तीन साल पहले लिखी इसकी पहली कड़ी : शहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्या }

नवंबर 14, 2015

कैसे..

मैं लिखना चाहता हूँ वह शब्द, जो आज से पहले कभी किसी ने न लिखे हों। वह एहसास जो किसी ने न महसूस किए हों। कहीं से भी ढूँढ़ना पड़े, उन्हे खोजकर ले आऊँगा। उन्हें ढूँढ़ने में कितना भी वक़्त बीत जाए, पर वह मिल जाएँ, एकबार। कभी मन करता है, बस ऐसे ही उनकी तरह गुम होते रहना ठीक रहेगा। गुम होना भी ज़रूरी है। अपने अंदर से लेकर बाहर तक सब गुम होते-होते ऐसे गायब हो जाएगा, जैसे पहले कोई गुम नहीं हुआ। मुझे पता है, मैं गुम नहीं हो पाऊँगा। न कभी कुछ ऐसा कहीं किसी की चोर ज़ेब से चुरा पाऊँगा। पर कहने में क्या, कह देता हूँ। कभी एक दुनिया ऐसी बनाऊँगा, जहाँ सबकी चोर ज़ेब उनकी नज़रों में कभी नज़र ही नहीं आ पाएगी। तब चुपके से जो-जो समान वहाँ रखा होगा, उसमें से उन सबको ले आऊँगा। तब उन गुम हो गयी चीजों को कोई कहीं देख नहीं पाएगा। मैं उन्हे बड़ी हिफाज़त से अपने अंदर घुलने दूँगा। जैसे रंगरेज़ घुलने देता है, कपड़े डालने से पहले रंग। पर क्या करूँगा ऐसी दुनिया बनाकर, जो पहले किसी ने न देखी हो। पता नहीं ख़ुद पहचान पाऊँगा उसे या ऐसे ही सपने बुन रहा हूँ।

कभी सोचता हूँ, पर पता नहीं ठठेर गिलास कैसे बनाते होंगे। उन्हें ढालते वक़्त कौन से औज़ार काम आते होंगे। दिमाग उस वक़्त क्या कर रहा होता होगा? शायद वह पहले देखे किसी गिलास की नकल करने या कुछ मौलिक रचने की ज़िद से भर जाता होगा। सच पूछता हूँ, कभी गिलास को अकेले, खाली वक़्त में ध्यान से देखा है? एक बार देखना। बहुत ध्यान से देखना। वह पहला इंसान, कितनी रचनात्मक ऊर्जा से भरा होगा, जिसने पानी भरने के लिए बाल्टी जैसी चीज़ बनाने के बाद, गिलास बनाया होगा। उसने रस्सी से कुआँ खाली करने की ज़ुर्रत की होगी। क्या ऐसा सच में हुआ होगा के रस्सी, लोटा, गिलास, बाल्टी, घड़ा, थरिया, बटुली, चिम्मच, दसपना सब उसी आग के पास बैठे लोहार के दिमाग में एकदम उपज गए होंगे?

नहीं न। सच में ऐसा कभी नहीं हुआ होगा। हम धीरे-धीरे तालाबों में नहाते हुए कुओं के स्थापत्य को जान पाये होंगे। कच्ची बावड़ी से सीता बावड़ी तक। मैं भी आहिस्ते-आहिस्ते उन तक पहुँच जाऊँगा। पहुँचना नहीं ज़रूरी है, ज़रूरी है इस तरह से गुज़रते रहना। इस एकएक कदम के नीचे, मिट्टी की नमी में केंचुओं की तरह दबे शब्दों को धरती की चोर ज़ेब से निकालकर, आम की गुठलियों के साथ खुरपे से गाढ़ दूँगा। वह जब इस अगहन के महीने में रातरानी के फूलों में तब्दील हो जाएँगे, तब धीरे से तोड़ लूँगा। फ़िर आहिस्ते से उन्हें हाथ में रखकर वापस सबकी अलगनी पर टंगी कमीज़ों, पेटीकोटों, तहमदों में छिपा दूँगा। छिपा दूँगा सिक्कों के गुल्लकों में। उनके बिस्तर की रुई में। रज़ाई के खोल में। वह उन फूलों की ख़ुशबू से जान जायेंगे, कभी कोई उनके घर में चुपके से उस खुली खिड़की से अंदर आया था। वक़्त वही था, जब पति-पत्नी नंगे होकर एक-दूसरे को देख रहे थे। रात के डेढ़ बजे से कुछ पहले।

नवंबर 13, 2015

लिखने के दरमियान

एक बात साफ़ तौर पर अपने अंदर दिखने लगी है। शायद कई बार उसे कह भी चुका हूँ। शब्द भले वही नहीं रहते हों पर हम अपनी ज़िंदगी के भीतर से ही कहने की शैली इज़ाद करते हैं। वह जितना हमारे भीतर से आएगी, उनती सघनता से वह दूसरों को महसूस भी होगी। इसे हम एक तरह की कसौटी भी मान सकते हैं या अपने अपने अनुभवों की सीमा। यह भी उतना बड़ा सच है कि हम सारी ज़िंदगी एक खाँचे में नहीं बिता सकते। हमारे इर्दगिर्द बनने बिगड़ने वाली परिस्थितियाँ उन तंतुओं, स्पंदनों, स्पर्शों के अर्थ को लगातार नए-नए रूप एवं अर्थ से भरते रहते हैं। कल आसमान में चंद्रमा नहीं था, दो दिन बाद उतना अँधेरा भी वहाँ नहीं रहेगा। सब परिवर्तनशील है। कुछ भी वैसा का वैसा नहीं रहेगा। तभी पीछे पलटकर देखने पर हम खुद को बदले हुए नज़र आते हैं। अगर कुछ बदलाव नहीं दिख रहा, तब हमें सचेत हो जाना चाहिए।

अक्सर पीछे मुड़कर देखते हुए लगता है, उस दरमियान से इस बीतते क्षण के बीच, एक बारीक-सी रेखा है, जो हमारे इन दोनों रूपों को जोड़ तो रही है, साथ ही, बहुत महीन से धागे बराबर हम वहाँ से खिसक आए हैं। जैसे जब हमने लिखना शुरू किया, तब, एक दबाव बाहर से अंदर की तरफ़ हमेशा महसूस होता था। हम जहाँ से खड़े होकर देख रहे थे, वहाँ से दुनिया तो दिखायी दे रही थी पर हमने ख़ुद के लिए उन मौकों को स्थगित रखा। इसे और सरल करके कहा जाये तो हम अपने भीतर उस समाज को पर्याप्त जगह देते हुए, समाज में अपनी भूमिका को निर्धारित कर रहे थे। उसमें चेतना का बहिर्गमन तो था, पर संवेदना का अंतस कहीं अनुपस्थित था। इसका इस तरह गायब होना, हमारे गुम हो जाने की पहली याद है।

लेकिन आज या उस वक़्त को धीरे-धीरे अपने पास से गुजरते हुए देखता हूँ तो लगता है, वह धारा बिलकुल परिवर्तित हो चुकी है। जिसे हम मज़ाक-मज़ाक में उमर का दबाव कहा करते थे, जिसे हमने मुक्तिबोध से उधार लेकर बोलना सीखा था, आज वही आत्मालोचन थोड़ा पर्दे के पीछे छिपकर सब देख रहा है, पर हम पर हावी नहीं हो पा रहा। इधर दिमाग ने भी ख़ुद से खेलने में निपुणता प्राप्त कर ली है। व्यक्ति के रूप में अब हमारे भीतर अस्तित्व के सवाल, अपना रूपाकार बदलकर आत्मकेन्द्रित हो चुके हैं। वह हमसे शुरू होकर हम तक वापस आकर दम तोड़ देते हैं। मैं ख़ुद को उन संवेदनाओं के अतिरेकी क्षणों से घिरा पाता हूँ, जहाँ समाज की सबसे छोटी इकाई, परिवार, मेरे मन को नियंत्रित कर चुका है।

अब यहाँ से चीज़ें थोड़ा खुलने लगती हैं कि आशीष लिखने की इच्छा से भर जाने के बाद भी क्यों नहीं लिख पाता। घर, पत्नी, नौकरी के सवालों के बीच हमारा रोजाना इस तरह हमारे मन को बुनता है, जहाँ रोज़ दोहराई गयी बातों से मन एकदम सुन्न होकर, किसी कोने में खड़ा, सबकुछ देखने के अलावा कुछ और नहीं कर पाता। सारी मानसिक ऊर्जा मन को यह समझाने में व्यतीत हो जाती है कि एक रात सपने में सोने के बाद, अगली ऐसी सुबह भी आएगी, जहाँ यह सवाल, सवाल नहीं रह जाएंगे। इनके जवाब हमारे बोलने से पहले ही हवा में तैरने लगेंगे। वह ख़ुशबू बनकर फैलने लगेंगे।

लेकिन इसमें मैं कहाँ हूँ। मैं एक तिलिस्म रचते हुए, उन सबकी एवज़ में यहाँ छत वाले कमरे में बहुत से ज़रूरी कामों को दूसरों पर टालते हुए, अनमना होकर, अपने भविष्य के अँधेरे को देखते हुए दुखी होने के बाद, यहाँ लैपटॉप खोलकर उन सबकी ज़िंदगियों को उतारने की फ़र्ज़ी-सी कोशिश में ख़ुद को झोंक देता हूँ। इस कमरे से बाहर निकलने पर मेरा दम घुटने लगता है। लगने लगता है, यह खिड़की जहाँ भी जाऊँगा, मेरे साथ नहीं आ पाएगी। तब, मैं इस खिड़की के आरपार नहीं देख पाऊँगा। इस खिड़की को देखते रहने के लिए बाहर निकलने से बचने लगा हूँ। यह एकतरह से पागलपन की निशानी है। जिससे बच पाना मेरे लिए मुश्किल होता जा रहा है। जैसे अभी, बिलकुल इसी क्षण, जब सब सो रहे हैं, इधर मैं इतनी रात जागकर लिख रहा हूँ।

लेकिन यह भी कैसे हो गया के पिछली दो पोस्टों से जहाँ पहुँचना चाहता हूँ, वहाँ नहीं पहुँच पा रहा। पता नहीं मन कैसे उन चीज़ों को उरतने नहीं दे रहा। पर मैं भी जिद्दी हूँ, इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ने वाला। पर वह क्या है, जो जैसे मेरे अंदर हैं, उन्हे वैसे भी नहीं कह पा रहा। फ़िर वह कौन लोग हैं, जो कहते हैं, चीजों को हू बहू उतार देना सबसे आसान काम है। पता नहीं। शायद उनके लिए आसान रहा होगा। मेरे लिए आसान कभी नहीं रहा। जैसे हम भले उस कमरे में बरसों से रह रहे हों, पर वही कमरा, जब मेरे मन के अंदर बन गयी छवि-सा बाहर आने की कोशिश करेगा, तब कुछ ऐसा होगा, जो मैं चाहकर भी कह नहीं पाऊँगा। शायद उस दरवाज़े की कोई चिटकनी छिपी रह जाएगी। वह हवा जिसे इतना सहज होकर रोज़ अपने आसपास महसूस करता होऊंगा, वह वहीं पलंग के पास, रसोई के अंदर, रोटी की परत में बैठ जाएगी। पानी की बूँद का नल से टपकना, हवा से पर्दे का ख़ास तरह से उड़ना। उन मोटे-मोटे चींटों का जबतब काट लेना नहीं कह पाऊँगा। सब वहीं का वहीं रह जाएगा।  तब मैं ठीक से एक नक़लनवीस भी नहीं बन पाऊँगा।

{साल भर पहले का पन्ना : मन की बातदूसरा पन्ना इसी साल का है : बातें बे-वज़ह }

नवंबर 12, 2015

जब हमने ब्लॉग बनाया

कभी-कभी ख़ुद को दोहराते रहना चाहिए। अच्छा रहता है। अपनी गहराई का अंदाज़ा लगना बहुत ज़रूरी है। पता रहता है, हम कहाँ से चले थे और आज कहाँ है। बड़े दिनों से सोच रहा था, कहाँ से शुरू करूँ। मन में एक ख़ाका घूमते-घूमते थक गया। बस हरबार यही सोचता रहा, कैसे दिन हुआ करते थे। अजीब से। खाली खाली। भरे-भरे से। अभी वक़्त ही कितना हुआ है। साल था, दो हज़ार दस। महिना था, अक्टूबर। भाई, पवन के साथ जाकर नेहरू प्लेस से डेस्कटॉप असेंबल करवा लाया। नया-नया सिस्टम था। डर लगता था, कहीं कुछ ख़राब न हो जाये। लेकिन ऐसे तो काम चलने वाला नहीं था। पर अब इसका किया क्या जाए। समझ नहीं आता। बिन इंटरनेट यह एक डिब्बे से कुछ जादा हैसियत रखते हुए भी कुछ करने लायक हालत में नहीं था। हम भी जादा कहाँ जानते थे।

कंप्यूटर घर आ गया। उसके घर आने तक, हमारे घर में उसके लिए कोई जगह ढूँढ़ी नहीं गयी थी। जब वह आया, तब हमने लकड़ी के बक्से पर पहले से पड़ी चीजों को इधर-उधर करके रखने लायक जगह बनाई। उस बक्से के आगे छोटीसी कुर्सी-मेज़  रखकर हम दोनों भाई बैठ जाते। घंटों सोचते, इसमें इंटरनेट कैसे चलेगा? तब तक अक्टूबर दिसंबर में बदल चुका था। दिसंबर धीरे-धीरे नए साल की तरफ़ खिसक रहा था। तब हमारे पास फ़ोन था, नोकिया तिरसठ सौ। उसके साथ 'नोकिया पीसी सुइट' की सीडी थी। वह भी जोश-जोश में हमने 'इन्स्टॉल' कर ली थी। जैसे ही हम यूएसबी केबल से फ़ोन 'कनेक्ट' करते उसमें इंटरनेट से जोड़ने का ऑप्शन भी दिखता। उन्ही दिनों एयरसेल वाले अट्ठानवे रुपये में तीस दिन के लिए अनलिमिटेड ब्राउज़िंग का 'पॉकेट इंटरनेट' पैक दे रहे थे। तबतक हम मन बना चुके थे, इसके लिए एक नया सिम लेते हैं और फ़ोन से यूएसबी लगाकर कंप्यूटर को जोड़ देंगे।

सच में, यह तरकीब चल गयी। अब हमारे कंप्यूटर में भी इंटरनेट आने लगा। पर ऐसा थोड़े हुआ कि जिस दिन इंटरनेट शुरू हुआ उसके दूसरे दिन ही ब्लॉग बना लिया। नहीं। अभी तो हम पहला कदम भी ठीक से नहीं रख पाये थे। उसकी स्पीड इतनी स्लो थी के ऑर्कुट और फेसबुक लॉगिन करने के बाद हम छत का एक चक्कर लगाकर लौटते, तब वह खुल पाता। सब वहाँ अपने नए पुराने दोस्तों को ढूँढ़ रहे थे, हम भी अपना खोजी दस्ता लेकर निकल पड़े। बीए, एमए के याद आते नामों को ढूँढते। जिसका फोन नंबर उससे नहीं ले पाये, उसके नाम वाली हर लड़की की तस्वीर जाकर देख आते। वहाँ वह भी मिली। 'लिव लाइफ क्वीन साइज़'। बीएड ख़त्म होने में कुछ ही दिन रहे होंगे। हमारी फ़ेयरवेल होने वाली थी कि एक ठंडी दोपहर आलोक फेसबुक पर हिन्दी में कैसे लिख सकते हैं, बताने लगा। ब्लॉग लिखने से पहले, हमने हिन्दी में गूगल ट्रांसलिटरेशन  से वहाँ लिखना शुरू किया।

तब लेदेके अविनाश दास के ब्लॉग मोहल्ला का हैडर अपनी तरफ़ खींचता रहता। उसे कैसे लगाया होगा, यही सोचकर चुप हो जाता। तब आरएसएस फ़ीड से विनीत के 'गाहे बगाहे' की ख़बर मिल जाती। यूआरएल भी क्या बनाया था, तानाबाना डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम। यहाँ से मेरा मन कुछ-कुछ बना होगा। हिन्दी में एमए था। कुछ किताबें पढ़ी थीं। डायरी लिख रहा था। जनसत्ता, हंस, तहलका लगातार ख़रीदा करता। एक आध प्यार के किस्से ख़ुद बनाने की हिम्मत जानकर लिखने की सोचने लगा। पर पता नहीं कहाँ से अपने ब्लॉग का नाम 'कलमकार' रखने की सूझी। शायद अमृत राय की 'कलम का सिपाही' का कुछ असर रहा होगा। फ़िर तो जो दूसरा नाम मुझे अच्छा लगता, उसे पहले ही कोई ले चुका था। फ़िर एक रजिस्टर के पीछे वाले पन्ने पर ठेठ भदेस नाम एक-एक कर लिखने लगा। पता नहीं वह नामों की सूची कितना आगे तक बढ़ी। पर जो नाम आज इसका है, उसी नाम से इसका वेब पता भी होगा, यही सोचकर नया जीमेल अकाउंट बनाया। नाम सोचा। चापरकरन। सालगिरह वाली पोस्ट  में इसका मतलब भी समझाया।

अब इसके बनने के बाद, सबसे बड़ी दिक्कत थी, इसमें लिखा क्या जाएगा? आज तक नहीं समझ पाया के इसने मुझे कितना गढ़ा और मैंने किस तरह इसे बुना। इस सवाल से लगातार जूझता रहा हूँ और इस पल, बिलकुल अभी लग रहा है कि यह हमारे अंदर से बाहर की ओर जाती हुई रेखा है, जिसका हमारे बिना कोई अस्तित्व नहीं है। भले उन संवेदनाओं के सघन होते क्षणों में मेरे मन के अंदर कोई ख़याल दाखिल हो जाये पर जबतक वह अंदर नहीं उतरता, तबतक कुछ भी नहीं लिख पाता। जब जब ऐसी हालत में लिखने की सोचता हूँ तो उसका सतहीपन साफ़ दिख जाता है। इस तरह कहीं-न-कहीं लगता है, हम लिखने से पहले उन सभी पंक्तियों को दोहराते हुए ऐसी जगह पहुँच जाते हैं, जहाँ उन्हे अंदर संभाले रखना मुश्किल होता होगा। जैसे इन सारी बातों का मेरे अलावे किसी और के लिए कोई मतलब नहीं है, वह किसी भी हृदय को किसी भी जगह चुने में सक्षम नहीं हैं। बीते इतने सालों में यहाँ लिखते हुए इस 'मेनरिज़्म' को तो पहचान ही लिया है, जो लिखने को एक ख़ास तरह के साँचे में ढाल देता है। हम भी इससे कहाँ बच पाये। लेकिन बाकी अभी नहीं। बाकी 'तद्भव' के अंक इकतीस के संपादकीय और जलसा के दो हज़ार पंद्रह के संस्करण 'आवाज़ें' के सिलसिले में जल्द।

{क्या सोच कर लिखने बैठा था, क्या सब लिखा गया। दोनों के बीच संगति बन नहीं पा रही। फ़िर सोचता हूँ, खराब भी लिखते रहना चाहिए। बात करनी थी, लिखने से पहले मन में चलने वाली प्रक्रिया  पर। चलो कोई नहीं। आप तस्वीर बड़ी करके उसे समझ सकते हैं। बाकी फ़िर कभी। }

नवंबर 11, 2015

इस दिवाली, शैलेश मटियानी की याद

मेरी बस थोड़ी-सी आँखें जल रही हैं और थोड़ी-सी नींद गायब है। बाकी सब ठीक है, जैसे देश में सब ठीक है। इस व्यंजना को समझने के लिए जादा दिमाग लगाने और घोड़े दौड़ाने की ज़रूरत नहीं है। यह कोई फ़िलर पोस्ट नहीं है जो इतने दिन के बाद आज रात उस खाली स्थान को भरने की गरज से लिखी जा रही है। लिखने का जो मज़ा स्याही से है, वह इस कीबोर्ड में नहीं है। यह बात दावा नहीं, मेरे हिस्से का अनुभव है। इस पिछले हफ़्ते जब यहाँ नहीं लौट पाया, कागज़ पर चहलकदमी कर रहा था। वह जगह हमेशा से अपनी तरफ़ खींचती-सी है। पास बुलाती। सब कुछ अपने अंदर छिपा लेती। उसे मेरे अलावे कोई नहीं पढ़ता। सिर्फ़ तुम्हें छोड़कर। 

थोड़ा पढ़ने की तरफ़ भी लौट गया, इन दिनों। शैलेश मटियानी की इलाहाबाद से प्रकाशित किताब है, त्रिज्या। जिल्द तीन खंडों में विभाजित है। संस्मरण, लेख, कहानी। मुझसे किताब राकेश की तरह बेतरतीब नहीं पढ़ी जाती। पहले उसे पढ़ने की कोशिश करता हूँ, जो पहले है। शुरू के पन्नों पर उनके बचपन के दिन बिखरे पड़े हैं। और बिखरी पड़ी हैं पहाड़ों की स्मृतियाँ। ढलते हुए सूरज का घाटी में डूब जाना। जैसे उनका दिल हर शाम डूब जाता हो। उनके घर में न पिता बचे, न माता। कोई नहीं है। मृत्यु परछाईं की तरह उनके साथ हरदम मौजूद है जैसे। वह उसे महसूस ही नहीं करते, हम भी उसे पहचानते चलते हैं। उनकी स्कूल की पढ़ाई बीच में छूट जाती है। और यहीं राजेश जोशी की कविता दाख़िल होते हुए नज़र आती है। बच्‍चे काम पर जा रहे हैं।

कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्‍चे, काम पर जा रहे हैं/ सुबह-सुबह/ बच्‍चे काम पर जा रहे हैं/ हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह/ भयानक है, इसे विवरण के तरह लिखा जाना/ लिखा जाना चाहिए इसे, सवाल की तरह/ काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे?

शैलेश भेड़े चराते और सुबह-शाम बच्चों को स्कूल जाते और वहाँ से लौटते हुए ललचाई आँखों से देखा करते। उनका पढ़ जाना एक संयोग ही था। वह पढ़ने के बाद उस अनुभव को कहते हैं। उन यादों को कभी भूलते नहीं हैं। पहाड़ हमेशा जिजीविषा का प्रतीक बनकर उभरता। पर उनके संस्मरण में पता नहीं कौन-सी भाषिक जटिलता प्रवेश कर गयी कि पढ़ना पढ़ने की तरह नहीं रह पाया। वह मेरे दिमाग की अबूझ कसरत बन गया। आख़िरकार हारकर किताब एक दिन चुपचाप वापस कर आया। पर पता लग गया हमारे भाषा के संस्कार कितने कमज़ोर हैं। मुझे सीधे-सीधे उनकी और अपनी भाषा के बीच वक़्त का ऐसा दौर गायब मिला, जिसमें हम उनके द्वारा प्रयोग किए गए शब्दों से उछलकर एक अलग तरह की भाषा में ख़ुद को पाते हैं। न वाक्य संरचना के खाँचे मिल पाये, न उनकी गरिष्ठ भाषा समझ में आई। लगता रहा, पता नहीं क्यों इसे उन्होने ओढ़ लिया होगा?

जाने दीजिये, अगर बात समझ नहीं आ रही। पर बात अभी भी ख़त्म नहीं हुई है। यह हमारी कमज़ोरी है, जो शब्दों के अर्थों को अपने अंदर उगने नहीं देते। वह कौन से दबाव रहे होंगे, जो भाषा को शैलेश इस कदर जटिल बनाकर अपने मन की परतों को उघाड़ रहे थे? इसे सहज नहीं कहा जा सकता। बचपन उन्हें असहज बनाता हुआ, उनके पूरे अस्तित्व को झकझोर रहा होगा। कैसे वह उन टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर दोबारा चलकर ख़ुद को तड़पता हुआ देख, उस कमरे के खालीपन से दोबारा भर गए होंगे। वह अर्धांगिनी  और मैमूद  जैसी कहानियों के लेखक हैं। राजेन्द्र यादव कहते हैं, उन्हें सारी जिन्दगी जितना मिलना था, नहीं मिला  पता है, अपने अंतिम दिनों में वह ख़ुद भी नहीं जानते थे, वह एक लेखक हैं। इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी, हम ख़ुद भी याद न रख पाएँ, हम कौन हैं। त्रिज्या का वह हिस्सा भी ख़ुद को भूल जाने से पहले, ख़ुद को याद करने की छोटी-सी कोशिश रहा होगा।

आवाज़ें..

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