दिसंबर 29, 2015

अलविदा पोस्ट: ख़त आख़िरी

तो साहिबान हम चलते हैं। फ़िर कब मिलेंगे, पता नहीं। मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी  वाला निदा फ़ाजली का शेर याद आ रहा है। उसे लिख भी दूँ, तब भी नहीं मिलेंगे। क्या करूँ? मन भी तो खाली होना चाहता है। इस जगह ने सारी खाली जगहें अपने नाम से रख ली हैं। कोई और बात आए भी तो कैसे आए? इसलिए जा रहा हूँ। सोते जागते हर पल जिसकी ख़ुमारी रहे, उससे निकल जाने की तमन्ना अब और नहीं रूक सकती। रुकते-रुकते यह बीतता साल और जुड़ गया। कहा था न कभी, जाते-जाते वक़्त लगता है। वक़्त लगता है पिघलने में बिलकुल जैसे। जैसे वक़्त लगता है, किसी याद के एहसास को अंदर घुलने में। जैसे बादलों में घुलता है सूरज। जैसे पानी में घुलता है नील।

इन पाँच सालों में मुझसे कोई और काम नहीं हुआ। फुल टाइमर रहा। बस एक ही धुन सिर पर सवार। कुछ लिखना है। भाग भागकर वापस आता और कई बार अनदेखी, अनकही बातों को कहने से भर जाता। लिखने को तो इस एक पंक्ति में वह बीतते पल कभी समा नहीं सकते। पर शायद यही इसकी सबसे कमज़ोर कड़ी है। कहते हुए भी न कह पाना। कभी-कभी होता है, हम रुक जाना चाहते हैं पर रुक नहीं पाते। इन घड़ियों में अभी भी मेरा मन इतनी तेज़ी से भाग रहा है। के इस तरह अचानक लगने वाले निर्णय इतना अकस्मात नहीं है। इसे अप्रत्याशित तो बिलकुल भी नहीं कहा जाना चाहिए। पिछले साल इसी दिन से  इस साल, इसी दिन तक। वापस।

यह ठहराव दिमाग को ‘रिस्टार्ट’ करने के लिए बेहद ज़रूरी कदम है। उन्हीं स्थापनाओं, विचार प्रक्रियाओं में फँसे रहना इकहरेपन से भर जाना है। चीजों को देखने, समझने, इस दुनिया में दखल करने की भाषा के और रूप भी होंगे जो इस तरह के खाँचों में नहीं आ पा रहे होंगे। उन सबके लिए ज़रूरी है, ठहरना। यह सिर्फ़ और सिर्फ़ एक बनी बनाई संरचना से बाहर निकलने, ख़ुद को बचाए रखने की छोटी-सी कोशिश भर है। किसने कहा नहीं लिखुंगा। कागज़ पर लिखुंगा। पर यहाँ जितना वक़्त दे सकता था, उसकी किश्तों को वापस समेट लेने की प्रक्रिया को शुरू का देना है। कोई माने-न-माने इतना वक़्त लगाकर इतनी मेहनत के साथ इस जगह को बनाने की जो अनुभूति, जो एहसास मेरे रोएँ-रोएँ में भरे रह गए हैं उन्हें कभी अपने से बाहर नहीं करना चाहता। लिखना बाहर ले आना है। इस तरह अब जबकि रुक जाऊँगा, तब तरतीब से देख पाने के खालीपन से भरा रहकर यह देखने की कोशिश करूँगा, अभी भी क्या है, जो मेरे अंदर रह गया है। कोई बात, कोई पल, कोई अनछुआ एहसास, किसी दिन की ढलती शाम, ढलती शाम से आसमान में उतरता चाँद।

क्या है, जो इसकी परिधि में कभी नहीं समा सका। शर्तिया उस भाव को कहने की ठोस भाषा मेरे पास नहीं होगी। मेरी कमज़ोर-सी लड़खड़ाती बारहखड़ी में इतना दम कहाँ कि कुछ कह पाऊँ। जो सब कहा, वह उन सबको कहने की कोशिश है। कहा अभी भी नहीं है। ऐसा कहकर कुछ संभावनाओं को अपने अंदर बचा ले जा रहा हूँ। जरूरी है सपनों की तरह किसी उम्मीद का बचे रहना। वह बची रहेगी तो हम बचे रहेंगे। तब किसी तारों भरी शाम, उनके रेशों से हम अपने हिस्से का आसमान बुनने निकलेंगे। पर कहा न। अब इस ठिकाने पर इतना ही। कोई माने-न-माने पर यह ऐसी जिल्दसाज़ की दुकान हो गयी है, जिसमें जिसमें किताब चाहे कोई भी आए, उसकी सीवने उधेड़कर तानाबाना वैसा रह जाता जैसा पिछली रात सिराहने रखकर सोया था। कुछ वक़्त चाह रहा हूँ अपने आप से। इस कमरे से निकलकर बची रह गयी दुनिया को पास से देखने का हुनर सीखने। इसके लिए वक़्त चाहिए। जो सारा है, वह तो यही ले जाता है। इसलिए जा रहा हूँ। जाना हमेशा लौट आने के लिए नहीं होता। कभी सिर्फ़ लौट जाने के लिए होता है। इसलिए लौट रहा हूँ। वापस। कभी न लौटने के लिए।

(28.12.2015 सुबह करीब सवा नौ बजे।)

2.
लिखना ज़रूरी क्यों हैं? यह ऐसा सवाल रहा जो हमेशा से चारों तरफ़ से घेरे रहता। लिखता भी जाता और कहता भी जाता, यह लिखना बेकार है। क्यों हम बेकार का काम किए जा रहे हैं। इसके बाहर निकलने के लिए ज़रूरी है, अब निकल जाना। निकलकर दूर से इस दस्तावेज़ को देखना। इसके टुकड़े-टुकड़े करके समझना है कि इसकी समझ क्या है? हमें भी तो ऐसा करने के लिए दूर से देखने के मौके मिलने चाहिए। इसलिए भी अब इस पानी की परछाईं से थोड़ा बचना है। भीगने से बचना, गुम होते जाते क्षणों को दोबारा रचने का अवकाश भी लेकर आएगा, इस उम्मीद के साथ यहाँ से जाते हुए एकबार बस एक नज़र दौड़ा रहे हैं। जैसे गाँव से लौटते वक़्त हम भागकर छत पर ज़रूर जाते। देखते, जो छूट रहा है, उसे तस्वीर के साथ अपने अंदर भरकर साथ ले जा सकें तो जेब में भरकर रख लेंगे। ताकि दोबारा आयें तो झट से जान जाएँ कहाँ-कहाँ क्या बदला? कितने हिस्सों पर पैबंद है? कितने सिरे पर आसमान के रफ़ू नए हैं?

नए की तलाश कौन नहीं करता? लेकिन इसे इस तरह कहना सबसे ज़रूरी है। इस कोशिश में जो सबसे ज़रूरी बात है, वह है, कहना। इतनी आपाधापी में एक पल के लिए भी इससे हट नहीं पाया। लिखना गालिब के ‘इश्क़’ और ‘काम’ के बीच झूलता रहा। इसने उस ‘सेफ़्टी वॉल्व’ की तरह काम किया, जो मेरे अंदर की बातों को चोर दरवाज़े से बाहर निकालता रहा। यह कभी भी दिमाग से उतरने न पाया। हरदम लगता रहा लिख नहीं रहा। पर इन लमहों को लिख लेना चाहिए। यह मेरी अपनी आवाज़ को सुने जाने लायक भाषा में तब्दील कर कह देने की अनदेखी कोशिश थी। इसने मेरे मन मेरी सारी अनुभूतियों को ठोस रूप में परिवर्तित कर दिया। ठोस होना ‘स्थूल’ होना नहीं है। स्थूल होना भोथरा हो जाना है। ठोस होना, छूने लायक बनाने की जद्दोजहद में जूझते रहना बनता गया। यहाँ जितनी भी बातों को कह पाया वह सब की सब इसी तरह की रही होंगी। ठोस, स्थूल, भोथरी। जो कहते हुए भी नहीं दिख रही, वह जब मिल जाएंगे, तब कहूँगा।

लेकिन सवाल है, क्या अब वह सवाल, सवाल नहीं रहे? इनके आज भी उसी रूप में होने के बावजूद क्या है, जो बदल गया है? कुछ तो होगा जो अंदर दरक रहा है। यह खिसकाना उन स्थापनाओं से आगे बढ़ जाना है या उनमें किसी तरह का संशोधन है। जितना इस लिखने के सैद्धांतिक आधारों को इधर पीछे कुछ जादा ही सघनता से सोच रहा हूँ, वहाँ देखने लायक बात है, इस तरह चलने की बात का ख़याल कैसे आया होगा? यह शायद शुरू से ही एक गरम हवा का गुब्बारा रहा होगा जो अपनी अधिकतम ऊंचाई पर जहाँ तक पहुँच सकता था, पहुँच चुका होगा। उसे किसी मानक में रूपांतरित नहीं किया पर फ़िर भी महसूस तो हो जाता है। हम एक ख़ास जगह पहुँचकर वापस नीचे देखते हैं। तब गलियाँ रेखाओं में और नदियां सड़कों में बदल जाती हैं। पहाड़ों पर चले जाना दृष्टिभ्रम का निर्माण करता है। ऊँचाई पर रहने की आदत हम मैदान वालों की नहीं रही। हम कुछ दिन जाते हैं, ऊपर से दुनिया देख भालकर वापस लौट आते हैं।

इस तरह लौट आने पर हम जान पाते हैं, वह क्या था(?) जो ऊँचाई से दिख रहा था, पर मैदान पर आते ही उसी दिख रही जगह में गुम हो गया। ‘गुम हो जाना’ हमारा शब्द है। उसे शहर, मैदान, जमीन किस तरह से कहेंगे, मुझे नहीं पता। जैसे ही मैं खो जाता हूँ, लगने लगता है बात जो शुरू की थी, वह भी पीछे छूटती जा रही है। इसलिए सही वक़्त यही है, रुक जाऊँ। रुकना फ़िर से अंदर देखने का मौका लाएगा। इसी उम्मीद से ख़ुद को समझने की कोशिश पर वापस लौटते हुए, लौट रहा हूँ। अलविदा। फ़िर पता नहीं कब मिलेंगे। मिलेंगे भी या नहीं मिलेंगे। पता नहीं। अभी बस जाना है। जा रहा हूँ।

(दोपहर: बारह पचास, तारीख़ वही। आज अट्ठाईस दिसंबर)

3.
मेरे पास जो वक़्त था, जो वक़्त नहीं था, उसे इकट्ठा करके इसे एक मुकम्मल जगह बनाने की हर कोशिश यहाँ दिख जाएगी। जो नहीं दिख रही, उसे मेरी और सिर्फ मेरी कमजोरी माना जाये। जितना देख देखकर पूछ पूछकर जानता-समझता गया, उसे अपने यहाँ शामिल करता गया। उन्हें इस जगह लाने की जद्दोजहद में डूबता, उतरता जितनी भी हैसियत रही, उतना कर पाने की इच्छाओं से ख़ुद को भर लिया। अभी भी भरा हूँ पर अब उस तरह की आग नहीं है। उत्प्रेरक जो रहे होंगे, वह अब काव्य हेतु, काव्य प्रयोजन जैसी जटिल संरचना वाले जटिल सवालों में तब्दील होते गए होंगे। सवालों का होना हरबार जवाबों की तरफ़ ले जाये, ऐसा होता नहीं है।

फ़िर यहाँ एक बात जो हमेशा अंदर चुभती रही, वह यह के यहाँ कभी हमारे परिवार की झलक नहीं दिखी तो यह मेरी सीमा है। ख़ुद को इतना अकेला कर लेने की हद तक चला गया कि हर बार जब कोई नया साथी मिलता, उसे लगता इस शहर में उसी कि तरह अकेला रहता हूँ। पर हुज़ूर, यहाँ लिखी हर एक बात के लिए जितने वक़्त की किश्त मुझे घर की चारदीवारी के बीच मिलती रही, वह मोहलत सिर्फ़ उनकी कीमत पर है। उसे कभी किसी तरह किसी भी रूप में तब्दील करके आँका नहीं जा सकता। घर न होता, तब चिंता होती। चिंता होती तो लिखना न होता। मेरे जिम्मे सिर्फ़ सुबह का दूध और शाम के वक़्त पानी भरने की ज़िम्मेदारी रही। बीच के दिन में घर कैसे बनता, बिगड़ता, बुनता, उधड़ता रहा इसकी ख़बर पास जाने पर मिलती। कभी बाज़ार या बाहर जाने की बात हो आती, तब अनमना होकर छटपटाता रहता। किसी तरह भाग भूग कर उसे निपटाते हुए ख़ुद को कोसता रहता। सोचता कि काश इससे बच जाता।

माता-पिता, भाई-बहन और डेढ़ साल से तुम। यह सब मेरे लिखे होने में इस कदर छिप जाएँगे, इसे लिखना भी पता नहीं कितनी अजीब बात है। इसे इस तरह कहने और स्वीकार करने में इतना वक़्त लग जाएगा कि आख़िरी पोस्ट पर आ जाऊँगा, कभी सोचा न था। जिसे अपना कमरा कहता रहा, उसके अंदर के एकांत को बनाए रखने में मुझसे इन सबकी हिस्सेदारी है। यह सिर्फ़ एक घर की बात नहीं है, उन सबकी बात है जो गाहे बगाहे यहाँ होते हुए भी सीधे उतरते हुए नहीं दिख पाये। यह शहर की संरचना या उसकी गतिकी को समझने का शास्त्र भले बना रहे हों पर उनकी स्थापनाओं को बिन पढ़े, मैं ख़ारिज कर रहा हूँ। क्योंकि जिस तरह हम इतनी पास से सब चीजों को देखते हुए उन्हें दर्ज़ करते रहे, उसकी तह में पहुँच कर थाह लेना उस किसी एक विषय के अनुशासन के बस की बात नहीं। वह सब किताबें हैं और हम किताबों से बाहर हैं। कौन देख रहा हैं हमें? कोई नहीं। इस तरह हम कभी किसी की नज़र में नहीं आने वाले।

यह लैपटॉप, जिसपर अभी कागज से देख देखकर टाइप करूँगा। अगर यह न आया होता, तब इस जगह का इस तरह से बन पाना कतई ऐसा न होता। न जाने कितने फ़ोल्डरों में वर्ड फ़ाइलें मनसदों की तरह पड़ी हुई हैं। आधी अधूरी बातों से अटी पड़ी उनकी कहानियाँ कभी नहीं कह पाया। इधर तो जैसे कहने के लिए सब अपने अंदर बाहर इस कदर परेशान रहे कि कितनी कहानियाँ कितने किस्से तो वहीं किसी ‘रफ़ ड्राफ़्ट’ की तरह कहीं पड़े होंगे। ऐसे कितने अनकहे हिस्से कई कई बार बिन देखे सीधे सीधे डिलीट हो गए होंगे। इनकी ऐतिहासिकता का ज़रा भी अंदाज़ा किसी को कभी भी नहीं लग पाएगा। और वह सारी बिखरी पड़ी तस्वीरें जिन्हें ढूँढ़ते-ढूँढ़ते लोग पता नहीं क्या कर जाते, मैंने उन्हें सहेजने, यहाँ लगाने से पहले लिखने से भी जादा वक़्त लगाकर कुछ भी गलत नहीं किया। वैसे ‘गलत’ यहाँ गलत शब्द है। पर इतने भावतिरेक में समझ नहीं पा रहा कि चीज़ें जैसे अंदर चल रही हैं, वह किस तरह कैसे भी करके हूबहू कागज़ पर उतरती चली जाएँ। लेकिन कितनी हद तक वह वैसे आ पा रही हैं, कह नहीं सकता। यह बिलकुल तय बात है कितनी ही बातें अधूरी रहकर छूट गयी होंगी। कितनी बातें कहकर भी कुछ नहीं कह पायी होंगी। कितनी बार न चाहते हुए भी लिखने को मज़बूर करते हुए जो सोचा, अब उसे कहने जा रहा हूँ।

इस अधूरेपन में जो बचे रहने की ख़्वाहिश है, उसे कोई नहीं देख रहा। मैंने देख लिया है इसलिए इस लिखने वाले अपने पहले इश्क़ को अधूरा छोड़कर जा रहा हूँ। इस जगह को छोड़ना कितना मुश्किल है, यह मेरे सिवा कोई और नहीं जान सकता। अभी तो कितनी ही दोस्तियाँ बनती, कितनी हज़ार बातें होती। हम ख़ुद किसी बात का किस्सा होकर कहीं रह जाते। पर सब संभावनाओं को टटोले बिना जा रहा हूँ। ऐसा कहते हुए भी दिल में अंदर से कुछ चिटककर टूट जाने जैसा कुछ है। टूटना सिर्फ़ इस संरचना का नहीं उसके जरिये मेरे अंदर घर कर गयी प्रक्रियाओं, ढाँचों, संघटनों, विघटनों से विलगाव भी है। अब सबको छोड़ कर चले जाना है। मन भाग रहा था, जब उन्होंने बाहर बुला लिया। बात कहीं अधूरी ही रह गयी। चलो कोई नहीं। अब चलते हैं। अलविदा। शब्बा ख़ैर।

वैसे यहाँ तक आते-आते मन उदास हो गया हो, तब आपके लिए नुसरत फतेह अली ख़ान की क़व्वालियाँ कुछ कर सकती हैं। पिछले कुछ दिनों से लगातार उन्हें दिन-रात, सुबह-शाम सुन रहा हूँ। सुकून ढूँढ़ने से मिलता है। लिंक है, साउण्ड क्लाउड का। लाहौर से। मेरा फ़ेवरेट ट्रैक, है कहाँ का इरादा तुम्हारा सनम

(साल वही, 2015। दिन वही, अट्ठाईस दिसंबर। वक़्त दोपहर के सवा एक बजे के लगभग।)

दिसंबर 27, 2015

अलविदा से कुछ पहले..

कल पूरी रात करवट-करवट नींद में सवाल थे और नींद गायब थी। मन में दोहराता रहा, अब बस। अब और नहीं लिखा जाता। कोई कितना कह सकता है। सच, इन पाँच सालों में जितना भी कहा है, मेरी दुनिया को समझने की मुकम्मल नज़र दिख जाती है। मेरे पास बस इतना ही है, मुझे अब यह समझ लेना चाहिए। यहाँ मैं वही पिछले साल की बातें नहीं दोहराना चाहता। दोहराते हुए कोई कितना असहाय लगता है। मैं भी ऐसा होता गया हूँ। आलोक से कहा तो कहने लगा, मत जाओ। ऐसे बहुत हैं, जो यही बात अलग अलग तरह से कह रहे हैं। अभी जब देवेश से कहा। वह भी यही कहने लगा। पर इस बार यह भावुक निर्णय नहीं है। न अचानक इस तरफ़ पहुँच गया हूँ। कुछ फुरसत मुझे भी चाहिए। थी तब भी नहीं, पर तब से लेकर कुछ तो है जो बदला होगा मेरे अंदर।

यह कहते हुए भी कितना अजीब लग रहा है, यह ब्लॉग, करनी चापरकरन अब बंद होने जा रहा है। हमेशा के लिए। इस पर दोबारा आने का मन हुआ तो भी नहीं आएंगे। उसी के लिए तो इतनी चिट्ठियाँ यहाँ टाँगे जा रहे हैं कि उनसे कोई एक साथ गुज़र नहीं सकता। लेकिन जाने से पहले कुछ जवाबों को देना और उन्हे जवाबों की तरह न कहना ज़रूरी है। इसलिए एक दो-पोस्ट इधर-उधर सब चलता है। पर साल ख़त्म होने से पहले इसे रोक देंगे। जब शुरू एक दिन हुए, तब एक दिन ख़त्म भी होंगे। ज़रूरी है एक दिन रुक जाना। थोड़ा बैठ कर पीछे देखना। ठहर कर देखना कहाँ से चले थे, कहाँ पहुँच गए।

2.
सबसे पहली बात तो यह कि ऐसा पता नहीं क्यों हुआ होगा कि मेरा लिखा इतना अमूर्त होता गया जिसमें कोई स्टैंड नहीं दिख रहा। शायद यह देखने वाले की नज़र का फ़ेर है, जो इनके पीछे उभरने वाली छवियों को देख पाने में असमर्थ हैं। उसका कहना है, जो कोई पक्ष नहीं लेते इतिहास और वक़्त उन्हें एक ख़ास खाँचे में बंद कर देता है। वह वही साँचा है, जिससे मेरी लड़ाई है। मुझे नहीं लगता उसने कहने से पहले जादा सोचा होगा। पर आज मैं ऐसी बात क्यों करने लगा। मुझे किसी से कोई प्रामाणिकता नहीं चाहिए। जैसा मैं हूँ, वैसा मुझे पता है। जो यहाँ आते रहे हैं, उन्हें भी थोड़ा बहुत अंदाज़ा होगा।

चलो छोड़ा। कुछ तात्कालिक दबाव भी होते होंगे, जो हमारे लिखने को इस तरह तोड़ते-मरोड़ते रहे होंगे। एक बार की बात है, हिन्दी ब्लॉग के दस साल हो जाने वाली मेरी पोस्ट पर लंदन से अनुराग शर्मा कुछ-कुछ नाराज़ हो गए। मैंने कुछ कह दिया था। उस शुरुवाती दौर में सब प्रवासी थे और वे सब इस ख़ास तकनीक तक पहुँचने में सक्षम रहे। उनके मनों में हिन्दी अपने दिलों में देश की सुगंध जैसी महक रही थी। वहीं मैंने उनकी टिप्पणी पर तल्ख़ होते हुए फ़िर जवाब दिया था शायद। पता नहीं उनका गुस्सा अब भी उतरा है या नहीं। तबसे उनसे बात नहीं हुई है। ऐसे ही एक समीर लाल की उड़नतश्तरी थी। जहाँ तक मैंने कभी पहुँचने की कोशिश नहीं की। काकेश की कतरन, लपुझन्ना, तानाबाना, अखाड़े का उदास मुगदर, मोहल्ला पता नहीं कितने और नाम मन में इधर उधर हुए जा रहे हैं। पता नहीं हिन्दी ब्लॉग अपने पाँच साल में ही कहाँ खो गया। यह वही वक़्त था, जब मैंने अपने लिए पाँच साल माँगे और यहाँ आ गया।

3.
वैसे यह बिलकुल वैसा ही था जैसे हम ढलते हुए सूरज को देखते रहें। पर महसूस इन गुजरते सालों में बहुत बाद में करते हुए ख़ुद डूब जाएँ। एक एक कर सब जाने लगे। सतीश पंचम का सफ़ेदघर मुझे अपने गाँव जैसा लगता। मैं भी सोचता कभी ऐसा हम भी लिखा करेंगे। पता नहीं यहाँ कभी ऐसा कर भी पाया के नहीं। मसिजीवी एक कल्ट ब्लॉग था। पर विजेन्द्र की लद्दाख वाली पोस्ट में उनका लगाया पिकासा का एलबम कहीं यादों में टंका रह गया। वह उतरा ही नहीं। उदय प्रकाश भी ख़ूब लिखा करते। यह हमारे पढ़ पढ़कर सीखने के दिन रहे। उन्हीं दिनों अपने मन में मैंने सागर से शर्त लगाई। तुम्हारी तरह हम भी लिखकर रहेंगे। अब जबकि वह भी यहाँ से गायब हैं, यहाँ रुके रहने का मन नहीं होता। एक पूजा बची। जो बैंगलोर में भी दिल्ली, देवघर, पटने की याद को लेकर बैठी हुई है। तुम्हारी किताब बढ़िया है पूजा संदीप तुम्हारा नाम कई बार लेता है। अच्छालिखती हो तुम।प्रमोद सिंह अब चुप हैं। रवि रतलामी से हम तब मिले, जब वे रतलामी में से श्रीवास्तव हो गए और उन्होंने लिखने के लिए आदम हौवे की ओट ले ली। उन्होंने ओट क्या ली, लिखना ही छोड़ दिया।

अनूप शुक्ल जी का फ़ुरसतिया इसके तो कहने ही क्या। कानपुर से अब उसी जबलपुर की सरकारी फैक्ट्री में हैं, जहाँ किसी दौर में ओमप्रकाश वाल्मीकि रहे थे। ज्ञानरंजन से लेकर पता नहीं किन-किन से मिलते रहे। अब जबकि अनूप जी की पुलहिया किताब आ चुकी है, उन्हें ऐसी और किताबों के लिए अग्रिम शुभकामनायें देते हुए लौट जाने को हूँ। इसी साल जनवरी में कानपुर जाने से पहले बात हुई थी। उसपर पोस्ट ड्राफ़्ट में पड़ी रह गयी। पूरब का कलकत्ता है कानपुर

ऐसे ही इसी सालसागर का एक शनिवार दफ़्तर से निकलते हुए फ़ोन आया। पहले तो नंबर नया था इसलिए पहचान नहीं पाया, फ़िर उसकी ब्लॉग पर लगाई  राजेन्द्र यादव की किताब 'मुड़-मुड़ के देखता हूँ' की ऑडिओ क्लिप से तुरंत मिलान कर आवाज़ पहचान गया। सागर ही थे। पता नहीं ऑफिस शायद निज़ामुद्दीन ईस्ट या वेस्ट में था। और रहते शायद भोगल में हैं। अपनी रानीजान के साथ। कितना कहा, पर तुम माने नहीं। लिखने के लिए साथ की ज़रूरत होती है। तुम नहीं लौटे इसलिए अब मैं ही लौट रहा हूँ। जैसे चार साल पहले आलोक और मैंने एक साथ फ़ेसबुक के लिए लिखना कम कर दिया था और हम यहाँ आ गए थे। अब मैं यहाँ से जा रहा हूँ। बस कुछ यादें बेतरतीब आए जा रही हैं, उन्हें कहने का मन है। और कुछ नहीं।

4.
यह ब्लॉग भी अजीब जगह है। हर वक़्त दिल पर हावी। मन कहीं लगता ही नहीं हो जैसे। कहते हैं, ऐसी हालत में कहीं आते-जाते नहीं। पर मैंने सोच लिया है, यहाँ से अब चलने का वक़्त आ गया है। सही वक़्त पर न करो तो काम रह जाते हैं। समझ तो हम बहुत पहले गए थे, पर थोड़े जिद्दी थे। लेकिन लगता है, अब ज़िद काम नहीं कर रही। उसने साथ छोड़ दिया है। अधूरी बातों की तरह इसे भी यही छोड़ देंगे। जैसे कल रात एक और पोस्ट जुड़ गयी और इस तरह कुल जमा रफ़ ड्राफ़्ट हुए सत्तासी। किन्ही में तस्वीरें लगी हैं, कुछ में दस-दस बीस-बीस लाइनें। कई मज़मून ऐसे ही डायरी में पड़े रह गए हैं। उन्हें ऐसे ही रख देंगे। छुएंगे भी नहीं। क्या करेंगे कहकर। बहुत कह लिया। अब चुप रहकर सुनने का वक़्त है। सुनने का भी अपना मज़ा है। हम भी कभी इन दिनों को यादकर कभी कहेंगे, एक दौर वह भी था, जब हम भी यहाँ लिखा करते थे। इसने भी हमें नक्कारखाने में कुछ हैसियत दी थी।

लेकिन यहाँ से जा रहा हूँ, तो इसका मतलब यह नहीं कि मेरी सारी क्षमताओं को मैंने उसकी अधिकतम सीमाओं तक लेजाकर छोड़ दिया। यहाँ रहता तो होता कुछ और। पर सच में इस नाम की छवियों ने अंदर तक तोड़ कर रख दिया है। और इतना लिखकर यह लग रहा है, बीती उनतीस दिसंबर दो हज़ार चौदह को यही सब बातें आने से रह गयी होंगी, जिसके एवज़ में साल भर और गाड़ी चल गयी। वरना यहाँ से जाने का मन जितना तब था, उससे कुछ कम अभी महसूस कर रहा हूँ पर जाने के कारण ज्यों के त्यों बने हुए हैं। उनका होना मुझे लगातार तोड़ रहा है। जैसे कितनी ही बातों से इसने न जाने कितने ढाँचों, स्थापनाओं, विचारों, भावों, वृत्तियों, इच्छाओं को तोड़ा और उन्हें फ़िर से बुनते हुए सामने रखा। यह नाम अपने अंदर तोड़ने की जितनी क्षमताओं को रखता है और उसका जितना ताप मैं महसूस करता हूँ उसका एक सिरा भी कभी यहाँ नहीं कह पाया। जूझता रहा कहने के नाम पर। छटपटाता रहा। साँसें ऊपर नीचे होती रहीं। पर यह नामाकूल कहीं भी रुकने का नाम नहीं ले रहा। इसलिए इसको तोड़ने का मन हो रहा है। इसको तोड़े बिना मैं ख़ुद को समेट नहीं सकता। हो सकता है, आपको मेरे मन की परतों की कोई थाह नहीं लग रही हो पर यह मेरे लिए किसी भी बनी बनाई संरचनों को तोड़ने वाले साधन के रूप में मिला था।

जिस दौर में यह मिला था, उस वक़्त हवा में भी कुछ इसी तरह की बातें तैर रही थी। लेकिन इतनी साफ़-साफ़ दिखती वजहों के भी अगर आप समझ नहीं पा रहे तब मैं यही कह सकता हूँ कि अब कागज़ पर लिखने का मन है। कागज़। जहाँ से हम शुरू हुए थे। जहाँ हमने लिखना सीखा था। ऐसा नहीं है यहाँ लिखना नहीं सीखा। लेकिन जितना कहा, उससे जादा उसे छिपाना सीखा। उसकी परछाईं से भी तो कभी-न-कभी निकलने की जरूरत होती है। सही वक़्त तभी होता है, जब आप समझ जाएँ। समझ समझ का फ़ेर है। शायद मैं समझ चुका हूँ। इसलिए जा रहा हूँ। जाना ज़रूरी है।

जाते-जाते सबसे ज़रूरी बात यह कि इसे किसी भी तरह से पलायन न समझा जाये। पलायन होता तो ऐसे कहकर नहीं जाता। चुपके से चला जाता। बताता भी नहीं। यह लिखना मेरे उन दिनों का दस्तावेज़ है, जब मैंने ख़ुद अपने आपको समेटकर कछुआ बना लिया था। कछुआ अपने मन से अपने अंगों को बाहर निकालता है। मैं भी सिमटकर एक कमरे में बंद हो गया। इस ब्लॉग ने मेरे अंदर एक खिड़की बनाई। जिससे मैं अपने अंदर झाँक सका। देख सका, वहाँ भी एक दिल धड़कता है। किसी को छूने, उससे बात करने इसके साथ कुछ दूर चलने की इच्छाएँ साँस लेती हैं। दिल अभी भी पुरज़ोर धड़क रहा है। वहाँ अब तुम हो। हमारे अनदेखे सपने हैं। तुम कहती हो मैं इसे नहीं छोड़ पाऊँगा। पर देखो आज मैं जा रहा हूँ। और तुम भी देख लो जो हम चुपके चुपके एक दूसरे के नाम बेनामी ख़त रख छोड़ा करते थे अब उसके लिए भी कोई बहाना नहीं छोड़ रहा। सिकहर पर यह लौटने से पहले की अलविदा है बस।

5.
जैसे जनसत्ता से हमारे छपने के दिन चले गए, अब अंदर से लिखने का मन नहीं हो रहा। लेकर भी तो इतना ही वक़्त लाया था। और सही सही हिसाब लगाऊँ तो वह पहली नौ पोस्ट तो एक बटन दब जाने से ऐसी गायब हुई थी कि आज तक हाथ नहीं लगीं। दिसंबर से दिसंबर। पूरे पाँच साल। अब चलते हैं। समांतर जुलाई एकतीस दो हज़ार पंद्रह को बंद हुआ। दिल टूट कर बिखर गया हो जैसे। पहली बार लगा जैसे हमारा घर कहीं चला गया। अब जहाँ हम छप सकते थे, वही जगह नहीं बची तब यह ब्लॉग बचकर क्या करेगा। आप सबको लग रहा होगा कैसी बचकानी बातें हैं। पर यह सच है। कुल जमा पंद्रह पोस्ट थीं जब हम जनसत्ता में पहली बार छपे थे। प्रभाष जोशी के कागद कारे वाला जनसत्ता। वह जनसत्ता जिसने हममें ताकत भरी। जिसके कारण हम लिखने की ताकत समझ सके। हम बिना किसी की पूंछ पकड़े वहाँ के संपादकीय पृष्ठ पर थे।

हम भी ख़ुद को कुछ समझने लगे थे। लगा था हम भी कह सकते हैं। पर सिर्फ़ जनसत्ता। हमने रवीश कुमार के हिंदुस्तान में छपने वाले कॉलम ‘ब्लॉग वार्ता’ के अवसान काल में लिखना शुरू किया। एक सेलेब्रिटी एंकर पत्रकार जिन जिन के ब्लॉग पर लिखता गया वह सब जैसे छाते रहे। आज अधिकतर ऐसे छाए हैं कि बंद छातों की तरह दरवाज़े के पीछे पड़े धूल खा रहे हैं। समझ में आने लगा यह पवार स्ट्रक्चर का खेल है सारा। वरना मेरे पास भी अनुराग वत्स की तरह नवभारत टाइम्स में नौकरी होती तो मेरा भी कोई सबद जैसा ब्लॉग होता। कुँवर नारायण की गद्द्य की किताब ‘रुख़’ का संपादन मैंने किया होता। गीत चतुर्वेदी की कवितायें मेरे ब्लॉग पर लगतीं। चन्दन पाण्डेय की कहानीरिवाल्वर  पीडीएफ़ में मैं शेयर करता।

मेरा वितान थोड़ा कम होता तब पाखी के अविनाश मिश्र  का उप-सम्पादन मेरी कलम कर रही होती। दिल्ली हिन्दी अकादमी की मैत्रेयी पुष्पा मुझे शायक आलोक और प्रांजल धर की तरह पन्द्रह मिनट के कविता पाठ के लिए दस हज़ार रुपये के मानदेय वाला लिफ़ाफ़ा बढ़ाते हुए शुभकामनाओं से लाद देतीं। वरना ऐसा क्या है, प्रवीण पाण्डेय की बोझिल, इकहरी, उबाऊ कविताओं में कि उनकी हर बर्बाद कविता पर टिप्पणी की बौछार होती रहती है। और हम ऐसा लिखते हैं, जो किसी की समझ में नहीं आता। इतना समझने पर भी समझ नहीं आता मामला क्या है? क्या मामला इतना ही है?

6.
यह क्या हो गया है मुझे? जो बातें आज तक नहीं लिखीं उन्हें आज कहने का कोई मतलब नहीं। पर फ़िर भी कहते हैं, जाते-जाते जो मन में हो, उसे कह देना चाहिए। अच्छा रहता है। मैं किसी तुलनात्मक अध्ययन में नहीं पड़ना चाहता। हो सकता है, यह ऊपर लिखे नाम किन्हीं असली व्यक्तियों के हों। पर इनके नाम भी यहीं हैं, इससे कोई फ़रक नहीं पड़ता। जो तंत्र इस सारी गतिकी को नियंत्रित कर रहा है, उसमें दीमक इस कदर लग चुकी है कि भले उसके दरकने में अभी थोड़ा वक़्त हो पर एक दिन उसे ख़त्म होना ही पड़ेगा। नाम बदल जाएँगे पर तंत्र उन बदले हुए नामों को भी ऐसे ही खड़ा करता रहेगा। ज़रूरी नामों का नहीं, तंत्र के चरित्र के बदलने का है। यह जितनी भी जगहें ऐसे भरी हुई थीं, उनमें सेंध लगती हुई यह जगह अब चुक गयी है। इसलिए इसे बंद होना ही था। बंद होना विचार का मर जाना नहीं है। विचार तो यहाँ अमेरिका के इस गूगल के अन्तरिक्ष में कहीं टिकाये, समुद्र के नीचे बिछी तारों के जरिये किसी अनाम सी मशीन से जुड़े सर्वर में तब तक रहेंगी, जब तब वह चाहेंगे। क्योंकि मेरा ब्लॉग बंद करने का मन है, डिलीट करने का नहीं। जब तंत्र इस कदर दुरभिसंधियों से अटा पड़ा हो वहाँ हम जैसों का कोई काम नहीं। इसलिए हम अपने काम पर लौट रहे हैं। काम ज़रूरी है।

इससे जादा अब कहने का मन नहीं है। पर मुझे पता है, यहाँ से चले जाने के बाद किसी को कोई फरक नहीं पड़ेगा। जब मैं यहाँ था तब कौन सा पहाड़ रोज़ टूट रहा था जो मेरे यहाँ से चले जाने के बाद उसमें भूस्खलन की आवक में तीन गुना की वृद्धि होने जा रही है। जो मन में था, उसे वैसा ही कहने की कोशिश की है। बुरा लगा तब भी मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा। उनकी इतनी हैसियत नहीं कि कुछ भी कर सकें। वैसे सच कहूँ तो पाँच साल बाद इसे बंद करना ही था। अब थोड़ी किताबें पढ़नी हैं, थोड़ा कागज़ पर लिखना है और थोड़े बाकी रह गए काम पूरे करने हैं। वक़्त कहीं से तो निकालना था, निकाल लिया।

दिसंबर 23, 2015

धुँधली रात की रौशनी और लप्रेक के बहाने कुछ बे बात

कभी लगता है, एक दिन ऐसा भी होगा जब यहाँ लिखा हुआ एक-एक शब्द कभी किसी के समझ में नहीं आएगा। जैसे मुझे अभी से नहीं आ रहा। यहाँ की लगती गयी तस्वीरें इन सालों में जितनी ठोस, मूर्त, स्पष्ट हुई हैं, उसी अनुपात में सत्य उतना ही धुँधला, अधूरा, खुरदरा होकर मेरे भीतर घूम रहा है। घूमना, सिर्फ़ दिमाग की नसों में नहीं बल्कि किसी को न जताते हुए चले जाने के बाद उपजे खालीपन से घिर जाने के बाद की कचोटती स्थिति है। एक अजीब तरह का ‘नेक्सस’ दुरभिसंधि बनकर हमें मूल्यहीन साबित करने पर तुला हुआ है। वहाँ दूसरी तरफ़ दावे हैं, एक भरा पूरा भ्रष्ट तंत्र है, जो उन्हें खड़ा करने में सहायक की भूमिका में है। इन अमूर्त और समझ में न आने वाली बातों में वह कभी नहीं समा सकते। वह थोड़े-थोड़े पूंछ के साथ बाहर ही रह गए हैं। पूरे अंदर नहीं आ पाये हैं। घोंघे की तरह आ रहे हैं। धीरे-धीरे। आहिस्ते से।

यह ‘सापेक्षता’ का नया सिद्धान्त गढ़ रहे हैं, जिसकी रौशनी में हमें खुद को साबित करने की लड़ाई नए सिरे से नहीं, नए औजारों और नयी तकनीकों के साथ लड़नी होगी। ऐसी लड़ाई जो दिखेगी नहीं पर वह हमारे सामने ही होगी। उनके पास औपनिवेशिक भाषा है। हर वह भाषा जो किसी-न-किसी को दबाकर आगे बढ़े वह इसी चरित्र की भाषा है। वह हिन्दी वाले हैं, पर उनकी पहुँच उनतक है, जहाँ से वह इस दुनिया को नए तरह से कहने का सहूर सीखते हुए सीधे हम तक पहुँच गए। एक ख़ास तरह का ‘फ़ेवरीज़म’ सबके सिर पर चढ़ कर बोल रहा है। हम माने न माने, पर यह है।

हम जो कुछ भी लिख रहे हैं, उसका कहीं कोई नोटिस नहीं ले रहा। हम तो खाना खाने के बाद उठते हुए अपने चूतड़ों पर हाथ पोंछने वाले ‘मिडीयॉकर’ ठहरे। हम नाक में उँगली डालते हुए सोचते हैं। पता है, कुछ नहीं हो सकता। यह दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी। हमने ख़ुद कभी इस तरह नहीं बनाया। ‘लप्रेक’ हम भी लिख लेते अगर हमारे पास तब इंटरनेट की पहुँच होती। ऐसा कहकर मैं इस पूरे लिखे हुए को ख़ारिज़ नहीं होने दे सकता। इसलिए नहीं लिख रहा। यह एक विधा के निर्माण की उत्तर आधुनिक पूर्वपीठिका भले हो पर हम इस ब्लॉग को कभी मुख्यधारा में नहीं ला सके। इसे समझने की ज़रूरत है।

2.
हम एक ऐसे दौर में हैं, जहाँ हम पाठक को एक कमज़ोर कमजर्फ़ संस्था में परिवर्तित कर रहे हैं, जिसकी मानसिक योग्यता पर सबने शक किया है। उसकी रुचि, अभिरुचि, स्वाद, चिंतन, जीवनशैली, अवकाश, रिक्तता, एकांत, दृष्टि, मूर्त अमूर्त विषयों को निर्मित करने में पूंजीवादी, उपभोक्ता, नवउदार, नव साम्राज्यवादी संस्कृति गढ़ रही है। जहाँ उसकी स्वतन्त्रता कहीं चिन्हित भी नहीं हो पा रही। जिसके साथ वह पहली बार संभोग करने की इच्छा से भर जाता है, वह उसे नाचती-गाती, पीठ उघाड़े, रुपहले पर्दे पर पीवीआर सिनेमा हाल के अंदर घुप्प अँधेरे में मिलती है। उसी पल वह जिसके साथ गया है, उसके लिए ऑनलाइन शॉपिंग से ख़ास आकार के कपड़े खरीदने की इच्छा से भर गया है। हमारी इस आदिम इच्छा का इससे विद्रुप रूप कोई और नहीं रच रहा। हम ख़ुद रच रहे हैं। बचपन से एक ख़ास तरह से सोचने और अंतिम निष्कर्षों पर पहुँचने वाली तर्कशास्त्रीय पद्धति पहले ही दीमकों द्वारा चांटी जा चुकी है। अब हम सिर्फ़ एक दर्शक हैं। जिसके पास दिमाग तो है पर उसके व्यवस्थापक हम नहीं हैं। पढ़ना तो खैर बहुत बाद की संस्कृति का हिस्सा है। जब हमारे पास पैसे से लेकर फुर्सत से बैठने की जगह हो। इसका मतलब यह नहीं है, हमारे पास एक समझ भी है, जिसका हम इस्तेमाल करने वाले हैं।

3.
यह सिर्फ़ फ़ेसबुक या ऐसे किसी माध्यम से निकले ‘टेक्स्ट’ नहीं बल्कि जनसंचार माध्यम में चर्चित एक ख़ास रुझान वाले व्यक्ति की रचना है। जिसके पास ‘बेस्टसेलर’ होने की संभावना पूर्वनिहित है। यह उनकी आलोचना नहीं, बल्कि उनके पेशे में निहित सुविधा को समझने की कोशिश है। आप उस देश और काल के लेखक हैं, जिसने लिखना पहले चुना या टीवी पत्रकारिता(?) यह सवाल स्थगित भी रखा जाये, तब हमें इसे उल्टे सिरे पर जाकर फ़िर से रचना चाहिए। क्यों एक प्रकाशक किसी ख़ास व्यक्ति को चुनता है। यह कोई छिपा हुआ भेद नहीं, जिसे कोई नहीं जानता हो। हम संभावनाओं को बना नहीं रहे। उन्हें टटोल भी नहीं रहे। हम पहले से बने बनाए खाँचों में ‘सार्थक’ बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इसे हमें और किस तरह से देखना चाहिए? क्या यह इस माध्यम में लिख रहे लोगों के लिए एक शुरुवात या किसी मंच का काम करेगा या ऐसी किसी भूमिका में आने की संभावनाओं को रेखांकित किया जा सकता है? मुझे नहीं पता। पता नहीं यह सवाल भी हैं या नहीं इसी बात को लेकर बहस न होने लगे। जो लोग इसे मेट्रो में हिन्दी की किताब को हाथ में लेकरपढ़ने के किस्से  रच रहे हैं और इसे सीधे सीधे अँग्रेजी बाज़ार से टक्कर लेती घटना बता रहे हैं, उनसे मुझे ख़ास संवेदना है। उनका कुछ नहीं हो सकता। वे ऐसे ही रहेंगे।

यह प्रिंट माध्यम के लोकतान्त्रिक होने की मिसाल नहीं, उसके पुनरुत्पादन के मॉडल पर चलने की एक और कहानी है। बात साफ़ है, इसने उसी स्पेस को बनाया है, जिसमें हमइंडियन एक्सप्रेस, क्विंट  औरअमेरिकन बुक रिव्यू  में इस लप्रेकगाथा  को पढ़ रहे हैं। यह इसके अलावे कुछ और नहीं है। हम बाहर थे। बाहर ही रहेंगे। हमारे अंदर आने में अभी वक़्त है। फ़िर बाक़ी जो बच गया, उसे कभी बाद में। हर बात कह दी जाये ज़रूरी नहीं। इसलिए अबभी नहीं।

किताबें, धूप, हड़बड़ाहट, अकेलापन और आईनाघर की भूमिका

वह एक खाली-सी ढलती दोपहर थी। दिमाग बेचैन होने से बिलकुल बचा हुआ। किताबें लगीं जैसे बिखरी हुई हों कहीं. कोई उन्हें छूने वाला नहीं था. कभी ऐसा भी होता, हम अकेले रह जाते हैं। किताबों के साथ कैसा अकेलापन. उनकी सीलन भरी गंध मेरी नाक के दोनों छेदों से गुज़रती हुई पता नहीं किस एहसास को भरे दे रही थी. वहीं अपने मोबाइल को निकालकर उन क्षणों को अपनी आवाज़ के साथ कैद कर लिया. मानो वक़्त कहीं थम सा गया हो. हम जितना भी चाहें, इन क्षणोंको इन्हीं तरहों से कैद कर सकते हैं. कोई और तरकीब हमारे दिमाग में होती, तो वह इनसे कुछ मिलती जुलती ही होती, कह नहीं सकता.

दिसंबर 22, 2015

मेरा पता है कि लापता हूँ मैं..

कभी होता, उसके खर्राटों से वह ख़ुद जग जाता। जग जाता के साथ लेटे सब न जग जाएँ। सबके सोते रहने पर वह उठता। उठकर बैठ जाता। बैठना, थोड़ी रौशनी के साथ होता। रात उस खयाल में ख़ुद को अकेले कर लेने के बाद खुदसे कहीं चले जाने लायक न बचता, तो ख़ूब रोता। आँसू नहीं आते। याद आती। याद आती उसकी हर बात। हर बात पर रुक जाने, लौट जाने से कुछ नहीं होता। रात अँधेरे में उसे कुछ नहीं दिखता। दिखना सिर्फ़ अँधेरे में नहीं होता। उजाले में भी नहीं होता कभी।

तब कुछ सोचकर पहले उसने कहा। फ़िर उसने लिख दिया। एक दिन शब्द बचे रहेंगे। स्याही सूख जाएगी। कागज़ सुर्ख़ गुलाबी होंठों की रंगत से कहीं आगे बढ़कर पीले उदास होकर रह जाएँगे। रंगत सिर्फ़ चेहरों से नहीं उड़ती, उसके साथ उड़ती है खून में बह रही गर्मी। ठंडे खून में मौसम की ठंडक होगी। रंग होंगे पर रंगत न होगी। एक दिन उसे एहसास होगा, वह कितना गैर ज़रूरी था। यह बिन जताए इस दुनिया से चले जाने की सबसे पहली तय्यारी रही होगी। जब उसने मन में ऐसे ख़याल भर लिए होंगे, वह थोड़ा प्यास से भर आया होगा। उठा होगा। थोड़ा रज़ाई से सिर निकालकर पानी को खाली बोतल देखते हुए वापस अंदर दुबुक गया होगा। नाख़ुन कई दिन हुए नहीं काटे। नेलकटर कहाँ गया। अभी तो यहीं था। परसो। इंडियन एक्सप्रेस के नीचे। छिपा हुआ। यहीं होगा। उसने ढूँढ़कर देखा। नहीं दिखा। नहीं दिखा उसे कुछ भी।

उसने ख़ुद को गायब करने के बाद अपनी दीवार पर लिखा, 'पता लगाए कोई क्या, मेरे पते का पता..'। तब से वह गायब है, इस दुनिया से..!! सवाल है, कोई ढूँढ़ रहा है उसे? शायद थोड़ी उसकी परछाईं, वो दरवाज़े के बाहर बालकनी में खड़ी लड़की। उसकी अनकही बातें। थोड़ी खिड़की की सिटकनी। थोड़ी खिड़की ख़ुद।

दिसंबर 18, 2015

मन भाग रहा है..

मन भाग रहा है। पता नहीं क्या है, जिसके न होने से लिख नहीं पा रहा। अजीब-सी स्थिति है। कभी मन करता है, एक एक अधूरी पोस्ट खोलकर उसे पूरा करता जाऊँ। पर नहीं कर पाया। वहाँ से वर्ड में लिखने बैठा हूँ तो अब बाहर निकल कर घूम आने को जी चाह रहा है। शुक्रवार शाम पौने सात बजे इस तरह परेशान होने से बचने की कोई तरकीब मेरे पास नहीं है। मुझे भी पता है, कुछ होना जाना है नहीं। इसलिए जबर्दस्ती लिखने बैठ गया। बाहर जाकर भी क्या करूंगा? कोई भी तो वहाँ नहीं होगा। जो भी है, मन में है। मन सबसे बड़ी बीमारी का नाम है। लोग मन को मनाने के लिए पता नहीं क्या-क्या करने लगते हैं। मैं उसकी ऐसी-तैसी करने लगता हूँ।

बातों-बातों में वह कहने लगी तुम इधर जब भी लिख रहे हो, तुम्हारे लिखने में एक पुरुष की गंध है। वह पुरुष, जो स्त्री को बहुत कोमलता से अपने मन में उकेरता है तो उसकी बुनावट में भी वही रूढ़िबद्ध छवियाँ हावी हो जाती हैं, जिनसे इस खास तरह के दौर में हमारा टकराव है। स्त्रियाँ हमेशा ऐसी ही आती रहेंगी, तब काम कैसे चलेगा? पता नहीं मैंने कैसे कुछ-कुछ कहकर तुम्हें उलझाए रखा। कह दिया, कभी-कभी मन को खुला छोड़ देने पर बिन परत, उस सतर्कता के अभाव में जो कुछ भी उन पन्नो पर आता है, वह भी तो मेरे मन के भीतर चलने वाली प्रक्रियाओं को किसी हद तक कहता होगा। वह मेरे लिए एक 'टेक्स्ट' है। मैं ख़ुद को समझने के लिए उन सुरागों को वहाँ छोड़ देता हूँ। कभी मेरे नहीं तो किसी के काम तो वह आएंगे। और भी पता नहीं कौन-कौन सी बवाल बातें।

इस बात को तो मैं डायरी में लिखना चाह रहा था, यह यहाँ कैसे आ गयी। हफ़्ते भर बाद भी वहाँ कोई एन्ट्री नहीं है। चलो जाने देते हैं। तुम लिखती नहीं और मैं लिख रहा हूँ तो यहाँ सबके सामने तुम्हारी बात लेकर बैठ गया। पता नहीं तुम इसे पढ़ते पढ़ते क्या सोच रही होगी। मैं सोच रहा हूँ, उस लड़के के बारे में जो उस दिन ग्वायर हाल की कैन्टीन में अपने वापसी के समान के साथ वहाँ मौजूद था। उसकी ट्रेन साढ़े नौ बजे थी। गले में मफ़लर डाले उसकी चमकती आँखें कुछ और ही कह रही थीं। हम ऐसी जगह हैं, जहाँ हम अपने मन की बात फ़ोन के अलावे किसी और से साझा नहीं कर सकते। मन वही, जिसे हम अपनों के सामने खोलते हैं। उसकी आँखें सपनों से भरी हुई हैं, उसकी आवाज़ में आने वाले कल सच हो जाने वाले ख्वाब ख़यालों की तरह तैर रहे हैं। उसने किताबों को अपना साथी बनाया। उसके पास ऐसी कहानियाँ हैं, जिसे वह लिखना भी चाहे, तब भी उस गति से वह नहीं लिख पाएगा, जिस गति से वह उसके दिमाग में कौंध जाती होंगी। तुम भी कहाँ लिखना शुरू कर रही हो। बहाने बनाती हो बस। कभी लिखना, मन मारकर।

बहाने सब बनाते हैं। वक़्त नहीं है। क्या करूँ लिखकर। कोई पढ़ लेगा तब। पता नहीं, जितना दिमाग इन सब बातों को कहने में निकाल देते हैं, उतने में तो पता नहीं क्या-क्या कह दूँ मैं तो। मैं कभी बातों से खाली नहीं होना चाहता। मैं चाहता हूँ, भले लिख न सकूँ पर मन लिखने को होता रहे। मैं कह कह कर उन्हें अपने भीतर रख लूँगा। भीतर रख कर उन्हें भूलता रहूँगा। कई बातें भूल जाने लायक होती हैं। जैसे यह साल भूल जाने की सारी हदें पार कर चुका है। इन हद निहायत बेकार दिनों के गुज़र जाने में अभी भी कुल दो हफ़्ते बचे हुए हैं। यहाँ नहीं कह सकता। पर न मालूम कितनी बार डायरी में लिख लिख कर अपने दिल को मना चुका हूँ। साल दो हज़ार पंद्रह, तुम कभी लौट कर भी मेरी यादों में मत आना। कोई ऐसी जगह होती तो सच में उस जगह जाकर कल तक जितने भी दिन इस साल से चले गए हैं, उन्हें अपने मन से मिटा देता। मिटाने के लिए हमेशा हमारे पास बहुत सारी बातें होती हैं, पर दुख के दिन इतनी आसानी से मिटते नहीं। मैं भी फरवरी से कोशिश कर रहा हूँ, नहीं चाहकर भी उसमें फँस जाता हूँ। तारीख़ थी दो फरवरी। दिन सोमवार। वक़्त यही कोई दोपहर का रहा होगा। मुझे पता है, एक दिन तारीख़ धुँधली पड़ जाएगी पर वह एहसास दिल में चुभता रहेगा।

तभी मैं नहीं लिखता, बिना त्ययारी। पता नहीं कौन-सी बात कब कहाँ से निकल कर सामने आजाये। जैसे कितने दिन हो गए पूजा, तुम्हारे लिए एक ख़त अंदर ही अंदर उमड़-घुमड़ रहा है। तुम कहानियाँ कहती, पर ऐसा क्यों होता है, तुम्हें ढूँढ़ने लगता। तुम जब नहीं मिलती, तब बैठ जाता। नहीं समझ पाता, क्यों हो रहा है, इधर ऐसा, बहुत जादा। शायद उस ख़त में भी इतनी पंक्तियाँ होती। और तुम सागर, तुमसे तो बाद में निपटता हूँ। तुमने संदीप को पढ़ा कभी? पढ़कर देखना। तुम जैसे ख़ुद को देख रहे होगे। ख़ैर अभी जाना है। नीचे। सीढ़ियों से। आहिस्ते-आहिस्ते। बल्ब फ्यूज़ हो गया है।

दिसंबर 15, 2015

लिखने से पहले..

दुनिया कितनी बड़ी है। इसके बीतते एक एक पल में इतनी सारी चीज़ें एक साथ घटित हो रही हैं, जिन्हें कह पाने की क्षमता मुझ अकेले में नहीं है। लिख तो तब पाऊँ जब उनतक मेरी पहुँच हो। दरअसल यह बात मुझे मेरी औकात बताने के वास्ते है। मैं कोई इतना दिलचस्प या गंभीर लेखक या अध्येता नहीं हूँ कि हर गुज़रते एहसाह को कह पाऊँ। जो लिख लेते हैं और ऐसे दावों से घिरे रहते हैं, वह कोई और लोग होंगे। मुझसे ऐसा झूठ नहीं बोला जाता। क्योंकि इतना सब एक साथ महसूस करने की अपनी हैसियत नहीं। एक छोटा सा दिल है, उसी से परेशान रहता हूँ। सबकी कहने लायक भाषा भी तो नहीं मेरे पास। थोड़ा बहुत जो कह पाया हूँ उसी में इतने छेद हैं कि न पैबंद लगाने लायक सामान जुटा पाया न उस पयेजामे को पहनकर बाहर घूम सका।

जितना भी आज तक लिखा है और आगे भी कहने की कोशिश करूंगा, उनमें से एक-एक बात मुझसे होकर गुज़रेगी। मेरी आँखों से देखी दुनिया। कहीं कोई इस बात पर अड़ न जाये इसलिए पहले कहे देता हूँ, ऐसे होने से ही यह व्यक्तिनिष्ठता को अपने अंदर गुथे हुई है। कोई बाद में यह न कहे, हमारी दुनिया इससे काफ़ी अलग दिखती है। ज़रूर उनकी दुनिया के रंग इस दुनिया से अलग होंगे। वह सारे क्षण उनके यहाँ किसी और तरह से गुज़र रहे होंगे। मैं तो बस उन्ही पेड़ों, सड़कों, लड़कियों, अम्मा-बाबा की बात कहने की कोशिश कर रहा हूँ। मेरा दिल जो धड़क रहा है, उसकी धड़कनों में एक तुम रहती हो। एक मेरी छोटी-सी बहन है, एक मेरा थोड़ा मुझसे छोटा भाई है। इतनी सी दुनिया में सबको समेटने की ज़िद से भरा हुआ अगर कोई कुछ कहने की कोशिश कर रहा है, तब उसे कुछ पहले अपनी कह लेने दो। उसके भी कुछ सपने हैं। वह भी कहीं किसी पीपर के पेड़ पर बैताल की तरह किसी डार पर सपने के साथ अरझा हुआ-सा रह गया है। इस दुनिया में यह एक कमरा हमारे नाम का भी है। इसे तो अपने मन से बनाऊँगा।

आज यह सारी बातें किसी की नज़र में कुछ नहीं हैं। सबसे पहले इनका अपनी नज़र में कुछ होना ज़रूरी है। और अपनी नज़र में एक ठीक-ठाक ‘मिडीयॉकर’ मेरे भीतर घुसपैठ कर चुका है। इतना ही मेरे लिए काफ़ी है। कुछ अपने जैसे लोगों की ख़ोज में लगे रहने का मन है। मैं सोचता हूँ, मैं ऐसा ही ठीक हूँ। कोई न जाने, यह भी एक सुविधा है। पर ऐसा सोचकर कि किसी के न जानने से आप किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं, यह सबसे बड़ा छलावा है। हम शायद तब अपने आप को किसी परत से नहीं ढकते। हमें तब किसी बड़ी बात को कहने के लिए बड़े-बड़े शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती। मैं कुछ न कहते हुई भी काफ़ी कुछ कह देता हूँ। जिनपर सिद्धांतकार बड़े-बड़े भारी भरकम बिम्ब रचते हैं, उनकी हवा निकालने के लिए एक चुभती हुई सूई की ज़रूरत है, और वह मेरे पास है। उसे बस उनके गुब्बारे में चुभाने की देर है। यह सारी बातें जो यहाँ ताखों में, सिकहर पर टंगी हैं, न दिखने वाली नुकीली सूई है।

{डायरी में कहीं.. पन्ना पता नहीं। }

दिसंबर 14, 2015

हम वहीं खड़े हैं, चुपचाप

रात साढ़े दस बजे के बाद। छत पर टहलते हुए। एक हाथ से कान पर फ़ोन। दूसरे से नाक पोंछते हुए। दिल्ली की ठंड ऐसे ही हरबार इन दिनों में घेर लेती। इस बार भी कश्मीर में बर्फ़ गिरने के बाद से बढ़ गयी। वापस कमरे में लौट कर सोच रहा हूँ एक ख़त लिखने बैठ जाऊँ। तुम्हारी बहुत याद आ रही है। पता नहीं हमारी ज़िन्दगी की वह कौन-सी शाम होगी, जब हम भी ऐसे इस ढाँचे के सामने इन दोनों की तरह खड़े एकदम चुपचाप, एकटक, एक दूसरे को देख रहे होंगे। वक़्त एकदम थम चुका होगा। थम चुकी होंगी, बारिश की बूँदें।

बर्फ़ दज़ला फ़रात में गिरती, महसूस हमें वहाँ पैरिस में होती। एन ईवनिंग इन पैरिस मेरी जान। शम्मी कपूर और शर्मिला टैगोर के बाद हम ही पहुँचते वहाँ। डायरेक्ट। शक्ति सामंत को भी लगने लगेगा, उसे फ़िल्म में हमें लेना चाहिए था। ख़ैर अभी शार्ली एब्दो पर हमले के बाद से वहाँ के टिकट कुछ सस्ते हुए हैं। देखता हूँ, कितने में बात बनती है। वैसे अपनी सारी किताब बेच भी दूँ, तब भी कोई जुगाड़ होता नहीं दिख रहा। सोच रहा हूँ, किसी अमेरिकन जर्नल में कोई धाँसू-सा रिसर्च आर्टिकल भेज दूँ। कभी कोई फ्रांस की यूनिवर्सिटी बुलाएगी तो कह दूंगा, अपनी पत्नी के साथ आऊँगा। टिकट दो भेजें। मुझे पता है, वह मान जाएँगे। उन्होने अमेरिका को स्वतन्त्रता की मूर्ति  भेजी थी। उसने पूरी दुनिया को उजाले से भर दिया है। वह बहुत उदार देश है, चिंता मत करो। वह सब देख लेंगे। बस हम पासपोर्ट की अर्जी लगाने कल ही बाराखम्बा रोड चल देंगे।

तुम भी कभी-कभी सोचती होगी। कैसी बात करने लगता हूँ कभी-कभी। पर क्या करूँ। तुम्हें लेकर बहुत सोचने लगता हूँ। मन के अंदर। बाहर। सब जगह। जब तक वह सब देश मिलकर हमारी दुनिया को तबाह करते हैं, चलो थोड़ी देर इस रात में थोड़ा घूम लेते हैं। पर तुम भी हद करती हो। मास्क नहीं लायी।

भूल गयी एचएल दत्तू क्या कह रहे थे, अपने पोते के बारे में उस दिन ये दिल्ली है, मेरी जान। जाने बहार। बस थोड़ा हट के। थोड़ा बचके।

दिसंबर 13, 2015

मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी..

कभी-कभी हम भी क्या सोचने लग जाते हैं। कैसे अजीब से दिन। रात। शामें। हम सूरज के डूबने के साथ डूबते नहीं। चाँद के साथ खिल उठते हैं। काश! यह दुनिया सिर्फ़ दो लोगों की होती। एक तुम। एक मैं। दोनों इसे अपने हाथों से बुनते, रोज़ कुछ-न-कुछ कल के लिए छोड़ दिया करते। कि कल मुड़कर पहले से यहीं पेड़ के पीछे छिपे मिलेंगे, तब देखेंगे। तब देखेंगे, तुम्हारे डुपट्टे का हवा में लहर जाना। उसका उड़कर तुम्हारे चेहरे पर ढक जाना। तुम भी कैसे धीरे-धीरे कदम बढ़ाती मेरी तरफ़ चली आती। के सब जानती जैसे यहीं छिपे-छिपे तुम्हें देखता रहता। तुम्हारे चेहरे पर अमलतास की सी रंगत जो मुझे न पाकर होती, वह मुझे देखते ही गुलमोहर की चमक में बदल जाती। तुम मुझमें परछाईं बनकर ढल जाती। मैं तुम्हारा अक्स बनकर उभर आता।

उस छत पर मुझे हमेशा तुम दिखाई दिया करती। घूमती। हँसती। बात करती। तुम्हारी आँखें मुझे अपनी आँखें लगा करती। आँखें हमेशा से प्यार में ऐसी हुआ करती। छूती। छिपती। कुछ न कहती, चुप रहती।

सब कुछ कितने अनगिन सपनों जैसा होता। जैसे होता घास का मैदान। उसकी ढलान पर लुढ़कते। हम वहीं बैठे रहते। पेड़ के नीचे। नदी किनारे। पानी की तरह बहते, कुछ छन और बहते। बहना, साथ गुज़रने जैसा होता। जैसे गुज़रती गौरैया की चहचहाहट होती। हम भी एक-दूसरे के कान में कुछ बुदबुदाते। कुछ बुलबुलों की तरह नीचे उतरते उबरते। तब मैं एक ख़त लिखकर तुम्हारी आवाज़ के साथ कहीं रख देता। तुम देखती, पर तुम्हें न दिखता। जैसे हम सामने न होने पर नहीं दिखते वैसे। तुम उसे छूती तो छू जाता। तुम उन पंक्तियों को गुनगुनाती वह लय बन जाता। जैसे रात के इन बीतते पलों में हम साथ शरारतों में मिसरी की तरह होते। जैसे पल-पल हम एक दूसरे में घुल जाते। ऐसी ही घुलती, तुम्हारी आवाज़ ले आया हूँ। सुन लेना..

दिसंबर 12, 2015

तुम न जाने अब कहाँ होगी..

पता नहीं, जब मैंने इस तस्वीर को देखा, तबसे किन भावों से भर गया हूँ। इसे पल-पल अपने अंदर उतरते देना है। इसके बाद भी नहीं समझ नहीं पा रहा, यह क्या है? सोचता हूँ, तस्वीरें कितनी यात्राएं करती हैं। यह कहाँ से चली होगी। किस कैमरे से किसने कहाँ खींची होगी। कितने सालों बाद यह मेरे मोबाइल की लॉक स्क्रीन पर जमकर बैठ गयी। यह पूरी प्रक्रिया दरअसल क्या है? शायद ऐसा करके उन सवालों को ठिकाने लगा रहा था, जो अंदर उमड़ते रहे हैं। यह मेरे अंदर उपजे उस संघर्ष का नतीजा रही होगी। यह सवाल सौंदर्यशास्त्र से लेकर यौनिकता की हद तक मेरा पीछा कर रहे होंगे। पर जवाब किसी का भी नहीं मिला होगा।  

अब वक़्त जबकि माधुरी दीक्षित और राजश्री प्रोडक्शन की फ़िल्म हम आपके हैं कौन? से बहुत आगे निकलकर सोनाक्षी सिन्हा की उघड़ी हुई मुलायम, फिसलन भरी पीठ वाले खुले ब्लाउज़ तक पहुँच चुका है, मैं तुम्हारे ढके स्तनों को छिपाने की कोशिश देख रहा हूँ। तुम कैसे आकर कैमरे के सामने खड़ी हो गयी होगी। क्या उदय प्रकाश अगर आज पीली छतरी वाली लड़की लिखते, तब उनका ध्यान तुम्हारी तरफ़ जाता। बस ऐसे ही फ़िजूल में पूछ रहा हूँ। मुझे पता है, नहीं जाता। वहाँ पोस्टर उघड़ी हुई पीठ का था। उघड़े हुए स्तन का नहीं।

मेरे अंदर यह सवाल किसी सूई की तरह चुभ रहा है, सन् अट्ठारह सौ पैंसठ  के लगभग बंबई में खींची गयी इस तस्वीर में तुम कहाँ से आ गयी। तुम कौन हो। किसके साथ तुम परदेस चली आई। शायद तुम ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी खानाबदोश से निकलकर चली आई होगी? तुमने उसके साथ शादी तो की थी न? पर अचानक तुम मुझे वारेन हेस्टिंग के साँड में क्यों दिखाई दे रही हो..? तुमपशतुन तो नहीं हो, कोई तुमसे ज़बरदस्ती शादी तो नहीं करना चाहता..बता दो, बस एक बार..शायद तब नींद सही से आ पाये.. 

नहीं। तुम शायद यह सब नहीं हो। मुझे पता है। तुम पहली गिरमिटिया हो। तुम जलडमरू मध्य में डूब कर मर गयी। तुम्हें तैरना कहाँ आता था।

दिसंबर 11, 2015

काँख के बाल में फँसा बेआबरू दिल

उस वक़्त उसकी काँख में कोई बाल नहीं था, जब पहली बार उसने उसे वहाँ चूमने के साथ अपनी दूसरी प्रेमिका की याद को विस्मृत करते हुए वह तस्वीर खींची थी। दोनों अभी एक-दूसरे के लिए नए-नए साथी बने हैं। वह अकसर अपनी सहेलियों से सुनती रहती। लड़कियों का ‘सेफ़ डिपॉज़िट’। वह उसकी एफ़डी था। शांत, अकेला, रोमेंटिक, बिना दिमाग वाला। उसके पास बस दिल था। दो आँखें थी। पर देने वाले ने उसे सोचने के लिए ज़रूरी समान नहीं दिया था। उसे पसंद थी वहाँ पसीने के सूख जाने के बाद उठने वाली गंध। वह उसमें इस शहर में धुंध के आने से पहले धुंध को महसूस कर लेता। उसे लगता ऐसा कर लेने से कल आँख बंद करके भी वह पानी का जहाज चला लेगा।

जहाज हवा में भी उड़ते हैं, उसे पता नहीं था। उनका जहाज हर रात उन दोनों के बीच उड़ते हुए मालुम पड़ता। वह अगल बगल बिन छिली काँखों के बीच एक दूसरे के मुँह में मुँह दबाये पड़े रहते। यह उनकी आदत भी थी और जगह न होने की मजबूरी भी। मजबूरी अक्सर पति पत्नी को इतनी पास लाती होगी और ऐसा सोचकर वह थोड़ी और पास आकर चिपक जाते। रात जैसे जैसे गाढ़ी होती रहती उनमें फ़र्क करना मुश्किल होता कौन कहाँ से शुरू है और कहाँ ख़त्म। उन्होंने किसी को पैमाइश नहीं करनी दी वरना कोई तो अब तक बता देता। ख़ैर, जाने दीजिये।

अब आप भी सोने जाइए। रात काफ़ी हो गयी है। इतनी रात किसी के कमरे में ताकझाँक नहीं किया करते। ये अच्छी बात नहीं है।

दिसंबर 10, 2015

अगली मुलाक़ात पर कोई मेरा इंतज़ार करती होगी

कभी-कभी हम नहीं जानते हम क्यों डूब रहे हैं। बस हम डूबना जानते हैं। आहिस्ते से इस पते पर रुक गयी एक नज़र उन सारे दिनों में पीछे ले जाने के लिए काफ़ी होती होगी, जब वह मुझ इस तरह ‘नॉन सीरियस’ से दिखने वाले लड़के में दिख जाने वाली सारी खूबियों को किन्हीं और अर्थों में बदल रही होगी। हम किसी भी सुराख़ को अपने पीछे नहीं छोड़ते, जहाँ से कोई हमारे अंदर झाँक कर देख सके। सामने पड़ना, उन दिनों की फ़ेहरिस्त को दुबारा से टटोलने की तरह आता। वह हम दोनों की मुलाक़ात के हर बिन्दु पर ठहर कर सोचने को मज़बूर हो गयी होगी। पता नहीं कहाँ, कब, कौन से मोड़ पर किस तरह उसे हम दोनों दिख जाते होंगे। बातें मुलाक़ातों में बदलते ही हम दोनों शब्दों से बाहर निकलकर चले आते होंगे।

मुझे साफ़-साफ़ पता है, मैंने कभी यह बात तुम्हें नहीं बताई। जब भी हम आमने-सामने होते तुम्हारी आँखों में झाँकने से पहले अपने अंदर झाँकने की हिम्मत कर तुम्हें वहाँ से बाहर लाते हुए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती। कि कहीं तुम्हारी परछाईं को छूने पर तुम्हारे मन की सिलवटों को देख पाता तो अच्छा होता। यह किसी नायक की अनदेखी प्रेमिका को लिखा प्रेम पत्र नहीं है। न तुम्हारी आँखों में मैं अपने ख़ुद के होने की वजह देखता हूँ। यह तो बस ऐसा ही कुछ है जो शब्दों में कह नहीं सकता। मेरे अंदर से निकलकर तुम मुझे हर जगह दिखाई देती हो। मेरी कल्पना में ठहरी हुई सकुचाई कोमल-सी, मुलायम रुमाल के जैसी।

इंतज़ार करते हुए हमारी कोई तस्वीर नहीं है। पर ऐसा होने पर भी एक मिल गयी। बस  तुम्हारा चेहरा छिपा दिया है। बताना कभी, कैसी है?

दिसंबर 05, 2015

सपने की गंध और स्टेचू ऑफ लिबर्टी

सपना। इस एक शब्द में ऐसी दुनिया है, जहाँ हम सब चले जाना चाहते हैं। कोई भी ऐसा टुकड़ा जो हमें अपनी तरफ़ चुंबक की तरह खींचता रहता है। खींचना शहद की तरह मधुमक्खी का भी होता है और उस छोटे नवजात बच्चे का अपनी असहाय लेटी कमज़ोर माता की तरफ़ भी। जैसे गाडियाँ खींची चली आती हैं, पेट्रोल पंप की तरफ़। जैसा अमेरिका खिंचा चला जा रहा है, उन प्रकृतिक संसाधनों की तरफ़। मुझे नहीं लगता था कि कभी वह ऐसा भी कहेगी। पर कल बात करते वक़्त वह बोली, अमेरिका एक दिन ख़त्म हो जाएगा। उसने जिस तरह दुनिया को बुनने वाले रेशों को उधेड़कर रख दिया है, वह ख़ुद इससे नहीं बच पाएगा।

उसी देह से आती गंध में भूल गया, उससे पूछना, कैसे होगा ख़त्म। मैं बस अपने सपने में उसके साथ कुछ देर साथ बैठे रहने के ख़याल से भर गया। अभी भी हम साथ थे। पर अकेले नहीं थे। उसके चश्में का फ्रेम मुझे स्टेचू ऑफ लिबर्टी  की नाक पर चढ़ गया मालुम पड़ा। मुझे उससे समता, समानता बंधुत्व सीखना है। यह मुझमें तुम ही ला सकती हो। ऐसा सोच उसके थोड़ा और पास जाने लगा। कि रुक गया। इस तरह दिमाग चलने पर दिल धड़कना बंद कर देता है। सच वह बंद हो गया और हम दोनों एक दूसरे से मुक्त हो गए। छूने की दूरी से देखने की दूरी तक।

अगले ही पल हमने तय किया हम बाजीराव मस्तानी  नहीं देखेंगे। हमने मोहब्बत की है, अय्याशी नहीं की है।

दिसंबर 04, 2015

पता नहीं शहर हमारे साथ क्या कर रहे हैं

अभी जबसे सो कर उठा हूँ तब से पता नहीं किन अजीब-अजीब से ख़यालों से भर गया हूँ। कैसे इन विकृत से बेढंगे सवालों ने मुझे घेर लिया है। ऐसा क्यों होता है, हम न चाहते हुए भी लिखने को मज़बूर हो जाते हैं। कहाँ कमरे में अकेले खाली बैठा रहता। कुछ सोचता। सोचता शायद यही सब। या इससे भी जटिल। उलझा हुआ। या पता नहीं क्या। हम अपने माता-पिता के बाद पहली पीढ़ी हैं, जो शहर में उनके साथ रह रहे हैं। वह अपनी युवावस्था में यहाँ आए, हम बचपन से यहाँ है। पता नहीं उन परिवारों की कहानी क्या रही होगी, जो कभी कहीं से उठकर यहाँ चले आए होंगे। क्या वह कभी ऐसे भावों से नहीं भर गए होंगे। क्या उनके पास कभी यह भाव, आया भी होगा। हो सकता है, आया हो। यह आज मेरे पास है कल किसी और के पास होगा। सोच रहा हूँ, यह शहर हमारे साथ क्या कर रहे हैं?

यह कोई बहुत बड़ा सवाल नहीं है। फ़िर भी मेरे लिए यह एक ऐसी बात है, जिसमें कमरे के बाहर तैरते अँधेरे को अपने अंदर दबे पाँव दाखिल होता देख डर गया हूँ। हुआ कुछ नहीं। बस ऐसे ही रोने का मन करने लगा। हम यहाँ कर क्या रहे हैं? यह शहर हमारी कीमत पर ख़ुद को बनाए हुए हमारे ऊपर चल रहा है। आहिस्ते-आहिस्ते उसके चलने के निशान अब दिखने लगे हैं। उसकी बनाई रेखाएँ अब दुखती हैं। अंदर तक दर्द देती हैं। ऐसा लगता है, जैसे हम सबसे छिटक कर यहाँ इन दो कमरों वाले घर में कैद होकर रह गए हैं। हमसे कोई मिलने नहीं आता। जो आते हैं, वह भी हमारी तरह कहीं से उठकर इन शहरों में बस गए हैं। उन्हें भी जब अपने घर की याद आती होगी, वह भी ऐसे अपने अंदर लौट पड़ते होंगे। पर सवाल हमारी ज़िंदगी के इन सालों में अपने बेकार होते जाने का है। हम घड़ी के एक-एक पल के साथ निरर्थक होते जा रहे हैं। एक दिन हम किसी काम के नहीं रहेंगे।

कुछ भी न होना, मेरे मन के अंदर किसी आयतन में बन रही स्थिति नहीं, वास्तविकता है। ऐसा कितनी बार हुआ जब वहाँ से बाबा दादी, चाचा-चाची, संदीप, सुरेस, दोनों बड़े जन, भाभियाँ, उनके बच्चे, बुआ-फूफा, मामा सब एक साथ यहाँ हमसे मिलने आए होंगे। तीस साल की उम्र में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ। पिछले साल मई में हमारी शादी के बाद यहाँ रखे रिसेप्शन में कितने लोग आ सके थे, यह बात अगर मैं भूल गया हूँ तो मोबाइल में रखी तसवीरों को पलटकर आसानी से देख सकता हूँ। यहाँ से एक का जाना आसान है। वहाँ से सबका आना नहीं। इधर हम यह आसान काम भी नहीं कर रहे।

इस भाव तक पहुँचने में मेरे अंदर की अति भावुकता की कितनी भूमिका है, इसकी पड़ताल किए बिना कभी-कभी, जैसे आज लगने लगा है, मेरी उम्र के यह पल कभी लौटकर मेरी आँखों के सामने नहीं लौटने वाले। यहाँ बीत जाने के बाद कोई वापसी नहीं है। जैसे-जैसे मैं बड़ा होता जा रहा हूँ, हमारे माता-पिता के गाँव में भी सब उसी समानुपातिक गति से बड़े होते जा रहे हैं। यह ख़ुद को धोखा देने जैसा है कि वह हमारे सामने बड़े हो रहे हैं। हम लोग पिछले साल अप्रैल के बाद से वापस नहीं गए। पता नहीं वहाँ क्या-क्या हमारी गैर मौजूदगी में बदल गया होगा। जिसे हम जब अगले साल या उसके अगले साल पहुँच कर देखेंगे तो वह किसी जादू से कम नहीं लगेगा। हम भले सोचते रहे, सब कहीं किसी ख़ास क्षण में रुके हुए हैं। पर ऐसा होता कहाँ है। कुछ भी ऐसा नहीं हैं, जिसके अंदर से गुजरकर हम वापस लौट जाएँ। लौट आने के रास्ते हम यहाँ साल-दर-साल रुके रहकर ख़ुद बंद कर लेंगे। एक दिन ऐसा आएगा,  जब वहाँ हमें कोई नहीं पहचानेगा। तब भी ऐसे अकेले कमज़ोर पलों में कमरों की चार दीवारी में बैठे सोचते रहेंगे, यहाँ कुछ भी नहीं है।

ऐसी स्थिति में हम लोग अपने साथ क्या करते हैं? क्या हम लोग कुछ कर सकने की हालत में कभी होते भी हैं? पता नहीं वह परिवार जिनका इस शहर से बाहर कहीं कोई नहीं है, वह कैसे इन मरते हुए शहरों में रह रहे होंगे। हम ख़ुशकिस्मत है या कुछ और कि हमारा दिल इस शहर की धड़कनों के साथ नहीं धड़कता। अगर आज मैं इस तरह के सवालों को अपने अंदर पाता हूँ, तब इस शहर को भी सोचना चाहिए ऐसा क्यों हुआ जब उसकी सारी चकाचौंध धरी की धरी रह गयी। यह ख़ुद को जितना सुविधाजनक कहता नहीं थकता, उतना ही हम सबको अंदर से अकेला करते जा रहा है। फ़िर देखने लायक यह बात भी है कि भावुकता से जब हम कोरी बौद्धिकता पर इस तरह आते हैं, तब क्या अगली पीढ़ी में भी यह भाव इसी तरह तैर रहे होंगे? क्या यह उस गाँव से कुछ लोगों के इन शहरों के कोनों में बस जाने के बाद ख़ुद खत्म हो जाएँगे? या एक दिन ऐसा होगा वह गाँव मेरे हृदय से निकलकर मेरी यादों से हमेशा चले जाएँगे। पता नहीं इन मुश्किल-मुश्किल सवालों के क्या जवाब होंगे? या यह सब हमेशा ऐसे सवाल ही अनसुलझे सवाल बने रहेंगे। हमेशा।

पता है, यह सब क्या है? असल में यह ठंड का मौसम मुझे एक ख़ास तरह के अवसाद से भर देता है। ठंड हो न हो, पर अपनी धुरी पर घूमती पृथ्वी, इन दिनों अपने साथ अँधेरा जल्दी ले आती है। कहाँ मैं सात-सात बजे तक सूरज को देखने वाला और कहाँ इन दिनों पाँच बजते ही रात होने लगती है। रात सोने के लिए है, इस तरह जागने, पढ़ने, कमरे में अकेले बैठने के लिए नहीं। फ़िर हर साल, साल ख़त्म होते-होते मेरा मन कहीं किसी और धरातल पर चला जाता है। जब मेरा मन खिड़की के बाहर देखने का करता है और उस पर परदा देख देखकर खिसियाहट से भर जाता हूँ। अब जबकि देख रहा हूँ दिमाग मुझपर हावी हो गया है, जा रहा हूँ। थोड़ी देर और अकेले बैठकर डूब जाऊँगा। उन बचपन के अपने बनाए किस्सों को जो मेरे मन में ही कहीं इधर-उधर पड़े होंगे, एक साथ इकट्ठा करके इस शहर को कोसुंगा। जब कोसकर थक जाऊँगा, तब एक दिन यहाँ से वापस लौट जाने की बात डायरी में लिखकर रख दूँगा।

{ तीन दिसंबर। शाम छह से सात के बीच की उधेड़ बुन। अब कमरे से बाहर जा रहा हूँ। जो यहाँ नहीं दिखा, उसे डायरी से मिला लेना कभी..}

दिसंबर 03, 2015

इस तरह, मैं भी एक दीमक हूँ

मुझे नहीं पता लोग कैसे लिखते हैं। पर जितना ख़ुद को जानता हूँ, यह लिखना किसी के लिए भी कभी आसान काम नहीं रहा। हम क्यों लिख रहे हैं(?) से शुरू हुए सवाल, कहीं भी थमते नहीं हैं। उनका सिलसिला लगातार चलता रहता है। पर एक बात है, जो इस सवाल का एक ज़वाब हो सकती है। वह यह कि हमारे आसपास ऐसे सुनने वाले हरदम नहीं होते, जो अंदर चलने वाली उधेड़बुन को सिरे से सुलझा सकने की फ़ुरसत से भरे रहते हों। फ़िर इसका मतलब यह भी नहीं कि वह जो इसे डायरी में या यहाँ पढ़ रहे हैं, उन्हें भी यह पूरी तरह उसी लहज़े में समझ आ रही हो, जैसी यह हमारे अंदर चल रही थी। फ़िर सवाल तो यह भी है कि जैसी अंदर चल रही थी, उसके लिए अपनी जेबें ऐसी भाषा से भरी होनी चाहिए, जिसमें जो जब जहाँ, जैसा चाहा, कह दिया। पर हर बार चाह कर भी ऐसा होता नहीं।

ख़ैर, बात पर वापस लौटते हैं। जो सोच कर यह बात अपने अंदर शुरू करने का मन हुआ। अब जबकि तुम ब्लॉग बनाने की बात कह रहे हो तो जान लो, यहाँ लिखना इतना मुश्किल नहीं है, जितना मुश्किल यहाँ लगातार लिखना है। हम यहाँ क्या लिख रहे हैं, किसके लिए लिख रहे हैं, इनसे लगातार जूझते हुए लिखते रहना ज़रूरी है। जितनी आसान यह दुनिया देखने में लगती है, उससे कहीं जादा इसके रास्ते हैं। हम कभी-कभी डायरी में वह सब लिखने से बचते हैं, जो यहाँ चुपके से किसी की ओट में रहकर धीमे से कह देते हैं। कहना, सबसे पहले अपने अंदर घटित होता है और बाद में बाहर आता है। इस पिछली बात से संबन्धित कोई सैद्धांतिक समझ कभी नहीं बनी पर अपने अनुभवों से इतना तो कह ही सकता हूँ, यह जितना अकस्मात है उतना ही कभी-कभी सुचिन्तित भी रहता है। हमेशा किसी आवेग में आकर लिखना नहीं होता पर लिखते हुए एक अजीब तरह का ताप महसूस ज़रूर होता है।

इन बीतते सालों में मेरे पास कागज़ पर लिखने की एक अलग भाषा दिखती है और जब यहाँ वर्ड फ़ाइल में टाइप कर रहा होता हूँ, तब वह बिलकुल अलग हो जाती है। शायद ऐसा माध्यम बदल जाने के कारण होता होगा। जैसे वहाँ जब तक पैन की स्याही सूखती है, तब तक अगले क्षण की भूमिका बन रही होती है। मैं कागज़ पर बहुत धीरे-धीरे लिखता हूँ। आहिस्ते से। कछुए की तरह टहलते हुए। कोई हड़बड़ाहट जब महसूस होती है, उसमें भावों की सघनता साफ़ दिख जाती है। पता नहीं तब कैसे उन वाक्य संरचनाओं को अपने अंदर उमड़ते हुए देखता हूँ। कई-कई दिन किन्ही बातों को सिर्फ़ वहाँ लिखने के लिए रुका रहता हूँ। मन में उनकी सही जगह और सही पता वही बनता है। कहने में डर लगने वाली बात तो अब मुझ पर क्या काम करेगी। पर कुछ तो है, जो अभी भी पहले वहीं आता है। वहाँ आना एक तरह से तहख़ाने में छिप जाना है। तरतीब से सबका रुक जाना। दूर से देखते रहना। देखते हुए भूल जाना।

लेकिन ऐसा नहीं है, ब्लॉग की बुनावट में एक भावनात्मक दूरी काम कर रही होती है। पर समझ नहीं पाता, यह सयास है या अपने आप घटित होने वाली परिघटना। जहाँ लिखने से पहले किसी बड़ी रूपरेखा बनते ही पोस्ट का वह ढाँचा इतना तरल हो जाता है, जिसमें कई-कई बदलाव उस लिखने के दरमियान होते रहते हैं। कभी लगता है, यहाँ लिखा सब कुछ ‘फेब्रिकेटिड’ सा है। और इसमें मेरे ऊपर एक वक़्त ऐसा भी आया, जहाँ ऐसा लिखने की कोशिश करने लगा, जिससे यहाँ आने वाले लोग बार-बार आने लगें। पता है, वह चीज़ क्या है जिसने मुझे ऐसा बनाया? मुझे भी सही-सही नहीं पता। पर जितना अंदाज़ लगाकर अपने पाठक को समझ पाया हूँ, उस हद पर वह हमेशा एक ऐसी दुनिया की तलाश में रहता है, जो उसे सपनों में ले जाने लायक हो। वह थोड़ी देर किसी ऐसी अकेली जगह पर जाने की तड़प से भर उठता है, जो उसने आज तक नहीं देखी है। दरअसल, हम सबने जिस तरह के समाजों को बनाया, वहाँ सब अपनी मर्ज़ी चलाते हुए भी उस सामाजिक ढाँचे को तोड़ना नहीं चाहते। बस जहाँ वह बार-बार टूटता है, सबसे जादा लोग वहीं लौटते हैं। वह थोड़ी देर के लिए उनकी बनाई दुनिया है। इन क्षणों को जी लेने के बाद, वह उन्हीं जगहों पर यहाँ लौट आने की ख़्वाहिश के साथ वापस लौट जाते हैं।

मैं ख़ुद कौन-सा इस दुनिया और इन दुनियावी झंझटों से आज़ाद हूँ। पर लगता है, शायद वह वक़्त अब मेरे लिखने के लिए मिट्टी बन गया है। मेरे मन का पौधा वहाँ बेल की तरह उगने लगा है। असल में मेरे मन की संरचना में यह समाज कुछ अव्यवस्थित है। यह मुझे वह नहीं करने देता, जैसा मेरा मन करता है। वह मुझे बाँधता है। रोकता है। बार-बार पीछे खींच लेता है। इतना होने के बावजूद मैं कोई सीमातीत स्वतन्त्रता नहीं चाहता। पर इतना लिखते हुए महसूस करता हूँ कि जिस तरह से अपनी बात कहना चाहता हूँ, वह भाव, विचार, स्थिति मेरे भीतर पिघल रही है, उसे अपने हाथों से एक मुकम्मल शक्ल दे सकूँ। वह बना सकूँ जो बनाना चाहता हूँ। अगर शब्दों से मैंने यह दुनिया बनाई है, तो मुझे यह भी पता है; अगर इस दुनिया की बातें उस तक पहुँचेंगी तो वह नाराज़ भी बहुत होगा। पर मैं चाहता हूँ, अगर उसे पता भी चले तो कुछ पल के लिए वह नाराज़ भले हो जाये, पर अपने डर से डराये नहीं।

डरना और न सोच पाना दो अलग-अलग चीज़ें हैं। फ़िर इन शब्दों की यह ख़ासियत है कि इनसे बनाए मंज़र तभी समझ आएंगे, जब हम उन्हे अपने अंदर गहराई तक उतरने देंगे। और शायद यही वह बिन्दु है, जहाँ मेरी भाषा इतनी ठोस न रहकर बारीक धागे की तरह होती गयी है। यह जितनी तरल दिखती है, उतनी तरल नहीं है। वह किस रुई के फ़ाहे से बना है। उसे पहचाना ज़रा मुश्किल है। मन की परतों में छिपे बिम्ब शब्दों में पीछे चाभियाँ छोड़ जाते हैं। किसी नक्शे पर गाढ़ी पेंसिल से लिखकर रबर से मिटा देने की तरह। जो थोड़ा भी उस तरह अपने मन को छोड़ देगी, वह उस मेढ़ तक होते हुए मुझ तक पहुँच जाएगी। जो दिख रहा है, उसके पीछे छिपाकर रखी तस्वीर पर फ़िर क्या होगा, मुझे नहीं पता। शायद अपनी शक्ल देखकर वह शरमा जाएगी बस।

भले आज इस वक़्त तक मेरे लिखे हुए शब्दों का कोई भी ‘सामाजिक मूल्य’ या ‘प्रासंगिकता’ जैसा कोई मूल्यपरक अस्तित्व न हो। पर यह शहर, इसकी सड़कें, गलियाँ, उनमें बचे रह गए गड्ढे, हमारा घर, उसकी दीवारें, दीवार पर चिपकी छिपकली, उस खिड़की के बाहर की दुनिया, सामने की छत पर तुम्हारा होना, इस देश और काल पर मेरी तरफ़ से कर दी गयी व्यक्तिनिष्ठ व्याख्या है। यह पूरी प्रक्रिया एक सकर्मक क्रिया है। अश्लील एकालप होते हुए भी उसके भीतर रचा गया मेरा इतिहास। इसमें किसी किताब की सुंदर-सुंदर पंक्तियाँ भले न हों पर मेरे मन की बुनावट में यह एक ख़ास जगह रखता है। ऊपर से देखने पर यह लिख लिखकर ख़ुद को खाली करने की कवायद से कुछ जादा न लगता हो पर यह सचेत होकर अपने अंदर अपने बाहर घटित होने वाली देखी अनदेखी बारीकियों को लिख डालने की ज़िद है। तस्वीरें भले थोड़ी मटमैली लग रही हों, पर हैं तुम्हारी मेरी इसी दुनिया की।

फ़िर कभी-कभी तो लगता है, जैसा मैं लिखता हूँ, उसे कोई और लिख ही नहीं सकता। शायद यह बात हम सबके मामलों में एक हद तक सच भी हो। हम किसी की तरह नहीं अपनी तरह लिखते हैं। पर यहाँ उससे आगे जाकर यह कहना चाहता हूँ कि अगर कहीं कोई मेरी तरह लिख रहा होता, तो आजतक मुझसे मिल गया होता। हो सकता है, तब मुझे पता चलता, उसकी दुनिया और मेरी दुनिया में बहुत सारी बातें एक-सी दिखने के बाद भी वह दोनों एक-सी नहीं होतीं। या हो सकता है, उसके सब लिखने के बावजूद मैं ऐसे ही लिखता रहता। लिखना जैसे उसकी राजनीति होता, वैसे मेरा हस्तक्षेप होता। पर इन सब भुलावों के बावजूद हम सबको अपने हिस्से की बात कभी-न-कभी ख़ुद कहनी पड़ती है। कहना हमारे होने का सबूत है। हम इसे ऐसे नहीं कह सकते कि मैंने सबके हिस्से का लिख दिया, अब उन्हें लिखने की कोई ज़रूरत नहीं। अगर ज़रूरत नहीं थी तो आप भी कभी कुछ न लिखते। यह दावे हमेशा से झूठ होते हैं और इनकी सतह पर जितनी दीमक इस वक़्त दिखाई दे रही हैं, उतनी कभी नहीं दिखीं। इस तरह, मैं भी एक दीमक हूँ। छोटी सी।

कई बातें अभी भी रह गईं, जो तुमसे करनी थी। आगे की रह गयी बातें जल्द। इसी हफ़्ते।

दिसंबर 02, 2015

वह इस्माइल दर्ज़ी की दुकान का सटर नहीं है, (कॉमा)

तीसरी मंज़िल। सबसे ऊपर। इसके ऊपर आसमान। आसमान में तारे। अँधेरे का इंतज़ार करते। इंतज़ार चीलों के नीचे आने तक। वह वहाँ तब नहीं देख पाती, चमगादड़ों की तरह। इन्हे आँख नहीं होती देखने के लिए। वह तब भी नहीं छू जाते कभी किसी पत्ते को भी। हरे-हरे पत्ते। तुम्हारे गाल की तरह मुलायम। तुम इन पर टीवी पर दिखने वाले मॉसचराइज़र क्रीम मत लगाया करो। उसकी गंध में छिप जाती है, तुम्हारी ख़ुशबू। कल उसी गंध से छींकते-छींकते, बार-बार अंदर चुभते रहे नाक के बाल। तुम तो मेरे दिल में उड़ने वाली तितली हो। इन तितलियों के पीले चटक फिरोज़ी रंगों के भीतर उतरती आवाज़ से तुम तक एक तिलिस्म को बुनते बुनते हाँफ जाता हूँ। हाँफना सोचने के बाद काँखों और जाँघों के बीच से निकले पसीने की ऊब से पैदा हुई ऐसी चीज़ है, जहां थक कर चूर हो जाने के अलावे कोई और स्थिति नहीं हो सकती। कभी-कभी इसी उधेड़बुन में दिमाग पगलाने की हालत में पकड़ लेते हैं।

अभी भी वह नहीं कह रहा, जो कहने जा रहा था। उस पहली पंक्ति में रचे दृश्य में सबसे ऊपर की मंज़िल पर पहुँच कर नीचे देखने और उस ठंडी हवा को मनसूसने के अलावा और भी बहुत सारी कतरनें ,वहीं दरवाजे की सिटकनी में उलझ कर रह गयी होंगी। वह सोचने समझने की हालत से पछाड़ खाकर गिरते पड़ने के दरमियान बस यही सोचता रहता। हम जिस तरह इस भूगोल के नक्शे को असलियत मानकर उसमें बंधे हुए ख़ुद को निपटाने की फ़िराक़ में रहते हैं, दुनिया उससे कहीं बड़ी है, जो उस नक्शे से बाहर छितरी पड़ी है। उनके होने न होने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। ऐसा सोचना बेवकूफी से अलग आले दर्ज़े की पैमाइश से कम नहीं है। बिलकुल वैसे, जैसे हम सब पश्चिम की महान परियोजना की चपेट में आने से नहीं बच पाये। उन टकसालों ने हमारी दुनियावी हकीकत को ठोस, स्थूल, भोथरा, अधूरा, खुरदरा, अनचाहा, चिपचिपा बनाकर छोड़ा। उसका कोई ऐसा आकार नहीं, जो आँखों से पकड़ा जा सकता हो। वह सामने दिखते हुए भी हमारी आँखों से ओझल है। हर वस्तु उत्पाद में बदलकर हवा में पिघल गयी है। हम सब उसी में साँस ले रहे हैं। एक तरह की बीमारियों में हम भूगोल की रेखाओं के आर-पार घिरते जा रहे हैं। हवा, पानी, ज़मीन सब उस रेगिस्तान की रेडियोधर्मी अवगुणों को अपने अंदर क्लोरोफ़िल की तरह अवशोषित करती रही। वहाँ बुद्ध मुस्कुरा रहे होंगे या उन देशों के सरमाबरदार(?) पता नहीं।

प्यार इन दो अलग तरह की बातों के बीच हमारे गर्भ में कैसे पल रहा है, किसी देखने लायक बात की तरह उकड़ू बनकर बैठ गयी। जैसे ऊँट भी ऊँटनी की तरफ़ देखकर यही सोचता रहा, काश! यह भी कहीं किसी हरे भरे मैदान में दूसरी तरफ़ से दौड़कर मेरी तरफ़ आती और इसके स्तनों से मेरा सीना एकदम चिपट जाता। उसके लिए इतने छोटे कपड़े खरीदता, जिसमें उसके सारे अंग उघड़े रहते। ख़ासकर इन ठंडी होती दिसंबर की शामों में होने वाली दिल्ली की रात वाली शादियों में पहनने वाले ब्लाउज़ की पीठ। चिकनी। फिसलती। उभार लिए कंधों में दिख जाने वाले धागे, जो उसके स्तनों को एक विशेष पूंजीवादी आकार में ढाल रहे होते। पर लगता है, अब मुझे रुक जाना चाहिए। अमज़ोन, फ्लिपकार्ट के अलावे मयन्त्रा ने अभी मनुष्य के इतर किसी और जाति को खँगालने की कोशिश नहीं की है। न यह किसी चाँदनी चौक के कटरा नील के बगल से जाती सड़क पर खुलती किसी दर्ज़ी की दुकान का बंद सटर है। नमाज़ का वक़्त है। ऐसा सोचकर, वह हरबार गौरीशंकर मंदिर से पानी पीकर लौट आते। इंतज़ार करते, ऊँटनी के सीने का माप मिले तो सिलना शुरू करें।

पर आपका क्या करूँ। आप भी मोहतरमा कभी-कभी अश्लील हो जाने तक मुझसे लिखवा ले जाती है। ऊपर पढ़ते हुए कभी आपने सोचा नहीं कि हम भी पहले ऊँट और ऊँटनी की तरह पूरे नंगे थे। और अब बस हम इन सदियों में अपनी देह पर उग आए कपड़ों को निकालकर फ़िर से नंगे होने की तय्यारी कर रहे हैं। इसे अपने बेसिक्स पर वापस लौटना कहते हैं। यह किसी भी तरह से सांस्कृतिक पुनरुत्थान नहीं कहा जा सकता। यह आदिम सभ्यता के विकास का स्वाभाविक विकास क्रम है। जहाँ से हम चले थे, वहाँ लौटा ले जाने की प्रक्रिया में सब कैसी-कैसी युक्तियाँ लगा रहे हैं। हमें उनका काम आसान कर देना चाहिए। बस, पहले के मुक़ाबले हो इतना ही रहा है कि हम अब कुछ भी करने से पहले, एक तर्कशास्त्र को अपने भीतर पनपने देते हैं। हमें लगता है, हमारा दिमाग हमारे अधीन हैं। पर वह हमें जितनी भी स्वतन्त्रता दें, हम लौट लौटकर उन्ही निष्कर्षों की तरफ़ लौट जाते हैं। जो हमें एक ऐसे घेरे में समेट कर रख देते है, जहाँ हम ऊँट और ऊँटनी की कल्पना करने लग जाते हैं। उनमें अपनी छवियाँ डालकर छन भर देखिये। पता चलेगा। मधुर भंडारकर की अगली फ़िल्म इसी आइडिया पर है। पर आपको लग रहा होगा, यहाँ तक लाकर मैंने जेब काट ली। अगर कहूँ कि हाँ काट ली। तो भी आप कुछ नहीं कर सकते। कुछ कर सकने की हैसियत वाले यहाँ से पहले ही लौट चुके हैं। जो यहाँ बचे हैं, उनकी कोई क़ीमत नहीं है। वो तो बस ऊँट-ऊँटनी हैं।

आवाज़ें..

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