मैंने मैं शैली अपनाई

एक जो मैं हूँ, उसे कहूँ कैसे?
बड़े दिनों से सोच रखा है के अपने बारे में लिखुंगा। पर क्या लिख डालूँ, समझ नहीं आ रहा। ऐसा क्या सब कह दूँ जिसके हर हर्फ़  से ‘मैं’ ही मैं फूट पड़ूँ। मुश्किल है। पर लिखना चाहता हूँ। कुछ ऐसा जो ‘मुझे’ बता सके। कौन हूँ? कैसा हूँ? क्यों हूँ? सवाल जितने ज़रूरी हैं, उतने ही ज़रूरी हैं उनके जवाब। इन टेढ़े प्रश्न चिन्हों(?) के बजाए सीधे पूर्णविराम। इन पंक्तियों से गुज़रते ठहरते ठिठकते सब कहता जाऊँ। कहने की हद तक। जहाँ से पहचाना जा सकूँ। दूर से चीन्हकर कोई आवाज़ लगता सुनाई दे। मिले तो अजनबियों की तरह नहीं। दोस्त की तरह। हमदम के माफ़िक। चाय नहीं पीता, पर दो चुसकियाँ ले सकूँ उसके साथ। घण्टों साथ बैठा रहूँ..

देखते हैं क्या सामने आता है। क्या नहीं आता है। अपने ‘डीएनए’ का ‘ब्लूप्रिंट’ कैसा बनता है?

कहीं पढ़ा था
कहीं पढ़ा था कि अगर तुम्हें लगता है जो कुछ भी लिखा गया है, उसमे तुम नहीं हो या वह तुम्हारे मन-मुताबिक नहीं है; तब खुद लिखना शुरू करो। उसमें ख़ुद को गढ़ते जाओ। पढ़ा तो ख़ैर क्या है, बस यहाँ पिल पड़ें हैं। जो गायब हैं, जो कहीं जगह नहीं पा रहे हैं, उन्हे ढूँढने के लिए खोजी दस्ते लिए डोल रहा हूँ; ऐसा नहीं है।

थोड़ी बहोत जितनी भी समझ बनी है, उसी के दायरे में कभी नितांत व्यक्तिगत हो जाता हूँ, तो कभी निपट सामाजिक। अगर यह पंक्ति ‘आत्मशलाघा’ के इर्दगिर्द भटकती दिख जाए तो इस कलमकार का कोई दोष नहीं। भाषा की सीमा है। कि जो कहना चाह रहा हूँ, उसमें इतना डूबा नहीं हूँ कि जो चाहूँ वही कह सकूँ। वैसे भी हम बस काम चलाने लायक हो गए हैं। उसे बरत नहीं पा रहे। ख़ैर।

दिल्लीये में रह रहे हैं
रहने को तो बचपने से दिल्लीये में रह रहे हैं। पर यहाँ से भाग निकालने के ‘एसस्केप रूटों’ पर काम चलता रहता है। इधर जैसे-जैसे बड़े हो रहे हैं, दिल्ली उबा जादा रही है। पुराने ठीहे बचे नहीं, नए कोनों पर अब काम करने का मन नहीं होता। जो साझेदारियाँ हमारे साथ बड़ी हुईं, उनमे से कई विलुप्त होने की कगार पर हैं। बचाए नहीं बच रहीं। यह जितना एक तरफ़ा लगता है, उतना है नहीं।

थोड़ा रुककर एकबार फिर ऊपर से नीचे आया, तो लगा, ऐसा कुछ भी नहीं लिख रहा हूँ जिसमे मेरे बारे में कुछ भी ‘स्पेसिफिक’ हो। सब ‘जनरलायज़ेशन’ जैसे ब्योरे की तरह है। कौन-सा शहर  ऐसा नहीं है जो अकेला नहीं कर रहा। वहाँ का ‘लाइफस्टाइल’ चोर दरवाज़ों की तरह नहीं है, जो ‘वीकेंड्स’ की रंगीन शामों को साथ लाता। इन ‘कॉस्मोपॉलिटिन’ शहरों की ज़िंदगियों का एक ही ढर्रा है। बस इनसे बचने की जद्दोजहद करता एक अदद ‘मैं’ हूँ। कई और भी होंगे, पर अभी गायब हैं।

दोबारा ‘ट्रैक चेंज’ करके देखते हैं।
‘डी-रेल’ होते हैं या बचते हैं। कहने को कुछ ख़ास नहीं बनाया। कूकर चढ़ा दिया था। अभी तक सीटी नहीं आई।

इन सबसे एक बात तो साफ दिखाई दे ही जाएगी, के सीधे-सीधे अपने ऊपर बात करने से लगतार बचने की फ़िराक़ में रहता हूँ। ख़ासकर तब जब मन मुताबिक ‘टाइम स्लॉट’ न मिले। बस लिखने को लिख रहे हों। जैसा के अभी। हाँ जी, बिलकुल अभी। इसी वक़्त। एक पन्ना और जोड़े ले रहे हैं बस। कह कहाँ पा रहे हैं?


चाचियों का भाभी होते जाना
थोड़ा ‘पर्सनल’ होने की छूट ले भी लूँ, तब भी नहीं कह सकता के मेरे हिस्से भी दो ढाई प्रेमिकाएं  तो नामज़द हैं ही। जिनसे बोलने की हिम्मत यही कोई आध-पौन बार उठा चुका हुंगा। उनकी तरफ़ नहीं, तो कम-से- कम ‘साधारणीकरण’ मेरी तरफ़ कई-कई मर्तबा हुआ है। छूने न छूने का द्वंद्व अब ख़त्म करने का मन करने लगा है। और ऐसा करते-करते प्रेमिकाओं से प्यार करने की उम्र भाभियों सरहजों और पत्नियों की तरफ ढकेले दे रही है। कभी-कभी चाचियों के मज़ाक़ भाभियों के मज़ाक़ क्यो नहीं हुए ऐसा लगने लगता है। फिर ख़तरा है के चाचियों को भाभियों की तरह न मानने लग जाऊँ और सांस्कृतिक सामाजिक सीमा लांघने का आरोप लगने लगे; इसलिए पहले ही पूर्णविराम लगा रहा हूँ। इस पर फिर कभी..!!

बस्ता भर डिग्री
फिर अपने पास कहने को एम.एड. तक की सारी डिग्रियाँ दिल्ली विश्वविद्यालय से हैं। आठ दस साल से यहीं खूँटा  डाले बैठे हैं पर अभी तक जेब से ‘ठन-ठन गोपाल’ वाली धार्मिक मुद्रा से ही काम चला रहे हैं। नौकरी कहीं नहीं है। किताबें पढ़ने को आदत कहूँ या शौक़ समझ नहीं पा रहा हूँ। पर हाँ एम.ए. हिन्दी के ज़माने से सुझायी गयी जिल्दों से भागने की आदत तभी से साथ लगी जो अभी तक चिपकी हुई है। इतनी ठस्स किताबों में गाय की तरह नादे में मुँह बाये चरने का कभी मन नहीं किया।

मिसफिट शौक़
तभी शायद ख़ुद को ‘मिसफ़िट’ मानने का शौक़ चर्राया होगा। दाढ़ी  तो ज़माना बीता कटवाई नहीं है। आज अप्रैल दो हज़ार सात से मई तेरह तक सिर्फ़ दो मर्तबा। एक बार जयपुर में उसी साल और दूसरी बार भी मुकेश के कहे। दाढ़ी रखना ‘ऑफ़बीट’ ‘फ़ैशन स्टेटमेंट’ की तरह है। ‘सीरियस पर्सनलिटी’ हो जैसे। फिर इसका भी अपना विमर्श है। अँग्रेजी में बोले तो ‘डिसकोर्स ’। लड़कियाँ अक्षय कुमार की प्रचारित ‘रफ़ एंड टफ़’ जीन्स न सही पर कुछ-कुछ ऐसा ही ‘रफ़’ ‘टफ़’ बंदा तो सोचती ही होंगी। इसमे विचारधारा की अपनी भूमिका भी है। शायद अब सबसे जादा वही रह गया है। देवदास तो अब कोई मानने से रहा।

मुक्तिबोध पढ़ जग बौरान
हिन्दी वालों के साथ दिक्कत यही होती है के ‘मुक्तिबोध’ जैसे कवि को पढ़ बौरा जाते हैं। ख़ुद वंचित पृष्ठभूमि कितना काम कर रही होती है, इस पर गोपेश्वर सिंह अपने अंडर किसी लड़की को आसानी से पीएचडी थीसिस लिखवा सकते हैं। पर हम जैसे तो सरोकार-प्रतिबद्धता  वाली बाइनरी में इस दुनिया समझने बदलने निकल पड़ना चाहते हैं। पढ़-धर के नौकरी तो पहले ही नहीं मिलनी, ऊपर से तुर्रा के हम कनात से नहीं तने। फिर वहीं डिपार्टमेंट में डिपार्टमेंट को मठ मान ‘अँधेरे में’ की व्याख्या कर दो, तो पच्पन तो बनने से रहे। मैंने बस यही लिखा था के ‘कृपया उत्तर पढ़ के अंक दें’।

पर जब तब कुछ नहीं कहा तब आज क्यों। इसलिए ऊपर के एक अनुच्छेद को अपढ़ा मान दिमाग की सलेट से मिटा लें। हो जाता है कभी कहीं। लिख दिया है, तो ख़ुद तो मिटाऊंगा नहीं।

विचारधारा की लंगोटी
वहाँ से विचारधारा वाला आग्रह भी बटोर लाये थे। भागते भूत की लंगोटी मिल गयी हो जैसे। फिर यह भी के छोटे-मोटे कलमतोड़ तो हम भी अब आसानी से बन ही सकते हैं। के नहीं। हम ‘जन’ के साथ हैं। ‘मास’ के साथ। वहाँ कि इमारत का ‘पॉपुलर कल्चर’ यही था। है। कभी-कभी झण्डा बुलंद भी कर देते हैं, पर उसकी आमद अब ‘एक्सट्रीम पर्सनल’ वाली मद में होने लगी है। इस पर कभी लिखा भी था कि यह विचारधारा आराम से नौकरी बीवी सोशल स्टेटमेंट सब दे सकती है। बस करना वही है। दुम का उपयोग। कटी दुम वाले, दुम उगाने का जुगाड़ करें।

जिनसे उन्हें लिखा जाना है
हाँ, घूमता खूब हूँ। पर वापस आकर उन सबको लिखता नहीं हूँ। शायद, लिख ही नहीं पाता। बस उनमे कई-कई दिन खोया-सा रहता हूँ। सोचता हूँ, लिखूंगा। पर वह भाषा, वह शब्द मेरे पास झोले में नहीं मिल पाते; जिनसे उन्हें लिखा जाना है। जिस दिन उन्हें ढूंढ़ लूँगा उस दिन से लिखना शुरू। अभी तलाश जारी है। बस अभी जून की उस गरम सुबह नींद में भन्नाया-सा एक रौं में, एक और ब्लॉग बना डाला। सैर कर दुनिया की । देखते हैं कहाँ तक पहुँचते हैं।

सत्तर ऍम ऍम
फिलम विलम का भी शौक़ सा है। था। हर नयी आई पिक्चर सिनेमा हाल में नहीं देख सकता, पर जितनी भी देखता हूँ उनमे से अधिकतर हॉल में ही होती हैं। थी। टॉरेंट से डाउनलोड कर भी लो, तब भी, घर की चार दिवारी में मौके कम ही मिल पाते हैं। किसी ज़माने पालिका बाज़ार  से ढेर-ढेर सामानांतर सिनेमा वाली सीडी डीवीडी खरीद-खरीद लाता था। झउआ भर इकट्ठी भी हो गयी। पर अब पता नहीं क्यों, उधर देखने का मन नहीं होता। उनका एक सा होना उबाने लगा है। लगता है सब एक ही बने खांचे में डालकर निकाल ली गयीं हैं। और आखिरी एनिमेटिड फिल्म वाल इ  जितनी प्रशंसनीय थी, औरंगज़ेब उतनी ही नींद की गोली साबित हुई। संदीप आधी से भी जादा फिल्म में सोता रहा। ऐसी फिल्मों से भी बचना चाहता हूँ।

इससे जादा नहीं
बस इससे ज़्यादा क्या लिखूँ। घर की छोटी सी कुर्सी मेज़ पर बैठ खिटिर-पिटिर करता रहता हूँ। उसकी तस्वीर दो साल से सोच रहा हूँ के यहाँ लगाऊँगा। पर लगता है, इस बार भी टल ही जाएगी। फिर कभी। यहाँ सिर्फ़ मैं हूँ। इतना सब पढ़ के भी नहीं जान पहचान पाए, तो नीचे लिंक दिये दे रहा हूँ (नीचे बोल्ड अक्षरों  में)। एक मानी में चाभी। जो कई तालों को एक साथ खोल देगी। अभी मन इस ब्लॉग पर भी लिखने का हो रहा है।

देखते हैं कब तक..

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(14/01/2014)

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