सत्रह सितंबर: हर साल


क्या लिखूं. कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ. पता नहीं क्यों अजीब सा लग रहा है. तीन सौ पैंसठ दिन पहले इसे यह नाम दिया था. आज 'करनी चापरकरन' की पहली सालगिरह जैसा ही कुछ है..सुबह से ही सोच रहा था कुछ तो लिखना है, पर वो क्या होगा?? 

नीचे क्या लिखने जा रहा हूँ मुझे खुद नहीं पता. एक मोटा-मोटा सा खांचा ज़रूर दिमाग में घूम रहा है. चलो एक-एक कर याद करना शुरू करता हूँ..

'चापरकरन' अवधी भाषा में एक विशेषण है और माँ -पढ़े मम्मी- के कारण मेरे कुछ ज़यादा ही पास भी. 'चापर कय दिहओ..!!' हर साल गाँव जाने पर दो-चार बार कान में यह ध्वनि पड़ ही जाती थी. जहाँ संसाधन अपनी अल्पतम अवस्था में हों वहां ऐसा कुछ होना, पूरी प्रक्रिया को दोबारा करने की जद्दोजेहेद से कम नहीं..मतलब उस स्थूल से दिखने वाले द्रव्य के लिए किन्ही विशेष महाजनी सभ्यता के पोषकों के पास जाना और घेर घारकर या तो चिरौरी करना या अपना कुछ कभी दुबारा न देख पाने के निश्चय के बाद रेहन पर रख देना. 

सीधे स्पष्ट सरल शब्दों में जब किसी बने बनाये काम को या उसकी धारा को उसकी विपरीत दिशा में मोड़ दे या बिगाड़ दे, उसके लिए हमारी तरफ 'चापरकरन' ऐसी ही कई विशिष्टताओं -विकृतिओं का गुंजलक जैसा रहा है..

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बीते एक साल में कहाँ पहुँचा ? क्या किया, क्या रह गया ? कई दिनों के बाद अपने अन्दर चल रही उधेड़बुन को लिखने की कोशिश की है और यही आज इस ब्लॉग की दूसरी सालगिरह पर दोपहर एक से दो बजे के बीच की फुर्सत में लिख मारा..अब आपके लिए है..

दो साल पहले जिन मूल्यों के साथ चले थे, वे आज भी हैं बस थोडा उनसे खिसक गया हूँ, लगता है. असंतुष्टि के भाव के साथ खुद को साबित करने की जद्दोजहद थी. के थोडा बहुत लिख पढ़ लेते हैं. दिमाग भी काम करने लायक अभी भी है. इन्ही के इर्द गिर्द कुछ कुछ चल रहा था.

दुनिया पहले तब भी गोल थी पर इतनी कोमल न तब थी न आज..साथ ही इसकी व्यक्तिगत सापेक्षता से कोई इन्कार नहीं कर सकता. वास्तविकता जितनी जैसे हमें दिखती है, उतनी ही लगती है. नज़रों को ऊँचाई से भी देखा जा सकता है और उसके फैलाव के वितान को विस्तार से भी. लिखने के लिए जिन विषयों को चुना उनका अपना ढर्रा बनते-बनते वक़्त लगा.. अभी भी बन ही रहा है.. पर कभी लगता है कभी-कभी उन्ही से भागने लगता हूँ और फँस जाता हूँ व्यक्ति और समाज में भाव और विचार में. 

द्वन्द मुहावरे की तरह जुबान पर था. जो भी पढ़ते-लिखते उसतक पहुँचे कैसे, यह उस प्रक्रिया की तरफ ले जाती, जिसमे सीकचें हमें अपनी तरफ बुलाते.बुलाना अब कम होता जा रहा है उसी तरह यहाँ पर आवाजाही भी. महीनों कोई दस्तक नहीं दे पाता. पर हर पल हर वक़्त लगता है कुछ लिखूं. भले यहाँ पर नहीं कागज़ पर, अपने पन्नों पर. बस उसका लिखा जाना ज़रूरी है.

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समझ नहीं पा रहा आज मुझे कैसा हो जाना चाहिए। पूरा दिन आत्ममुग्ध रहना चाहिए या आत्मालोचन वाली शैली ओढ़ लेनी चाहिए। जो भी हो इत्मीनान से रुककर कुछ देर ठहरने इतराने का मन भी करता है। फिर अगले ही पल सुस्ताने को हो आता हूँ। थोड़ा जी उन बीत गए दिनों में वापस टहलने को करता है। कैसे अजीब से दिन थे। अभी भी कुछ जादा दिन हुए नहीं हैं फ़िर भी इस ब्लॉग को बनाने के दरमियान अंदर बाहर आते जाते भावों से फ़िर गुजरना चाहता हूँ। वहीं से देखते रहना चाहता हूँ। क्या-क्या सब छूटे जा रहा है?

रुक कर देखूँ तो कभी सोचा नहीं था, कहाँ के लिए चलें हैं। बस चल दिये थे। इन बीतते सालों में कई कई दिन ऐसे भी आते जब न डायरी में कुछ लिखता न यहाँ आता। यहाँ आना बराबर अपने अंदर के खालीपने को भरने जैसा है। कुछ प्यार भरे सपने हैं जिनके पीछे भागा रहता हूँ। उनके बनने बिगड़ने में अंदर तहों तक टूटना बिखरना भी लगा रहता है। सबकी याद साथ है। कुछ पीछे कहीं सुस्ता रहे होंगे। कुछ की उमर हो गयी होगी। कुछ थक गए होंगे।

जितना अपने अकेलेपन में शिद्दत से लिखने को महसूस करता, उतना सुकून कोई और बात देती नहीं लगती। यह मेरी खुद से बातचीत ही तो है। पर फ़िर कभी लगता है यह लिखना अपने आपको दोहराने जैसा है। जिसे कहीं आने वाले कल सड़क किनारे किसी सुनसान पुलिहा से गुजरते वक़्त याद कर होंठों पर मुस्कान तैर जाए। आँखों की चमक बढ़ जाए जैसे।

{इससे आगे की उधेड़बुन के लिए यहाँ..}   

यह चौथी सालगिरह: मेरे मन की दुनिया 

तारीख़ अट्ठारह सितंबर। साल दो हज़ार चौदह। एक साल और बीत गया। इसे ‘जुड़ गया’, कहने का मन था। फ़िर भी क्यों नहीं कह पाया, पता नहीं। इस दुनिया में हमारी भी गलियाँ, कई खिड़कियों से गुजरते दृश्यों को ‘स्थिर’ कर सामने रख देती होंगी। किसी विचार के भीतर घूमते, किसी याद को याद करने के दरमियान, कहीं किसी मोड़ पर दो पल रुकते, कोई पेड़ याद आ जाया करता होगा। कहीं से झींगुर की अनसुलझी झंकारों को सुन, हम आराम से कोहनी के बल गर्दन टिकाकर, वहीं से, चुपचाप, अबोले, सबकुछ देखते रहे होंगे।

लगता है, पूरे साल इसी तरह की भाषा के साथ खेलता रहा। इसे शायद ‘खेलना’ ही कह रहा हूँ। इसे ठीक से न समझने के कारण भी ऐसा हो सकता है। लगता है, यही सच है। इसमें हद दर्ज़े का बनावटीपन है। एक अपनी दुनिया रच लेने की ज़िद है। जहाँ कोई नहीं है। कोई नहीं। बस इन्ही शब्दों से बने मड़हे के नीचे, उस टूट गए गिलास में चाय पीते, कोई ख़याल आकर ठहर गया है। असल में यह ठहरना ही है। आहिस्ते से रुक जाना है। बैठ जाना है।

यह किसी आने वाले कल के आने से पहले, अपने फटे पजामे से बने झोले को उठाकर चल देना है। इंतज़ार करने से मना कर देना है। पहले जब जेब में शब्द थोड़े कम पर जाते थे, तब राह चलते किसी बड़े कवि के गले पर हसिया रख, उन्हे लूट लिया करते थे। यह हमारी रचना प्रक्रिया को उघाड़ देने जैसा है। मेरे हिस्से यह कवि ‘मुक्तिबोध’ पड़े। ‘उदरभरि बन अनात्म बन गए, भूतों की शादी में कनात से तन गए’। चेतन अवचेतन में बराबर उपस्थित। इस तरह इन बीते सालों में, मैंने इन्हे अपने अंदर से बेदख़ल करने की कितनी कमजोर-सी कोशिश की है। कोशिश की कि यह फ़िर कभी याद न आयें।

अब मेरे दिल में राजेश जोशी हैं। विनोद कुमार शुक्ल हैं। थोड़ी उनकी कविता है। थोड़े उनके गद्य हैं। मन भी कभी-कभी इन्हे दोहरा लेता है। गुनगुना लेता है। फ़िर भी लिखना, ‘जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे, मैं उनसे मिलने, उनके पास चला जाऊँगा’ जैसी इन पंक्तियों को मन में दोहराने जितना असान नहीं रहा। वह ख़ुद को बराबर तोड़ने जैसा है। अपनी पड़ताल करने जैसा। उसमें हर जगह हम ही हैं। और हम कहीं नहीं हैं। हमने कभी बुधई की तरह जामिन मियाँ से पेड़ लगाने के लिए ज़मीन नहीं माँगी। इस जगह को, इसकी डालियों के अँखुआये मुलायाम नाज़ुक से पत्तों को अपने दिल के अंदर हमेशा वैसे ही रहने दिया। किसी को उन्हे छूने नहीं दिया। फ़िर कितने ही सवाल अंदर-ही-अंदर उमड़ते घुमड़ते रहे हैं, उनका कोई हिसाब नहीं। कहीं किसी जगह दर्ज़ होने लायक बनने से पहले ही वह सूरज की गर्मी में पिघल गए। उमस में न सूखने वाले पसीने की तरह छा गए। छा गए किसी बादल की तरह।

{उस दुनिया का रास्ता इधर से..} 

साल पाँचवा : लौटने से पहले

देखते-देखते पाँच साल बीत गए। जैसे अभी कल ही की तो बात है। लेकिन जैसे अगले ही पल लगता है, यह पिछली पंक्ति और उससे पिछली पंक्ति कितनी झूठ है। सरासर झूठ। पाँच साल। कितना बड़ा वक़्त होता है। हमारी ज़िंदगी के वह साल, जब हम जोश से भरे हुए किसी भी सपने को देख लेने की ज़िद से भर जाते होंगे। भर जाते होंगे, भरी मुट्ठी से। उँगलियों से। पर वह क्षण लौट के नहीं आएंगे। उनकी यादें इधर-उधर हमारे अंदर हमारे बाहर बिखरी पड़ी होंगी। कभी लगता है, इतने कम अरसे में तारीखें गड्ड-मड्ड हो गईं हैं। वह सत्रह रही होगी या अट्ठारह। महिना यही था। और साल था, दो हज़ार दस।

पर अब कोई फरक नहीं पड़ता। बस इसी के आस-पास कोई दिन रहा होगा। एक दिन आगे, एक दिन पीछे। फ़िर यह बात कितनी ही बार अपने अंदर दोहराई होगी, बस पाँच साल ! आज यह मोहलत ख़त्म। आज से वापस लौटने की तय्यारी शुरू। पर मुझे नहीं पता इस वापसी में कौन-सा ख़ाका काम करेगा। या फ़िर वापस लौटकर कहाँ पहुँच जाना है। कहीं पहुँचना भी है या ऐसे ही बोल दिया। पता नहीं। पर सच, जब बोला होगा, तब इतना सोचा नहीं होगा। बस बोल दिया होगा। ऐसे ही।

यह सच है कि सामंती संरचनाओं वाले इस काल खण्ड में इसकी कोई जगह अभी तक तय नहीं हो पायी है। जो ख़ुद को तारीख का ख़ुदमुख़्तार कहते हैं, उनके लिए हम 'आँख की किरकिरी' हैं। इसके बाहर वह किसी भी ऐसी जगह या 'स्पेस' को मानने के लिए तय्यार नहीं हैं। वह कहते हैं, इसके लिए 'इतिहास' में कोई कुर्सी या मेज़ खाली नहीं है। यह उनकी समझ का फेर है या बेदख़ल करने की राजनीति, कह नहीं सकता। शायद दोनों का गठजोड़ होगा। वरना अब मुझे भी यह मानने में कोई ऐतराज नहीं है कि हम भले एक भाषा विशेष में लिख रहे हैं, पर कथ्य के स्तर पर यहाँ जो अभिव्यक्त हो रहा है उसकी नब्ज़ पकड़ने का हुनर उन्हे नहीं आता। फ़िर हम कौन-सा किसी से मानद उपाधि लेने की जुगत लगाने वाले हैं। ख़ैर, हमें क्या करना। हम तो बस ऐसे ही यहाँ आ गए थे। के देखते हैं, कैसा खुला मैदान है?

{आगे की ज़मीन : खिड़की से पार..}

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