यह ब्लॉग

कभी वक़्त ही नहीं मिला के इस ‘ब्लॉग’ पर कभी कोई पोस्ट बन पाये। यह सब जगह है। और नहीं भी है। एक ही साथ दोनों। जब यहाँ लिख रहा होता हूँ। जब यहाँ नहीं लिख रहा होता, तब भी। ख़ुद इसके बारे में कभी शायद ही लिखा। अभी जहाँ पर यह है, उसके दो महीने बाद, यह चार साल का हो जाएगा। मेरे साथ-साथ यह भी काफी कुछ बदला है। शुरू से लेकर अब तक मेरी तरह। अंदर से बाहर की तरफ़ जाता हुआ। हरबार मुझे छिपा लेता। और उल्टे कई-कई बातें यहाँ खोदकर गाढ़ देता। किसी को कुछ दिखाई नहीं देता। कभी भी नहीं।

इसे अपना ‘प्रॉजेक्शन’ नहीं कहना चाहता। यह प्रक्षेपण नहीं है। इन बीतते सालों में इसने खुद को भी गढ़ा है। और काफ़ी हद तक मुझे भी। हम कभी-कभी या हमेशा से ही उन जगहों पर नहीं होना चाहते, जहाँ हमारा वर्तमान बीत रहा होता है। ऐसा क्यों होता है? पता नहीं। शायद यह अंदर से फूट रही क़ाबिलियत के चलते लगता होगा। इसे भ्रम भी कह सकते हैं। पर कहते नहीं हैं। कहना, हमें टूटने से बचा नहीं पाएगा। ज़रूरी है बचे रहना। इस तरह यह वह जगह बनी, जो ‘एसस्केप रूट’ की तरह काम आने लगी। वक़्त बेवक़्त कभी भी। कैसे भी। 

इन शहरों में अपना यह ‘याद शहर’। अपनी ‘कस्बाईयत’ में भी पूरा गाँव। भाषा के मिजाज़ में किसी मेढ़ पर उग आई घास की तरह। जहाँ मन को गुज़रे भी बीते कितने दिन हो गए, याद नहीं। सबका अपना मिजाज़ है। शायद दो हज़ार नौ में घर में कंप्यूटर न आया होता, तो यह लिखना किस तरह होता, कह नहीं सकता। अब तो बस कहने का मन करता है। जिस छोटी-सी कुर्सी पर घण्टों बैठा रहता हूँ, वह कभी सपनों में नहीं आई। बस उसकी कील से, बाहर निकल आई फ़ेंच से बचने के लिए पुराने तौलिए को डाले रहता हूँ। मेरे जैसे न जाने कितने होंगे, जिन्होने अपनी ज़िन्दगी में सिवाय सपने देखने के और कुछ नहीं किया। दिमाग में खुराफ़ातें तब भी थी, आज की तरह। द्वंद्व भी थे। सपने भी। कुछ लिखने का मन भी। बस, यह दुनिया ‘डायरी’ और ‘पैन’ से कुछ बड़ी थी।

खैर, इसका नाम ‘करनी चापरकरन’ है। थोड़ा भदेस है। गाली की तरह नहीं। फ़िर भी। यह अपने ‘लोक’ में लौट जाने की तरह है। बिलकुल कठफोड़वे के काठ के पास वापस लौटने की तरह। इसे इन शहरों की गलियों, कूचों, चौक बाज़ारों से नहीं गढ़ा। यह हमारी ‘अवधी’ का ‘बिम्ब’ है। जायसी के पद्मावत वाली नहीं, गोण्डा-बहराइच वाली। फैज़ाबाद वाली नहीं। मतलब आज भी कई पूछते हैं। तब इलियट से जोड़कर पहले साल एक ‘पोस्ट’ बनाई थी। ‘पोयटिक्स’ से जोड़कर। इसे तोड़ फोड़कर गलाने पिघलाने, मूल स्वरूप बदल देने वाली कल्पना की तरह देखा। अभी पीछे इसे ‘विखंडन’ में जीने वाली मूल भावना कहा है।

यह कहाँ से शुरू हुआ? इसके तब के दिन कैसे थे? शायद यह गुस्सा था। या अपने मन की तरह न करने देने की स्वतन्त्रता का अभाव। विचारों का रूमान अपनी तरफ खींचता रहा बराबर। किसी लड़की को दिल की बात न बोल पाने की ‘कसक’ जैसे। हृदयपक्ष पर विचारों के शासन की तरह। तब हम अपने सामने प्रस्तावित ‘यूटोपिया’ की तरफ खिंचे चले गए। वह तब क्या था या अभी क्या है, इसका ख़ाका कैसे अपना काम कर रहा है यह ‘आइडियोलॉजी’ बताती है। अभी भी ख़ुद को थोड़ा ‘लेफ़्ट’ में ही ‘सिचुएट’ कर पाता हूँ। इससे कोई दिक़्क़त नहीं है, पर कभी-कभी घुटन सी होने लगती है। तब ‘पर्सनल’ हो जाने का मन करता है। और मूलतः यही ‘अभिव्यक्ति का ग्रे एरिया’ है जहाँ जितना ‘व्यक्तिवादी’ हूँ, उतना ही समाज के लिए ‘प्रतिबद्ध’ वाला नुक्ता अपना काम कर रहा होता है। ख़ुद ऐसा लिखना अपने ठीहे की मार्केटिंग करने जैसा है। यह बताना है के हम भी आव-ताव देख झण्डा बुलंद किए देते हैं। लतियाना गरियाना ऐसे ही बदस्तूर चलता रहता है। ‘आत्मालोचन’ वाला पसंघा तभी पैर में फंसा रखा है।

हम कहीं से कमज़ोर नहीं हैं। बस, इसे समझना इतना आसान नहीं। उस साल सितंबर में वहाँ दाख़िले के बाद जब से प्रो. कृष्ण कुमार की क्लासें लेने लगे और ख़ुद उन पीछे बन गए खांचों-साँचों-औज़ारों-विचारों की तहों को झाड़-पोंछ कर देखने लगे, तब से लगता है थोड़ा खिसके हैं। यह विचलन नहीं है। न किसी तरह का संशोधनवाद। यह वैचारिक विकास क्रम है। विचार को औज़ार की तरह इस्तेमाल करने में समाजशास्त्र की पैठ है। यह इधर या उधर होने से जादा ‘गतिकी’ को समझने, उन ‘संरचनाओं’ को जानने का आग्रह है। विश्लेषण के लगातार मौके बनाना है। उन सभी तथ्यों से वापस गुज़रना है। बारीकी से देखना है।

यहाँ लिखना जितना बौद्धिक-राजनीतिक कर्म रहा है, उसी के बीच कई दरीचे भी तलाशे। उन्हे खोला है। कई स्वतंत्रताएं उनके आने से लेता रहा। यहीं तो कई चोर दरवाज़े मिले जो मेरे ‘अकेले’ होने पर मुझे भगा ले जाते थे। कुछ देर के लिए ही सही, छटपटाहट कुछ कम होती है। पर अपने में खोया सा मैं उन पलों को बार-बार जीने यहाँ आता रहा हूँ। इधर यह आना जाना जादा ‘निजी’ हुआ है। उसमे बराबर ‘मैं’ की उपस्थिति है। हरबार इन अ-कोमल, कठोर दिनों में फँस जाता हूँ, तब यहाँ नहीं होता। और इस तरह हरबार जब भी ‘मैं’ लिखता, तब संजीव सर की बात याद आती । इस ‘मैं’ से बचो। पर मैं बच नहीं पाया। बचना लगातार मुश्किल होता गया।

फ़िर जितनी भी तस्वीरें यहाँ-वहाँ बिखरी हुई हैं, उन सबका अपना स्वतंत्र अस्तित्व हैं। उनके रंग, भाव, वहाँ उभर रही आकृतियाँ जितनी अमूर्त रहना चाहती हैं, उतने ही अपने अर्थों में वह ठोस हैं। एक-एक तस्वीर खोजने में कईबार पोस्ट लिखने से भी कई-कई गुना वक़्त लगाया है। उनके मानी, वहाँ मौजूद बिंब, कई तरह से रूपकों को खोलते हैं। उन्हे शब्दों के साथ अविभाज्य-सा मान वहाँ लगाता हूँ। कभी-कभी लगता है, शब्दों को न देख पाने पर उन तस्वीरों को पढ़ लेने से ही कई बातें खुल जाएंगी। इसलिए रह जाता हूँ। रंगों से खेलता हूँ। चटक रंगों से। उनमे जितनी अस्पष्टता दिखाई देती है, वह उन कृतियों से ज़्यादा मुखर हैं जिनमे सब साफ़-साफ़ है। पर्दा है नहीं, पर लगता है। लिखे और छवि दोनों पर। बराबर।

इस तरह से यह मेरा विस्तार है। आख़िर में इस घिसीपिटी लाइन को फ़िर दोहरा रहा हूँ। जबकि ऊपर इस स्थापना को ख़ारिज़ कर दिया है। ख़ैर, इससे ज़्यादा और कह नहीं सकता। यह भावुक एहसास भी है रूमानी ख़याल भी और उतना ही दिमागी कसरत भी। इसलिए हरबार बचता रहा। इसे हावी नहीं होने देता। यही इतने सालों का हासिल है। जिसे मैंने बनाया है। बस इससे जादा नहीं। बाकी तो सब यहाँ है ही। जो शायद इसके अलावे कहीं नहीं होते।

{30/07/2014 }

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