ख़त मेरा

पता नहीं ऐसा क्यों है। तुम पास नहीं हो शायद इसलिए। कभी-कभी कमज़ोर पड़ जाता हूँ। बिलकुल अकेला। फ़िर उसी वक़्त अपने पास मोबाइल ढूँढता हूँ। सबसे जादा इसकी ज़रूरत तभी पड़ती है। वरना  कहीं भी पड़ा रहे, कोई बात नही। सोचने लग जाता हूँ। के इतने पास पास हम अभी क्यो नहीं हैं। सोच कर भी कुछ नहीं कर पाता। बस उस दूरी को कोस रहा होता हूँ जो हमारे बीच है। ऐसा भी नहीं है के अभी ख़याल आया और उधर दिल्ली से पैसंजर पकड़ मगरवारा-उन्नाव के बीच के किलोमीटर पाट देने वाला हूँ।

यहाँ तो गोंडा-बहराइच के बीच पड़ने वाले कितने ही साठ किलोमीटर पड़ते हैं। यही सोच दिल उदास हो बैठ जाता है। बिलकुल वैसे जैसे अभी बात करते-करते तुमने कहा। कि ‘स्टेटस’ नहीं लगाना था।

फ़ोन भी कमाल चीज़ है। थोड़ी देर पहले ‘स्विच-ऑफ’ कर देने का मन था तभी तुम्हारा फ़ोन फ़िर आया।

चार दिन पहले इतना लिखकर रहने दिया था। आज मौका मिला है। तब तुमसे बात कर रहा था। सोच रहा हूँ यह सामने न दिख पाना कितना खलता होगा तुम्हें। उतना ही तुम भी मेरे पास हो आना चाहती होगी, जितना के मैं। पर नही, अभी का सच यह है, के हम दूर हैं। चाँद से भी दूर। तारों से भी दूर।

रह रह याद हो आती हैं, बीती रातें। जिनमे हम बिलकुल अगल बगल बैठे हवा को महसूस कर रहे होते थे। जो बह नहीं रही होती थी। पर लगता था के वो है। बिलकुल पास। फिर जब हम नीचे लौट आते, लगता कुछ देर और बैठ सकते थे। कुछ और बातें हमारी ख़ामोशी के बीच से गुज़रती हमें छू सकती थीं। उनको अब यादों में होना है। या किसी रात टकरा गए सपने में। या उस डायरी में रखे गुलाब के फूल की तरह। उसकी सुगंध बची रहेगी हमारे बीच।

कभी कभी लगता है अब मेरे दो दिल हैं दोनों तरफ़ धड़कते हैं। पर झट महसूस करता हूँ के जो एक अदद था भी अब मेरे पास रहा ही कहाँ। वो तो ले लिया तुमने। ये जो पास नहीं होना है। जो इसका दुख है, जो इसकी पीड़ा है, जो वेदना है उसमे सबसे जादा दुख, पीड़ा, वेदना ही है और कुछ नही।

हम दोनों के हिस्से अभी सबसे ज़ायदा यह इंतज़ार ही पड़ा है। जितने दिन थे जितनी शाम रातें थीं उनमे कई-कई बार साथ रहने के मौके तलाशते तुम्हें साथ ले आया और शायद ख़ुद को वहीं तुम्हारे पास छोड़ आया। अदलाबदली ही सही। कुछ तो तुम मुझमे भी हो। कभी कभी हम दोनो..पता नही क्या..

इतना सब कहकर एक बार फिर यह न कह पाना दिल में चुभता है के खुद को नहीं पता कि आगे कब मिल रहे हैं। बात करते करते टाल जाना। यह कुछ न कर पाना ख़ुद से लड़ाई की तरह है। जहाँ मुझे नहीं पता कि हम इतनी दूर क्यों हैं।

चाह कर भी कुछ नही कर सकता। शायद यह कहकर अपने को किसी भी तरह की ज़िम्मेदारी से बचा ले जाऊँ, पर कब तक..शायद अगली मुलाक़ात तक..

इससे जादा और नहीं लिख सकता।

बस एक तुम हो। तुम्हारी याद है। एक पास मैं नहीं हूँ। एक पास तुम नही हो। उसी को पलट पलट बस जी सा रहा हूँ जैसे।

-तुम्हारा।

2 टिप्‍पणियां:

  1. ateet ko soch rahi hu, par tab mobile nahi tha, gonda bahraich kah kar apna pan jaga dia aapne.. kahan ke hai mitr aap..????

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    1. पैदाइश से यहीं के हैं पर बाबा दादी सब वहीं बहराइच के..आप फ़िलहाल कहाँ हैं जो इन जगहों को अतीत के दिनों तक ले जा रही हैं..

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